अंकिता चावला प्रुथी

फेसबुक पोस्ट, 26 जून 2017। आज की लिस्ट में जो ख़ास रहा वो था वाघा बार्डर जाना। जब मैं पिछले बार अमृतसर आई थी तो वाघा नहीं गई थी। दोपहर के एक बज चुके थे और हमें बताया गया था कि वाघा बॉर्डर आप साढ़े तीन-चार बजे तक पहुंच जाएं, नहीं तो जगह नहीं मिलेगी। हम मंदिर से निकलकर सीधा अटारी की तरफ़ चल पड़े। हमारी अमृतसर की यात्रा या अमृतसरी किस्सों का ये सबसे भावुक मोड़ था। रास्ते में जहां-जहां अटारी या वाघा बार्डर के बोर्ड नज़र आ रहे थे, मैं हर एक बोर्ड को तस्वीरों में उतारती जा रही थी।

धीरे-धीरे दूरियां कम हो रही थीं,और मेरे मन में बेचैनी बढ़ती जा रही थी- “ अभी थोड़ा टाईम है हमारे पास, आओ पहले हम लंच कर लेते हैं। पता नहीं फिर कब वक़्त मिले?” अभी हम अटारी की तरफ़ जा रहे थे, तो संदीप ने कहा। तभी पीछे की सीट से आवाज़ आई- “ मैं रोग़न जोश खाऊंगी”। सानवी को रोग़न जोश बेहद पसंद है। वैसे रास्ते में बीएसएफ़ का कैंप दिखा। रणीके नाम की जगह भी आई, तो दाना मंडी भी और फिर हमें दिखाई दिया अटारी का बोर्ड। अटारी के सामने से हम गुज़र रहे थे।

अटारी, पंजाब की सीमा से लगता आख़िरी गांव। इसके तीन किलोमीटर पर वाघा बार्डर और फिर उसके बाद पाकिस्तान की सरहदें शुरू हो जाती हैं। अटारी भी दिखने में ठीक वैसा ही था जैसा बाकी दूसरे गांव होते हैं। लेकिन बॉर्डर से सटे होने के कारण इस छोटे-से गांव का नाम दुनिया भर में मशहूर है। दुकानों पर चहलकदमी दिखाई पड़ रही थी। मैंने एक बार फिर बोर्ड की तस्वीर ली और हम अटारी स्टेशन की तरफ़ चल पड़े। स्टेशन जाने के लिए बाएं हाथ को मुड़ना पड़ता है और लगभग एक-डेढ़ किलोमीटर के बाद आपको दिखाई देगा- एक सिरे से देश का आख़िरी स्टेशन।

अंदर जाने की मनाही नहीं थी। बाहर ड्यूटी पर बैठे पुलिस अफ़सर बेहद मिलनसार थे। मेरा दिल धुक-धुक कर रहा था। हम आख़िरी स्टेशन पर खड़े थे, जिसका एक छोर मेरे देश के पंजाब में मिल रहा था और दूसरा सिरा उसके बंटे हुए हिस्से में। रेलवे ट्रैक कई किलोमीटर तक दिखाई पड़ रहा था। मन में सवाल उठ रहे थे- इसके आगे कहां जाएगा ये ट्रैक? कितनी और दूरी पर है लाहौर ? तभी दूर कहीं से ट्रेन की आवाज़ सुनाई पड़ी- मैंने तुरंत पुलिस अफ़सर से पूछा “ ये आवाज़ कहां से आ रही है ?? क्या कोई ट्रेन आ रही है ? “ तो उन्होंने कहा “ नहीं जी ये आवाज़ तो पाकिस्तान की तरफ़ से आ रही है। वहां खड़ी रहती है ट्रेन। वैसे भी सिर्फ़ समझौता एक्सप्रैस ही नहीं चलती ना, मालगाड़ियां भी आती जाती रहती हैं”।

मैंने गहरी सांस ली। कुछ ऐसा ही एहसास मुझे तब हुआ था जब कन्याकुमारी से लौटते हुए सड़क का सिमटता हुआ रास्ता देखा था। वो रास्ता जहां सड़क के आगे कुछ नहीं था। बस वहीं तक ही थी सड़क। उसके थोड़ी आगे जाने पर विशालकाय महासागर का द्वार खुला था। बस इसके आगे कुछ नहीं। यहां ज़मीन सिमट जाती है ? “ तुम ख़्यालों में ग़ुमी रहोगी तो वाघा बॉर्डर में एंट्री बंद हो जाएगी”। संदीप ने मुझे बुलाया और यादें समेटने को कहा- हमने कई सारी तस्वीरें क्लिक कीं।

