अनुशक्ति सिंह

मैं पैदाइश से राजपूत हूँ. मेरे नाम के पीछे लगा ‘सिंह’ सरनेम मेरे पिता की थाती है जो मेरे साथ जुड़ी हुई है. वैसे ही जैसे किसी भी ‘बुश’ की औलाद ‘बुश’ होती है और गांधी के बच्चे ‘गांधी’.  मुझे मेरे सरनेम वाले लोग हर कदम पर मिल जाते हैं. ज़िन्दगी की कवायद में उलझे हुए, दो पैसे ज्यादा कमाने की जद्दोजहद करते हुए. ये लोग उतने ही ‘आम’ होते हैं जितने बाकी लोग. ज़िन्दगी की लड़ाई में इनका ‘सरनेम’ कहाँ टिकता है, इन्हें ख़ुद भी इल्म नहीं होता.

इन्हें न इतिहास से लेना-देना होता है न वर्तमान की आबो-हवा से. इन्होंने न हाड़ा रानी के बारे में सुना होता है न ‘मीरा बाई’ के बारे में. उन्हें छत्रसाल की कहानी की भी कोई जानकारी नहीं. गाथाओं से उनके घर की रोटी नहीं सिंकती. उन्हें सप्ताह भर काम करना है, सप्ताहांत में आराम. इसी आराम में कोई फ़िल्म देखने की इच्छा हुई तो फ़िल्म देख आते हैं, बिना किसी ऐतिहासिक तराजू पर फ़िल्म को तौले हुए.

उनका खानदानी इतिहास राणा प्रताप के घोड़े ‘चेतक’ के साथ ही ख़त्म हो जाता है. बस गुनगुनाने को वे पन्द्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी के दिन प्रदीप की लिखी पंक्तियाँ ‘कूद पड़ीं थी यहाँ हज़ारों पद्मिनियाँ अंगारों पर’ गुनगुना लेते हैं, बिना इतिहास-भूगोल जाने. ‘जौहर’ शब्द सुन कर ही उनके हाथ पाँव फूल जाते हैं. वे कल्पना भी नहीं कर सकते कि ऐसी कोई भी स्त्री जिनसे उनको प्रेम है, उसे वे ज़िंदा आग में कूदते देखें. उनका कान इतिहास की इन सुनी-अनसुनी कहानियों पर सहज भरोसा नहीं करना चाहता. उनका हृदय सिर्फ यह सुनना चाहता है कि उनका परिवार सुरक्षित रहे. उनके स्कूल गये बच्चे ठीक से घर आ जाएं. गांवों में टंडेली कर रहे उनके भाई के बेरोज़गार बच्चे काम पर लग जाएं. इस बार घर में खाने लायक फ़सल हो जाये. हाथ बटाने को लोग मिल जायें. उनकी आँखों की कोर से आँसू छलक आते हैं जब पता चलता है कि खेत में तैयार गेंहूँ की फसल सिर्फ़ इसलिये बर्बाद हो गयी क्योंकि जिन सहयोगी श्रमिकों के घर वे हाथ जोड़ कर साथ देने की गुहार लगा आये थे, वे अचानक से शहर भाग आये हैं. बहुत कष्ट हैं ज़िन्दगी में…

सवाल यह है कि क्या इन कष्टों से रुबरु होते इंसान में इतनी हिम्मत बाकी होती है कि एक फ़िल्म मात्र के विरोध में वह सड़क पर आ जाये. उसी बस पर हमला कर दे जिसमें उसका अपना बच्चा भी हो सकता है?
शायद नहीं… 

ख़ैर, वर्तमान आतंक का इतिहास यह भी कहता है कि राजनीति बुरी चीज़ है. वोट की लीला ने सालों के सौहार्द को पल भर में मसल दिया है. राजस्थान में चुनाव हैं. हार के अंदेशे में रानी एक पूरे वोट बैंक को हथियाना भी तो चाहती है. राजनीति के खिलाड़ी जानते हैं कि झूठे मान-सम्मान के नाम पर बेगारी करवाना सबसे आसान है. बस शामिल कर लिया कुछ बेवकूफों को एक शातिर योजना में. बना दिया एक समस्त कम्युनिटी का पहरेदार, और बाकी लोगों ने भी सहसा इसे मान लिया. वे लड़के जो अपनी बहन की सखी का दुप्पटा तक खींच लेते हैं , वे एक कथित इतिहास की रक्षा करेंगे, यह राजनीति नहीं तो क्या है?

करणी सेना सिर्फ कुछ बेवकूफों का हुज़ूम है, अगर सरकार उन लोगों को भी नियंत्रित करने में नाकाम रहती है तो सिर्फ़ दो ही बात है. पहला यह कि सरकार ख़ुद चाहती है कि यह सब हो. दूसरा यह कि तंत्र अब काम करने के क़ाबिल नहीं रहा. सबसे बुरी बात यह है कि इसका शिकार समाज का सिर्फ एक हिस्सा नहीं बन रहा है. यह लड़ाई बहुमुखी है. आज हथियार और निशाने के तौर पर आम राजपूत समुदाय है कल कोई और समुदाय होगा. हम और आप जितना भी जाति-विहीन समाज बनाने की कोशिश कर लें, एक फ़िल्म आएगी और सब छिन्न-भिन्न हो जाएगा.


अनुशक्ति सिंह। बीबीसी मीडिया से जुड़ी हैं। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा। सोशल मीडिया पर सक्रिय हस्तक्षेप।

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