अनिल तिवारी

ग्वालियर के बिड़ला नगर में दिन बीत रहे थे। दादागीरी के साथ मेरी जिन्दगी में रंगमंच की अहमियत बढ़ती जा रही थी। यह नहीं था कि सब अच्छा ही अच्छा हो रहा था। इसमें भी अनेक व्यवधानों ने समय-समय पर अपनी आवक दर्ज कराई। कई बार मैं अपनी हत्या के षडयंत्रों से मुक्ति पा पाया था। यदि कहीं जरा सी भी चूक हो जाती तो मैं आज यह सब लिखने की स्थिति में ही नहीं होता।

मेरे रंग अनुभव के 50 वर्ष –10

बीआईसी के बैनर तले नाटक का मंचन कर कलाकार बिरला नगर के दर्शकों का ‘हीरो’ हो जाता था। जब तक दूसरा नाटक नहीं होता, तब तक तक कलाकार को नाटक में अभिनीत किये गये कैरेक्टर के नाम से ही शहर में पुकारा जाता था। जब दूसरे नाटक का मंचन हो जाता तो पहला नाम गुम जाता था और दूसरा नाम दे दिया जाता था। जैसे- मेरा नाम उस समय के प्रख्यात नाटककार रमेश मेहता लिखित नाटक ‘अपनी कमाई’ में काका था तो मैं नाटक के शो के बाद काका नाम से ही विख्यात हो गया था। शहर में लोग मुझे काका के नाम से ही पुकारते थे।

आगरा से मेरे कुछ रिश्तेदार आये हुये थे और सभी ग्वालियर रेयन के कपड़े खरीदना चाहते थे। उनका लालच सिर्फ इतना था कि सभी कपड़ों पर मेरे कारण 50% का डिस्काउन्ट मिल जाए। मैं उन सभी को साथ ले कर बिड़ला नगर में जैसे ही घुसा कि बच्चों की एक टोली हम लोगों के पीछे लग गयी। इस टोली में धीरे-धीरे और इजाफा होता गया। मतलब शुरू में इस टोली में करीब 10-15 बच्चे ही थे और धीरे-धीरे इनकी संख्या लगभग 100 के करीब पहुँच गई। अब मैं और मेरे सारे रिश्तेदार आगे-आगे और बच्चों की टोली हमारे पीछे-पीछे। सभी जोर-जोर से चल्ला रहे थे- बुद्धू- बुद्धू- बुद्धू।

कॉलोनी के तमाम लोग बच्चों को डांटते रहे, भगाते रहे, पर बच्चे पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे। हमारे सारे रिश्तेदार भी आश्चर्य चकित थे कि यह सब क्या हो रहा है ? तब मैंने उन्हें बताया कि अभी हाल ही में मैने सतीश डे लिखित नाटक ‘किसका हाथ’ में हास्य कलाकार ‘बुद्धू’ का कैरेक्टर किया है, इसी का परिणाम है यह सब। तब सभी हँसने लगे- हाहाहा।

अब जरा ग्वालियर रेयन की तरफ मुड़ते हैं। ग्वालियर रेयन उस समय का ब्रान्डेड कपड़ा हुआ करता था जो पूरे विश्व में फेमस था। आप विश्व के किसी भी एयरपोर्ट पर उतरें तो उस समय प्रत्येक एयरपोर्ट पर आपको एक बड़ा सा बोर्ड जरूर मिलता था, जिस पर लिखा होता था -‘ग्वालियर रेयन, आपका स्वागत करता है’ । तब ग्वालियर रेयन और जे बी मंघाराम बिस्किट्स की वजह से पूरे विश्व में ग्वालियर को जाना जाता था। और रेयन के कपड़े और जेबी मंघाराम के बिस्किट्स ग्वालियर में गज या मीटर से नाप के नही बल्कि किलो के भाव से हाथ ठेलों पर गली मोहल्लों में बिका करते थे। जबकि और जगहों पर रेयन मीटर के हिसाब से और जे बी मंघाराम पैकिट्स के हिसाब से बिकते थे।

पूरे विश्व में ग्वालियर रेयन का सूट सिर्फ पैसे वाले ही पहन पाते थे जब कि ग्वालियर के छोटे बड़े मध्यम और यहां तक कि गरीब से गरीब आदमी के पास कम से कम एक सूट ग्वालियर रेयन का जरुर होता था। उसका मुख्य कारण कपड़े का कटपीस में बिकना और वो भी तौल कर बिकना था। मतलब 100 रु का कपड़ा ग्वालियर में दस रुपये का मिलता था। फिर रेयन का बिड़ला नगर में अपना शो रुम भी था जिस पर कपड़ा मीटर के हिसाब से ही मिलता था पर ग्वालियरवासियों के लिये वैसे ही 50%की छूट होती थी और उस 50% के कपड़े पर हम कलाकारों को और 50% मिल जाता था। इस प्रकार अन्य शहरों में यदि इसकी कीमत 100₹थी तो ग्वालियर में फ्रेश कपड़े की कीमत शो रुम पर 50₹ और यदि हमारे द्वारा लेते हो तो 25₹। इसलिये सारे रिशतेदार ग्वालियर हमारे घर आते ही रहते थे।और यही हाल जे बी मंचाराम बिस्कुट्स का भी था कि टुकड़ों में ग्वालियर के गली मोहल्लों में बिकते थे।

अब दोनों फैक्ट्रीज बन्द हो चुकी है और बिड़ला नगर वीरान।


अनिल तिवारी। आगरा उत्तर प्रदेश के मूल निवासी। फिलहाल ग्वालियर में निवास। राष्ट्रीय नाट्य परिषद में संरक्षक। राजा मानसिंह तोमर संगीत व कला विश्वविद्यालय में एचओडी रहे। आपका जीवन रंगकर्म को समर्पित रहा।

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