अनिल तिवारी

बीआईसी के मुख्य नाट्य निर्देशक थे सत्य पाल सोलंकी और श्री के सी वर्मा। सोलंकीजी एक नाट्य संस्था और चलाते थे जिसका नाम था- अभिनव कला केन्द्र। इसी तरह श्री के सी वर्मा भी उस समय की प्रख्यात नाट्य संस्था ‘कला मंदिर’ के महा सचिव थे। कहने का अर्थ है कि बीआईसी का अपना कोई निर्धारित नाट्य निर्देशक नहीं था। कुछ समय के बाद लिटिल बैले ट्रुप (एलबीटी) के कोरियो ग्राफर और विश्व प्रसिद्ध श्री प्रभात गांगुली दादा भी बीआईसी से जुड़ गये
थे। प्रभात दा के बीआईसी में प्रवेश के बाद वर्माजी और सोलंकीजी ने बीआईसी से किनारा ही कर लिया।

मेरे रंग अनुभव के 50 वर्ष –11

फिर श्री सत्य पाल सोलंकी कभी-कभी बीआईसी घूमने आते थे और के सी वर्मा चूंकि जे सी मिल्स स्कूल में ही शिक्षक थे, इसलिये उन्हें मन मार कर भी बीआईसी में आना पड़ता था। प्रभात दा के आदेशों का पालन भी करना पड़ता था। पर निर्देशन से उन्होंने पूरी तरह से संन्यास ले लिया था। इसके बाद मैंने उनके जीते जी, कभी उन्हें न तो नाटकों में अभिनय करते देखा और न उन्होंने अपनी बाकी बची जिन्दगी में किसी भी नाटक का निर्देशन किया। श्री के सी वर्मा फिर फुल टाईम नौकरी के अलावा कला मंदिर के महासचिव ही हो कर रह गये। इसी तरह श्री सत्य पाल सोलंकी ने भी रंगमंच से लगभग संन्यास ले लिया और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में एनाउंसर हो कर रह गये। हाँ यह सही है कि उन्होंने एनाउन्सिंग में बाद में काफी नाम कमाया और वो ग्वालियर के स्टार एनाउन्सर कहलाते थे।

इस प्रकार बीआईसी में दादा प्रभात गांगुली की एन्ट्री से दो महान रंगकर्मियों की रंगक्षेत्र में मृत्यु हो गई। फिर प्रभात दा भी आगे चल कर ग्वालियर छोड़ कर भोपाल शिफ्ट हो गये। दादा के भोपाल शिफ्ट होने की भी एक लम्बी कहानी है जो पूरी तरह से षडयंत्र भरी है। जिसका प्रभाव ग्वालियर रंगमंच पर बहुत ही बुरा पड़ा। इसका काफी विरोध हुआ था और भयानक हिंसा की आशंका उस बीच शहर में बराबर बनी हु ई थी। पर यह सारा खेल बहुत ऊँचे स्तर पर ग्वालियर के साथ खेला गया था जिसमें उस समय के एक प्रख्यात आईएएस, जो मध्य प्रदेश की कला संस्कृति के उस समय महान ठेकेदार थे और राष्ट्रिय नाट्य विद्यालय से कुछ ही साल पहले पास आउट हुये विद्यार्थी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जिसका जिक्र मैं आगे चलकर जब सन्दर्भ आयेगा तब नाम सहित करुँगा। अभी बात बीआईसी के नाटकों की।

बीआईसी के नाटक जहाँ अपने भारी भरकम सेट्स के लिये प्रसिद्ध थे वहीं रियलिस्टिक अभिनय में इन नाटकों का कोई मुकाबला नहीं था। नाटक का सेट नाटक के शो होने की तारीख से दस दिन पहले से ही बनना शुरू हो जाता था और इस सेट के लिये फैक्टरी से कारपेन्टर्स की एक टीम दस दिन के लिये टैगोर हाल में अपना पड़ाव डाल देती थी। इसके साथ ही साथ हम तीन-चार कलाकारों का पड़ाव भी टैगोर हाल हो जाता था। जिसमें अश्वनी शर्मा,आनन्द बिरमानी और मैं मुख्य हुआ करते थे। हम रात भर कारपेंटर्स के साथ नाटक के सेट बनाने के लिए जागते रहते थे। इस नाटक के सेट का खर्च उस समय यानि 19 70-71 में लगभग 40 से 50 हज़ार तक आता था। फिर कॉस्ट्यूम का खर्च अलग।


अनिल तिवारी। आगरा उत्तर प्रदेश के मूल निवासी। फिलहाल ग्वालियर में निवास। राष्ट्रीय नाट्य परिषद में संरक्षक। राजा मानसिंह तोमर संगीत व कला विश्वविद्यालय में एचओडी रहे। आपका जीवन रंगकर्म को समर्पित रहा।

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