विंध्य की पहाड़ियों में आस्था और पर्यटन का अद्भुत संगम

विंध्य की पहाड़ियों में आस्था और पर्यटन का अद्भुत संगम

पुरु शर्मा

विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं की रमणीय वादियों की गोद में बसा अलौकिक शक्ति और आस्था का केंद्र करीला धाम। कंकरीट के जंगल और शहर के कोलाहल से दूर, शांतिमय वातावरण में हरितमा की चादर ओढ़े विंध्य की मनोरम वादियों से घिरा भगवान वाल्मीकि का आश्रम। ऐसी मान्यता है कि यहाँ की पावन धरा पर पैर रखते ही सांसारिक मायाजाल में जकड़े मानव की समस्त व्याधियों का समाधान करती हैं माँ जानकी। माँ जानकी का यह मंदिर यहाँ आने वाले हर आगन्तुक को अपनी ओर आकर्षित करने में पूर्णतः सक्षम है। वाल्मीकि आश्रम और लव कुश की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध इस पावन भूमि की महिमा अपरंपार है। यहाँ का रमणीय वातावरण और माँ जानकी की आलौकिक छटा पर्यटकों और श्रद्धालुओं को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। बरसात के मौसम में पूरी घाटी हरितमा की चादर ओढ़ लेती है, जिसे देखना मनमोहक होता है और सर्दियों के समय इन घाटियों पर चाँदी सी चमकती धुंध छा जाती है। मंदिर के निकट ही विंध्याचल की घाटियों की तलहटी में माँ जानकी के चरणों को धोती हुई श्वेत धवल चाँदनी सी चमकती कोंचा नदी लहराती हुई चट्टानों के बीच से गुजरती है। 

 मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले के मुख्यालय से 35 किमी की दूरी पर यह एक दिव्य लुभावना धार्मिक स्थल है। जो एक ऐसे तीर्थ स्थल के रूप में विकसित हो चुका है जहाँ सालभर भक्तों का तांता लगा रहता है। लाखों की संख्या में भक्त यहाँ पहुंचकर माँ जानकी के चरणों में आराधना व श्रद्धाभाव के साथ पूजा अर्चना करते है। प्रतिवर्ष रंगपंचमी से यहाँ तीन दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें लगभग 25 लाख श्रद्धालु शामिल होते है। संभवतः यह भारत का इकलौता ऐसा मंदिर है जहां माँ सीता बिना भगवान राम के विराजमान हैं। कहते हैं कि यहाँ पर श्रद्धा एवं विनयपूर्वक की गई पूजा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती। 

यहाँ के महंत बताते हैं कि यह महर्षि वाल्मीकि जी का आश्रम था। जब लोकोपवाद के कारण भगवान राम ने माता सीता का परित्याग किया था तब इस समय माता सीता इसी आश्रम में रुकी थीं और यहीं पर उन्होंने लव-कुश को जन्मदिन दिया था। इसी कारण यह भारत का एक ऐसा इकलौता मंदिर है जिसमें भगवान राम के बिना माँ सीता लव-कुश के साथ विराजमान हैं।

 गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में वाल्मिकी आश्रम के बारे में वर्णन करते हुए लिखा है कि;-

 नव रसाल वन विहरन सीला, सोह कि कोकिल विपिन करीला।

 रहहु भवन अस्स हृदय विचारी, चंद वदनि दुख कानन भारी।।” 

मंदिर को लेकर किदवंती

  आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व विदिशा जिले के ग्राम दीपनाखेड़ा के महंत तपसी महाराज को रात्रि को स्वप्न आया कि करीला ग्राम में टीले पर स्थित आश्रम में मां जानकी तथा लव कुश कुछ समय रहे थे। किन्तु अब यह वाल्मिकी आश्रम वीरान पड़ा हुआ है। तुम वहां जाकर इस आश्रम को जागृत करो। अगले दिन सुबह होते हुए तपसी महाराज करीला पहाड़ी को ढूढ़ने के लिए चल पड़े। जैसा उन्होंने स्वप्न में देखा और सुना था वैसे ही आश्रम उन्होंने करीला पहाड़ी पर पाया। यहां करील के पेड़ अधिक संख्या में होने के कारण इस स्थान को करीला कहा जाता है। तपसी महाराज इस पहाड़ी पर ही रूक गए तथा स्वयं ही आश्रम की साफ-सफाई में जुट गए। उन्हें देख आस-पास के ग्रामीणजनों ने भी उनका सहयोग किया। तपसी महाराज ने लगभग 40 वर्षो तक इस आश्रम में तपस्या करते हुए आश्रम की सेवा की।कहा जाता है कि यहाँ कि भभूत किसानों द्वारा खेतों में कीटनाशक के रूप में प्रयोग की जाती हैं। फसल में इल्ली या अन्य रोग हो जाने पर इलाके के किसानों द्वारा करीला की भभूत का छिड़काव खेतों में किया जाता है, जिससे फसल रोगमुक्त बनी रहती है।

 उनके पश्चात् अयोध्या आश्रम से बलरामदास जी महाराज करीला आए, जहाँ पर उन्होंने गोशाला स्थापित करवाई। ऐसा कहा जाता है कि आश्रम में शेर और गाय एकसाथ रहते थे। इतना ही नहीं आश्रम में कई बन्दर भी थे जो आश्रम के कार्यो में अपना हाथ बटांते थे। इनके पश्चात इस आश्रम में पंजाब प्रदेश से आए महंत मथुरादास जी खडेसुरी थे। लगभग 12 वर्षों तक खडे रहकर तपस्या की और लगभग 40 वर्षो तक आश्रम की इन्होंने भी व्यवस्था देखी। खडे होकर ही यह पूजा, स्नान, खाना तथा सोने की क्रिया कर लेते थे। उनके कार्यकाल में यहाॅ की गोशाला में लगभग 200 गाय थी।

रँगपंचमी पर लगता हैं तीन दिवसीय विशाल मेला

इस प्रसिद्ध मंदिर में रंगपंचमी के अवसर पर तीन दिवसीय विशाल मेले का आयोजन किया जाता हैं। जिसमें उत्तरप्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, राजस्थान समेत करीब 7 राज्यों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। यह पूरे बुंदेलखंड के सबसे बड़े मेलों में से माना जाता हैं। 

यहाँ पर बेड़िया समुदाय की महिलाओं द्वारा रात्रि में मशाल के उजाले में खुले आसमान तले बुंदेलखंड के लोकप्रिय लोकनृत्य राई ढोल-नगाड़े की थाप पर किया जाता हैं। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार जब लव-कुश का जन्म हुआ था तो स्वर्ग से आई अप्सराओं ने बधाई स्वरूप यहाँ पर रात्रि में चँद्रमा की धवल चाँदनी में नृत्य किया था। 

पुरु शर्मा / मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले में पड़ने वाले खोपर गांव के निवासी । बचपन से ही प्रकृति से गहरा लगाव । पढ़ने और लिखने का शौक । संप्रति वक्त ग्रेजुएशन के छात्र । 

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