Author Archives: badalav - Page 107

रोती-बिलखती मां भी बददुआ नहीं देती

अश्विनी शर्मा चारपाई से पर लेटी मां और पास बंधी भैंस । विख्यात कवि धूमिल के गांव खेवली की पन्ना माई बिलख रहीं हैं। अपने खून से ही दया की…
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बिहार के तीन तिलंगे-व्हाट एन इलेक्शऩ सर जी!

शंभु झा बिहार चुनाव को लेकर काफी कुछ कहा और सुना जा रहा है। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भी इतनी गहमागहमी नहीं होती होगी जितनी बिहार इलेक्शऩ को…
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गांव शहर बना तो हम हिन्दू-मुस्लिम हो गए !

ज़ैग़म मुर्तज़ा क़रीब दो दशक पहले गांव जाना हमारे लिए अंतर्राष्ट्रीय पिकनिक से कम न था। हफ्ता भर पहले तैयारियां शुरू हो जातीं थी। गांव कोई ऐसा ख़ास दूर नहीं…
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महंगाई का रावण हंस रहा है… हा हा हा

हां, बह रही है विकास की गंगा दालों में डबल सेंचुरी के साथ प्याज में मुनाफाखोरी के साथ सब्जियों में जनता की जेब काटने के साथ तीन महीने में हर…
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रमन राज में नक्सलियों से आखिरी लड़ाई

फोटो- दिवाकर मुक्तिबोध की फेसबुक वॉल से  दिवाकर मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने हाल ही में नई दिल्ली में ये कहा था कि राज्य में नक्सली समस्या…
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धत तेरे कि… थार में न भात, जुबान पे छै जात !

पुष्यमित्र  मूढ़ी खाता बच्चा, इसकी मां पिछले साल इसे जन्म देने के बाद गुजर गयी। फोटो-पुष्यमित्र  सरकारी आंकड़ों में बिहार में दस में से आठ बच्चे कुपोषित हैं। 26 फीसदी…
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ये प्रतिरोध की संस्कृति को सलाम करने का वक़्त है

मौजूदा प्रतिरोध की गूंज के अगुआ रहे उदय प्रकाश प्रियदर्शन एक खूंखार, लथपथ समय में गलत के विरोध की हर पहल स्वागत योग्य है। जो इस पर सवाल उठाते हैं वे…
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लेखकों का ‘आपातकाल’ और ‘फासीवाद’ बस हौव्वा है ?

संजय द्विवेदी देश में बढ़ती तथाकथित सांप्रदायिकता से संतप्त बुद्धिजीवियों और लेखकों द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का सिलसिला वास्तव में प्रभावित करने वाला है। यह कितना सुंदर है कि…
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क़लम से ही क़ातिलों के सर क़लम करें लेखक

कुमार सर्वेश तेंदुआ गुर्राता है, तुम मशाल जलाओ। क्योंकि तेंदुआ गुर्रा सकता है, मशाल नहीं जला सकता। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की ये पंक्तियां मुझे कुछ विशेष कारणों से याद आ…
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