स्टेशन के बोर्ड के पास- संदीप और सानवी की कई तस्वीरें। बजरंगी भाईजान फ़िल्म के बजरंगी और मुन्नी के स्टाइल में। संदीप के पीठ पर चढ़ी हमारी मुन्नी, हवा में उछालते हुए मुन्नी औऱ बजरंगी। मैंने जाते-जाते कई दफ़ा स्टेशन को देखा। पुलिसवालों को सलाम किया और फिर हम लंच करने के लिए जा पहुंचे सरहद रेस्त्रां। ये अटारी गांव और स्टेशन के बीच में ही पड़ता है। हमने कार पार्क की और वहां पहुंचते ही हमें टैम्पो नज़र आए, जिस पर लिखा था इंडिया-पाकिस्तान दोस्ती ज़िंदाबाद।

रेस्त्रां सरहद के नज़दीक था इसलिए इसका नाम सरहद ही रखा गया। शायद नाम ही काफ़ी था लोगों को यहां खींचने के लिए। हमें मैन्यू में लाहौरी पकवान नज़र आए क्योंकि वाघा बॉर्डर के नज़दीक लाहौर पड़ता है, इसलिए उसी को फ़ोकस किया गया था। वैसे भी लाहौर बंटवारे से पहले पंजाब का ही तो हिस्सा था। वहां आज भी पंजाबी बोली जाती है। (मैंने ज़िंदगी चैनल पर आए पाकिस्तानी सीरियल्स में देखा था )। हमने लाहौरी निहारी गोश्त मंगवाया। असली लाहौरी निहारी गोश्त के ज़ायक़े का तो पता नहीं पर हां सरहद रेस्त्रां में मिलने वाला गोश्त हमें ठीक लगा। ठीक इसलिए भी लगा क्योंकि अमृतसर के इस सफ़र में हमने अभी तक वेजेटेरियन खाना ही खाया था। निहारी गोश्त इस सफ़र की पहली नॉन वेज डिश रही।

रेस्त्रां में लोगों की भीड़ बढ़नी शुरू हो गई थी। कुछ लोग खाकर निकलने लगे। सभी लोगों को वाघा बॉर्डर जो पहुंचना था। हमने भी ज़्यादा देर नहीं लगाई। जल्दी से बिल चुकता किया और फिर गाड़ी में बैठकर चल पड़े एक यादगार पल का गवाह बनने। डेढ़-दो किलोमीटर के बाद जो हमने देखा वो कम से कम मेरी कल्पना से तो परे था। मुझे इस बात का कतई इल्म नहीं था कि लोगों को हुजूम हर रोज़ इस परेड को देखने आता है। लोगों की भारी भीड़, कुछ टूरिस्ट बसों पर सवार होकर, कुछ लोकल बसों में सफ़र करके, सैकड़ों अपनी गाड़ियों को पार्किंग में लगाकर, कुछ वीआईपी पास के सहारे तो कुछ होहो बस की तरह ही पर्यटन विभाग की बसों की छत पर बैठकर एक ही दिशा में बढ़े चले जा रहे थे।

इतनी भीड़ देखकर हमने भी फ़ुर्ती दिखाई और गाड़ी को पार्क कर तेज़ी से आगे बढ़ने लगे। हमने गाड़ी के अंदर ही बैग, कैमरा बैग, फ़ोन रख दिया था। हमारे हाथ में सिर्फ़ वॉलेट, पानी की बोतल और कैमरा था। महिलाओं और पुरुषों को पहले ही अलग-अलग चलने का निर्देश था। मैं और सानवी पहले तेज़-तेज़ चलने लगे और फिर दौड़ने लगे। जल्दी इसलिए भी थी कि इस बार हम कोई वीआईपी पास लेकर नहीं गए थे। इसलिए अच्छी सीट का मिलना बेहद ज़रूरी था। चेकिंग के लिए महिलाओं की लाइन काफ़ी लंबी थी। इसलिए हमें ज़्यादा वक़्त लगा लेकिन जैसे ही हम वहां से निकले मैं, संदीप और सानवी दौड़ने लगे। सांस फूलने लगी थी लेकिन फिर भी जोश कमा न था।

