अनिल तिवारी

वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल तिवारी जी ने अपनी रंग यात्रा को फेसबुक पर एक सीरीज में साझा किया है। उनका ये सिलसिला जारी है। एक रंगकर्मी की ज़िंदगी के ऐसे अनकहे किस्से कम ही देखने को मिलते हैं। हम ये सीरीज बदलाव के पाठकों से भी साझा कर रहे हैं।

मैं आभारी हूँ, श्री पार्थ सारथीजी,राजेश चन्द्रा जी,अभय दुबे जी, सुल्तान अहमद रिजवी जी, अनिल मिश्रा जी, अजीत सिंह जी, दयानन्द शर्माजी और अपने अभिन्न मित्रों का, जिन्होंने मुझे मेरे रंग अनुभव के 50 बर्ष (यादें) लिखने के लिये प्रोत्साहित किया।

सन 1953 की जुलाई माह का शनिवार, जिस दिन गुरु पूर्णिमा का त्यौहार भी था। सभी श्रद्धालुजन अपने-अपने गुरुजनों के पूजन मेंं व्यस्त थे। इसी दिन सांय 4-30 बजे तीन बीघा जमीन पर निर्मित 17 विजय नगर कॉलोनी, आगरा उत्तर प्रदेश में एक बालक ने जन्म लिया। जिसके दादा जी पंडित छेदा लाल शर्मा (चीफ इंजीनियर आगरा) एवं नाना पंडित वासुदेव सहाय शर्मा, प्रख्यात गणितज्ञ होने के साथ ही साथ स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी थे। यह दोनों परिवार आगरा शहर के प्रतिष्ठित परिवार थे।

वीके तिवारी, अनिल तिवारी के पिता

वहीं पिता श्री वी के तिवारी भोपाल स्टेट में जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर आसीन थे (तब तक मध्यप्रदेश का गठन नहीं हुआ था। वो अलग राज्य बना ही नहीं था।) माँ शीला रानी तिवारी, सात भाईयों के बीच अकेली बहन थी और पांच भाईयों से बड़ी होने के नाते एवम् पिता की लाडली होने के कारण सात वर्ष की आयु से ही स्वतन्त्रता संग्राम में कूद पड़ी थीं। वो इंदिरा गाँधी द्वारा बनाई गई ‘बानर सेना’ का अहम् भाग थीं।

मेरे रंग अनुभव के 50 बर्ष – एक और दो

मैं आभारी हूँ श्री ब्रजेश अनय जी भोपाल का, जिन्होंने मुझे सर्व प्रथम ‘मेरे रंग अनुभव’ को धारावहिक रुप से फेसबुक पर प्रकाशित करने का मेरे भोपाल प्रवास के दौरान हक पूर्वक कई बार आग्रह किया था। उन्हीं के आग्रह का परिणाम आज आप सभी के समक्ष है। यह वो समय था जब किसी महिला का हाईस्कूल पास होना ही बहुत बड़ी बात हुआ करती थी। उस समय मेरी माँ डबल एमए (मनोविज्ञान और समाज शास्त्र), एलएलबी थी।

आप सोचिये स्वतन्त्रता संग्राम में कूदने के बाद भी उन्होंने पढाई नहीं छोड़ी। इसका लाभ उन्हें मिला और उन्होंने भारत के स्वतन्त्र होने के बाद नेतागीरी न करते हुये भोपाल स्टेट सरकारी नौकरी करने को प्राथमिकता दी। और मेरे पिताजी से भी ऊँचे पद पर आसीन हुईं। उस समय के सभी बड़े कांग्रेसी नेता चाहते थे कि वो राजनीति में आयें, जिसमें लाल बहादुर शास्त्री, कमला पति त्रिपाठी जैसे दिग्ज नेताओं का आग्रह भी शामिल था। पर माँ की सोच थी कि जिस कार्य का हमने बीड़ा उठाया था, वो अब पूर्ण हो गया है, इसलिये अब हमें देश की मुख्यधारा में शामिल हो जाना चाहिये।

खैर, पिताजी से बड़ा पद होने के कारण, आगरा में बैठी मेरी दादी माँ को यह गंवारा न हुआ और एक दिन वो आगरा से भोपाल आ हीं गईं। और आखिरकार माँ को नौकरी छोड़नी पड़ी और अपना बाकी जीवन एक आम गृहस्थ महिला की तरह गुजारने के लिये विवश होना पड़ा।

अनिल तिवारी की मम्मी।

दादी के वापस आगरा चले जाने के पश्चात माँ ने कवितायें लिखना प्रारम्भ कर दीं और विभिन्न कवि सम्मेलनों में शिरकत करना प्रारम्भ कर दिया। साथ ही पिताजी के आग्रह पर नृत्य की कक्षायें भी ज्वाइन कर लीं।आगे चलकर माँ ने अपने अनेक नृत्य के कार्यक्रम देश के विभिन्न शहरों में दिये और विभिन्न कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करती रहीं। पर दादी से छुप कर। यह सिलसिला करीब बीस साल तक चला। इस बीच भोपाल स्टेट मध्य प्रदेश में मर्ज हो गया और पिताजी विभिन्न स्थान्तरनों को झेलते हुये ग्वालियर आ गये। ग्वालियर क्योंकि आगरा से अति नजदीक है, अतः माँ की सभी गतिविधि का पता दादी को लग ही गया। तो जो होना था वही हुआ और मेरी माँ का बाकी जीवन फिर गृहस्थी में ही कैद होकर रह गया।


अनिल तिवारी। आगरा उत्तर प्रदेश के मूल निवासी। फिलहाल ग्वालियर में निवास। राष्ट्रीय नाट्य परिषद में संरक्षक। राजा मानसिंह तोमर संगीत व कला विश्वविद्यालय में एचओडी रहे। आपका जीवन रंगकर्म को समर्पित।

संबंधित समाचार