राकेश कायस्थ

अनुपम जी को मैं बहुत अच्छी तरह जानता था। लेकिन कभी मुलाकात नहीं हुई। एक दिन अचानक उनके किसी सहयोगी (शायद पंकज) ने मुझे फेसबुक मैसेज किया– अपना नंबर भेज दीजिये, गांधी शांति प्रतिष्ठान के अनुपम मिश्र आपसे बात करना चाहते हैं। मैने नंबर भेजा। थोड़ी देर में फोन बजा, विनम्रता आत्मीयता में डूबी एक धीमी आवाज़ आई– भाई मेरा नाम अनुपम मिश्र है, आपका कॉलम हमेशा पढ़ता हूं। बहुत दिनों से आपसे बात करना चाहता था।

मैं हैरान रह गया। मेरे लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने जैसा था। काफी लंबी बात हुई।

अनुपम जी ने लाखों की तादाद में छप चुकी अपनी किताब आज भी खरे हैं तालाब के बारे में भी बताया। मुझे याद है कि उन्होंने ये भी कहा कि उनसे बिना पूछे कई भाषा के प्रकाशक इस किताब को छापकर बेच रहे हैं। अनैतिक है, फिर भी उन्हें इस बात का संतोष है कि चलो उनकी बात तो लोगों तक पहुंच रही है। उन्होंने मुझसे मेरा पता मांगा। उसके चंद दिनों बाद ‘अब भी खरे हैं तालाब’ मेरे घर पहुंच गई। साथ पेंसिल से लिखी चिट्ठी भी थी, जिसमें उन्होंने फिर से मेरा हौसला बढ़ाया था और निरंतर लिखते रहने की सलाह दी थी।

आमतौर पर हिंदी ना पढ़ने वाली मेरी पत्नी ने भी अनुपम जी की किताब पढ़ी और मुरीद हुए बिना ना रह सकी। मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चे और इस देश के तमाम बच्चे भी अनुपम जी के ये किताब पढ़ें ताकि उन्हे समझ में आये कि नदियों-तालाबों से इंसान का रिश्ता क्या है और क्या होना चाहिए। किताब और पत्र मिलने के बाद मैने अनुपम जी का मोबाइल नंबर ढूंढने की कोशिश की तो पता चला कि वे मोबाइल नहीं रखते। लैंडलाइन नंबर मिला, लेकिन बात नहीं हो पाई। इस बीच उनकी बीमारी की ख़बर आई और आज अवसान का दुखद समाचार मिला।

तालाब खरे हैं और खरे रहेंगे। आप तो बहती हुई नदी थे, अनुपम जी। पीढ़ियों को सींचते रहे और आगे भी सींचते रहेंगे। आपको शत-शत नमन।


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राकेश कायस्थ।  झारखंड की राजधानी रांची के मूल निवासी। दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय । खेल पत्रकारिता पर गहरी पैठ, टीवी टुडे,  बीएजी, न्यूज़ 24 समेत देश के कई मीडिया संस्थानों में काम करते हुए आपने अपनी अलग पहचान बनाई। इन दिनों स्टार स्पोर्ट्स से जुड़े हैं। ‘कोस-कोस शब्दकोश’ नाम से आपकी किताब भी चर्चा में रही।

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