ब्रह्मानंद ठाकुर

राजतंत्र में राजा-महाराजाओं के शान शौकत वाली जिंदगी और उनके विचित्र शौक की अनेक कहानियां इतिहास के पन्नों में बिखरी पडीं हैं। कहने के लिए राजतंत्र के दिन लद चुके । अब जमाना लोकतंत्र का है। वही लोकतंत्र जिसे अब्राहम लिंकन द्वारा दी गई परिभाषा में जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन कहा गया है। मगर, हमारा यह लोकतंत्र जनप्रतिनिधियों के शाही चोंचले से कहां वंचित है? जनप्रतिनिधियों के राजसी ठाठ-बाट, मंत्रियों के बेटे-बेटियों के शादी-विवाह में फिजूलखर्ची तो कभी प्रधानमंत्री जी के महंगे सूट की खबर अखबारों की सूर्खियां बनती रहीं हैं ठीक वैसे ही जैसे राजतंत्र में हुआ करती थीं ।

अतीत के झरोखे से पार्ट-3

अबतक आप जूनागढ़ और मैसूर रियासत के महाराजा के शौक के किस्से पढ़ चुके हैं। आलेख की तीसरी कड़ी में अब बात ग्वालियर के महाराजा का वह किस्सा जिसमें उन्होंने अपने आलीशान महल की छत पर क्रेन से 5 हाथियों को चढ़वा कर उसकी मजबूती की जांच कराई थी। इसका उल्लेख विश्व विख्यात लेखक और पत्रकार डोमिनीक लापिएर, लैरी कालिन्स की चर्चित पुस्तक फ्रिडम एट मिडनाईट में मिलता है। देशी रियासतों के जमाने में महाराजा ग्वालियर का शासन भारत के सबसे अच्छे शासनों में समझा जाता था। 20 वीं शताब्दी की शुरुआत से पहले उन्होंने अपने महल में इतना बड़ा फानूस लगवाने का निर्णय लिया, जो बकिंघम पैलेस के सबसे बड़े फानूस से भी बड़ा हो। उन्होंने वेनिस में वैसा फानूस बनाने का आर्डर भेज दिया। बाद में उनके किसी खास व्यक्ति ने उन्हें बताया कि कहीं ऐसा न हो कि उनके महल की छत फानूस का बोझ बर्दास्त ही न कर सके ! महाराजा ने इस शंका का समाधान करने के लिए एक खास क्रेन बनवा कर उसकी सहायता से अपना सबसे बड़ा हाथी महल की छत पर चढ़वाया और पूरे छत पर उसे घुमाया गया। छत को कोई नुकसान जब नहीं पहुंचा तब जाकर उन्हें तसल्ली मिली। वह फानूस महल में लगा दिया गया।

ग्वालियर के जय विलास पैलेस के भीतर की तस्वीर

मुजफ्फरपुर के साहित्यकार डाक्टर संजय पंकज जो हाल ही में ग्वालियर के अपने साहित्यिक प्रवास से लौटे हैं, बताते हैं कि जब उन्होंने अपने वरिष्ठ साहित्यकार मित्र मुरारीलाल गीतेश के साथ ग्वालियर राजा के उस भव्य आवास ‘राज विलास पैलेस ‘ का दर्शन किया तो वे दंग रह गये थे। साफ-सुथरा और रंग-विरंगे फूलों से सुज्जित दूर-दूर तक फैला सुव्यवस्थित परिसर। हाल जैसे बड़े-बड़े कमरे । रंगीन झालरों, झूमरों से जगमगाता बरामदा, संग्रहालय एवं अनान्य चीजों को देखकर उनके सामने राजतंत्र का वैभव साकार हो गया। वे बताते हैं कि महाराजा का डाइनिंग हाल देख उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं। इतनी ऊंची छत कि आज का तिमंजिला भवन भी उसके सामने बौना दिखता है। दूर तक लगा डाइनिंग टेबुल, चांदी के चमचमाते वर्तन, चम्मच, टेबुल के दोनों तरफ चांदी मढी कुर्सियां, दीवारों पर चारों ओर चांदी की नक्काशीदार मोटी परत, बीच-बीच में सोने की नक्काशियां, छत से झूलता 5 हजार बल्बों का विशाल सोने का झुमर जिसका वजन सम्भवत:क्विनटल में आंका जा सकता है।