जैसे ही हम मेन गेट के पास पहुंचे तो सबसे पहले हमें दिखा माइलस्टोन, जिस पर लिखा था- ‘बीएसएफ़- द फ़र्स्ट लाइन ऑफ़ डिंफ़ेंस। उसके पीछे ही कुछ कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था। शायद यहां आती भीड़ को देखकर इसे और बड़ा करने का इंतज़ाम किया जा रहा था। उस स्टेडियमनुमा जगह का एक हिस्सा तो पूरी तरह से हाउसफुल हो चुका था। लोग सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर की तरफ़ जा रहे थे। मुझे इतनी ऊपर से नहीं देखना था। “ अरे देखो ये नीचे जगह है बैठने की, यहीं बैठ जाते हैं।” मैंने संदीप से कहा और हमें पहली सीढ़ी पर जो जगह मिली हम बस वहीं बैठ गए।

बहुत हलचल सी मची हुई थी मेरे मन में। हम बॉर्डर पर थे। सानवी को भी उस भीड़ का हिस्सा बनने में बहुत मज़ा आ रहा था। लेकिन हमें नीचे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था क्योंकि हमारे आगे बैरीकेट लगे हुए थे और ऊपर से भीड़ बढ़ती जा रही थी। मुझे कोफ़्त मच रही थी कि इतने में कुछ स्कूली बच्चों को वहां मौजूद कैप्टन ने बुलाया। हमारे हिस्से में ज़ोर-ज़ोर से देशभक्ति गीत बज रहे थे और वो बच्चियां एक-एक कर झंडा फहराती हुई सीमा तक दौड़ लगा रही थीं। इतने में कैप्टन ने मुझे इशारा किया और कहा आप वहां चले जाओ। मैं इस सुनहरे मौक़े को कैसे छोड़ सकती थी, सरहद पर अपने देश का तिरंगा लेकर दौड़ने के क्या मायने हैं ? या कैसा अनुभव होता है, ये वैसे किसी भी कल्पना से परे है।

मैंने तुरंत सानवी को खींचा और कतार में जाकर लग गई। एक-एक कर के पहले सानवी का नंबर आया, उसने अपने नन्हें हाथों में मज़बूती से तिरंगे को पकड़ा और दौड़ पड़ी दुनिया को दिखाने कि हमारे देश से अच्छा कोई दूसरा देश नहीं। उसके तुरंत बाद मेरा नंबर था। मैं उसके पीछे-पीछे दौड़ पड़ी, हाथों में तिरंगा, चेहरे पर फ़ख़्र का तेज, तो मन भावनाओं के समंदर में बह रहा था। खुशी भी थी और आंखों में आंसू भी थे। मैं ज़ोर-ज़ोर से झंडे को लहराते हुए बॉर्डर के नज़दीक बैरीकेट तक गई, नज़र सरहद पर टिकी रही जब कि मैं वहां से वापस नहीं लौट आई। मैं बहुत-बहुत-बहुत ज़्यादा ख़ुश थी। संदीप की भी ख़्वाहिश थी वहां जाने की, उस लम्हे को जीने की लेकिन वहां पर सिर्फ़ लड़कियों और महिलाओं को ही बुलाया गया था। पर हां उन्होंने हमारे इन अविस्मरणीय पलों का वीडियो बनाकर सहेज लिया था।

अब हम अपनी सीट पर बैठ चुके थे पर वहां से दिख कुछ नहीं रहा था। पाकिस्तानी खेमे में बैठे लोग तो दूर की बात थे, हमें अपने जवान भी नज़र नहीं आ रहे थे। मैंने पास ही खड़े एक जवान से कहा। थोड़ी देर तक तो वो ख़ामोश रहे फिर इशारे से उन्होंने वीआईपी साइड की तरफ़ इशारा कर कहा, वहां चले जाओ। दरअसल मैंने उनसे सीट बदलने की दरख़्वास्त की थी। मैंने कहा- “ मेरे साथ तो मेरे पति और बच्चा भी है “ उन्होंने कहा आप जाओ, मैं वहां से उठी और एक महिला अफ़सर से जाकर बोली कि सामने सर ने कहा कि मैं यहां बैठ जाऊं। पता नहीं क्या कंफ़्यूजन थी, उन्होंने भी बिलकुल बॉर्डर के नज़दीक बने स्टैंड में जाकर बैठने को कहा। मैंने तुरंत संदीप को इशारा किया और साथ ही पहले सिपाही को भी इशारा किया कि हमें वहां बैठने के लिए कहा गया है। ये भी भगवान की मेहरबानी ही थी कि हमें उम्दा जगह पर बैठने का मौक़ा मिला।

