जब जब किसान अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरता है तब किसान विरोधी सोच वाले तमाम फेसबुकिया ब्रिगेड झूठ फैलाने के लिए तैयार खड़ी हो जाती है । कोई किसानों की मांगों को गैरवाजिब ठहराने में जुटा रहता है तो कोई किसानों के आंदोलन के तरीकों पर सवाल उठाता है । पिछले साल दिल्ली में जब तमिलनाडु के किसानों ने प्रदर्शन किया तो कुछ लोग सामाजिक संगठनों की ओर से किसानों के लिए हुए खाने-पानी के इंतजाम को लेकर किसानों के दर्द को ही झुठलाने पर तुले रहे । सोमवार को जब मुंबई में महाराष्ट्र के किसान आए तो भी नेताओं से लेकर तमाम लोग किसानों के छाले पर मरहम की बजाय नमक छिड़कने लगे । ऐसी ही कुछ फेसबुक टिप्पणियों को देख किसान के दर्द को समझने वाले कुछ लोगों ने असली और नकली किसान को लेकर कुछ तार्किक और दिलचस्प टिप्पणी फेसबुक पर पोस्ट की है । आप भी पढ़िये आखिर असली किसान कौन ?

राकेश कायस्थ के फेसबुक वाल से 

एक दिन पहले मैंने महाराष्ट्र के आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में कुछ लिखा था। एक दिन बाद सुबह से फेसबुक पर कई पोस्ट देखे। प्रदर्शनकारियों को किसान कहे जाने पर बहुत से लोगो को एतराज़ दिखा।
मैंने गौर किया तो लगा कि बात ठीक है। जो लोग डेढ़ सौ किलोमीटर पैदल चल सकते हैं, वे खाली पेट नहीं होंगे। कुछ ना कुछ तो ज़रूर खाया होगा। ऊपर से उनके पास लाल झंडा भी है। फिर भला ये लोग किसान कैसे हो सकते हैं?
फिर इस देश का असली किसान कौन है, जिसकी मदद सरकार को करनी चाहिए? मुझे पहला नाम याद आया, बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का। दिल्ली के लुटियंस जोन के बंगले में सब्जियां और फूल उगाते हैं और उन्हें स्व-मूत्र से सींचते हैं।

गडकरी जी ने कोई तीन साल पहले मीडिया को विस्तार से बताया था कि मूत्र से सिंचाई से पौधे डेढ़ गुना तेज़ी से बढ़ते हैं। अब आप तय कर लीजिये कि पानी का रोना रोने वाले किसान चाहिए या फिर गडकरी जी की तरह वैज्ञानिक सोच रखने वाले स्वावलंबी किसान?
लेकिन गडकरी जी खुद को किसान नहीं मानते हैं। मेरी जानकारी के मुताबिक उन्होंने कोई लोन भी नहीं लिया जिसे माफ करके सरकार `एक सच्चे किसान’ किसान की मदद कर सके। हां मोदीजी चाहे तो उन्हे लघु सिंचाई मंत्री ज़रूर बना सकते हैं।
सरकार अगर वाकई किसी सच्चे किसान की मदद करना चाहती है तो उसे मुकेश अंबानी की तरफ देखना चाहिए। सुबह मैं उनके घर के बाहर से गुजरा। एंटिला पर उगी वनस्पतियां देखियेगा तो समझ में आ जाएगा कि खेती-किसानी क्या होती है।
यह तस्वीर गूगल से निकाली गई है, इसलिए हो सकता है आपको अंबानी निवास की हरियाली ठीक से दिखाई ना दे। पास से गुजरेंगे तो देखकर धन्य हो जाएंगे। बेजान पत्थरों से बने किलेनुमा घर की दीवारों पर सिर से पांव तक हरियाली ही हरियाली छाई है।
मुकेश भाई पर कर्जा भी बहुत है। सरकार को सच्चे किसानों की चिंता हमेशा से रही है। इसलिए उम्मीद करता हूं कि मुकेश भाई का पूरा कर्जा माफ कर दिया जाएगा।

पुष्य मित्र के फेसबुक वॉल से

राज्य के लगभग नब्बे परसेंट किसान भूमिहीन हैं, यह अजब बात है क्योंकि अपनी जमीन नहीं है, लेकिन खेती कर रहे हैं, किसान हैं। जमीन भाड़ा पर लेकर चार हजार से लेकर बारह हजार रुपये बीघा रकम चुकाकर खेती करते हैं। सिंचाई की सुविधा नहीं है, खेत तक बिजली नहीं पहुंची है, नहर में ऐन पटवन के वक्त पानी सूख जाता है। बोरिंग में डीजल फूंक देते हैं, लेकिन सब्सिडी का पैसा नहीं मिलता। उपज बेचने जाते हैं तो पैक्स वाला बोलता है, इतना परसेंट नमी है। पैक्स का रेट फिक्स है। एक किसान ने बताया पैक्स वाले का 125 टका क्विंटल खरचा है। बीडीओ से लेकर नेताजी तक को देना है और अपने लिए भी बचाना है। इसलिए वह तेरह क्विंटल तौलता है और बारह क्विंटल लिखता है। पैसा जब मिले।फिर भी किसान को गुस्सा नहीं आता है। क्योंकि उसको मालूम है, ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? उसको दिल्ली-पंजाब देखा हुआ है। काम मिलिये जायेगा। वह गुस्साता नहीं है, जनसेवा एक्सप्रेस पर लद कर चला जाता है।

 

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