डॉक्टर संजय पंकज बताते हैं कि वे यह सब देख कर उस जमाने की वास्तुकला और कारिगरी का अनुभव कर ही रहे थे कि उनकी नजर डाइनिंग टेबुल पर बिछी छोटी रेलपटरियों पर पड़ गई। उन्होंने इस बाबत जब गीतेश जी से पूछा तो उन्हें बताया गया कि महाराजा के जमाने में किचेन से भोज्य पदार्थ भरे कई डिब्बों को खींच कर एक छोटा सा इंजन इसी पटरी से चलते हुए हर मेहमान तक व्यंजनों को पहुंचाता था। ट्रेन हर थाली के पास कुछ देर रुकती जिन्हें जो लेना होता ले लेते फिर वह आगे बढ़ जाती। इसीतरह सभी मेहमान अपनी इच्छा के मुताबिक भोजन की सामग्री ले लेते थे। एकबार में सौ से ज्यादा मेहमान उस भोज में सम्मिलित होते थे। संजय पंकज जी यह सब बता ही रहे थे कि मुझे हाल ही में फ्रिडम ऐट मिड नाईट पुस्तक में वर्णित ग्वालियर महाराजा के भोज का एक प्रसंग याद आ गया।

पुस्तक में लेखक डोमिनीक लापिएर लैरी कालिन्स ने उस प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा है, महाराजा बिजली की रेलगाड़ी के बेहद तमाशबीन थे। उन्होंने अपने लिए बिजली की जो रेलगाड़ी बनवाई थी उसकी कल्पना तब कोई खिलौनों का शौकीन लडका भी नहीं कर सकता था। यह रेलगाड़ी बहुत बड़ी मेज पर बिछायी गई ठोस चांदी की 250 फीट लम्बी पटरियों पर चलती थी। वह मेज महल के बीचोबीच रखी गई थी जहां शाही दावतें होती थीं। रेल की पटरियों के एक सिरे पर एक बड़ा-सा बोर्ड लगा था जिसपर तरह-तरह के खटके और बटन लगे होते थे। इनकी सहायता से महाराजा के अतिथियों के लिए खाना लाने वाली रेलगाडी पर नियंत्रण रखा जाता था। इस बोर्ड मे लगे किसी एक बटन को दबा कर महाराजा किसी भी अतिथि के सामने सब्जी तो दूसरे बटन को दबाकर कोई दूसरा भोज्य पदार्थ। किसी खटके को दबाकर रसोईघर के बाबर्ची को कोई जरूरी संदेश भी भेजा जाता था। किसी बटन को दबाकर अतिथि के सामने से मिठाई या अन्य किसी सामग्री का वर्तन भी हटा लिया जाता था और फिर अन्य बटन दबाते ही उस वर्तन को दूसरे मेहमान के सामने हाजिर करा दिया जाता था।
एक दिन ऐसे ही एक शाही भोज के दौरान अचानक एक घटना घट गई। उस दिन रात में वायसराय के सम्मान में काफी धूमधाम से भोज का आयोजन किया गया था। सभी अतिथि भोजन के लिए डाइनिंग हाल मे डाइनिंग टेबल के दोनों तरफ बैठे हुए थे। इसी बीच अचानक बिजली के तार आपस मे उलझ गये। बिजली की रेलगाड़ी हाल में डाइनिंग टेबल पर एक सिरे से दूसरे सिरे तक भागी फिर रही थी।किसी मेहमान के कपड़ों पर शोरबा उछालती किसी पर भुना हुआ गोश्त फेंकती किसी के ऊपर मटर के दाने बिखेरती । वायसराय और उनकी पत्नी हक्का-बक्का होकर यह सब देख रहे थे । लेखक ने इस घटना पर टिप्पणी करते हुए अपनी पुस्तक मे लिखा है कि रेलों के इतिहास में भी शायद ऐसी दुर्घटना कभी नहीं हुई होगी जिसमें ऐसे शाही मेहमान तक चपेट में आए हों ।
अगली कड़ी में पढिए बडौदा रियासत के महाराजा के शौक की गाथा।


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।