इस बार हम कोई वीआईपी जुगाड़ के साथ नहीं गए थे, इसलिए अपनी कोशिश से ही सारे जुगाड़ करने थे। हम बीच की एक सीढ़ी पर बैठ गए। अब यहां से हमें सब साफ़ नज़र आ रहा था। पाकिस्तानी खेमे में बैठे दर्शक, वहां के सिपाहियों के करतब, उनके गीत और गीतों पर बजती तालियां। हमारे और उनके बीच में फ़ासला था ही कितना ? फ़ासले तो पैदा किए गए थे। आज भी जब मेरी मम्मी बंटवारे का दर्द साझा करती हैं तो सिहरन दौड़ जाती है। अपनी ज़मीन-जायदाद, हवेलियां, नौकरियां, रिश्ते-नाते पीछे छोड़ कर आए थे। कई बार मेरा मन भी होता है कि देख कर आऊं, सयालकोट है कैसा ? मुल्तान की मिट्टी कैसी है ? लाहौर में रहने वाले क्या हमारे पंजाबियों जैसे ही हैं ? लेकिन सोच को बस वहीं रोक लेती हूं क्योंकि सोच को काबू में करना मेरे बस में है, वहां जाना मेरे बस में नहीं।

भावनाओं में तो मैं उस वक़्त पूरी तरह से बह चली थी। हमारे सामने खड़े कैप्टन ज़ोर-ज़ोर से भारत माता की जय, वंदे मातरम के नारे लगवा रहे थे और हम उतनी ही ज़ोर से बोल कर उस भीड़ में उठती आवाज़ों का हिस्सा बन गए थे। पूरे स्टेडियम में जोश-जुनून था। तभी बीटिंग रिट्रीट का कार्यक्रम शुरू हुआ। जिस जोश से सैनिक अपनी वीरता और शौर्य का मुजाहिरा कर रहे थे उतनी ही जोश-ओ-खरोश से हमारे खेमे में बैठे दर्शक उनका उत्साह बढ़ा रहे थे। दूसरी तरफ़ पाकिस्तानी खेमे में भी हलचल की आवाज़ें आ रही थीं। उधर से आती आवाज़ों को हम हिंदुस्तानी अपनी आवाज़ों को बुलंद करके दबाने की कोशिश करते रहे। देश के लिए प्रेम क्या होता है ? जुनून क्या होता है ? किसी ने देखना है तो वाघा बार्डर पर एक बार जाकर ज़रूर देखें। वहां तो सिर्फ़ हज़ारों की भीड़ थी, हमारे देश में ऐसी करोड़ों आवाज़ें उठती हैं, जिनकी गूंज सरहद पार भी सुनाई पड़ती हैं।

ख़ैर अब दोनों ओर पूरे विधिपूर्वक झंडों को उतारा गया। उसके बाद जैसे ही कार्यक्रम ख़त्म हुआ लोग सरहद की तरफ़ बढ़ने लगे। वहां हर किसी को जाने की इजाज़त नहीं होती। भीड़ में कभी इधर और कभी उधर धक्के खाने के बाद हमें मौक़ा मिला देश की सरहद को नमन करने का। उसको छूने का, उसके आगे नतमस्तक होने का। हमने यादों को तस्वीरों में क़ैद किया। ना जाने फिर ऐसा संयोग कब मिले। हमने सभी का शुक्रियाअदा किया एक बार फिर सरहद को देखा, सरहद के उस पार भी देखा। सूरज सरहद के दूसरे छोर पर दिखाई दे रहा था- पश्चिम में… ढलता हुआ… हम सब को रुख़सत करता हुआ…


ankita profileअंकिता चावला प्रुथी। दिल्ली में पली बढ़ी अंकिता ने एक दशक से ज्यादा वक्त तक मीडिया संस्थानों में बतौर एंकर और प्रोड्यूसर कई शानदार शो किए। इन दिनों स्टुडियो जलसा के नाम से अपना प्रोडक्शन हाउस चला रही हैं। टोटल टीवी, न्यूज नेशन और सहारा इंडिया चैनल में नौकरी करते हुए मीडिया के खट्टे-मीठे अनुभव बटोरे।

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