राकेश कायस्थ के फेसबुक वॉल से साभार

लंबे समय बाद गलती से न्यूज़ चैनल ऑन कर बैठा। सबसे हाहाकारी क्राइम शो में सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा की तस्वीरें कुछ इस अंदाज़ में घुमाई जा रही थीं, जैसे जेल तोड़कर भागे शातिर अपराधी हों। न्यूज़ चैनलों पर बात करना अब समय की बर्बादी लगती है। फिर भी कुछ बातें लिखना मजबूरी है। यह एक ऐसा दौर है, जब मीडिया संस्थानों के बड़े पदों पर बैठे कई लोगों को भी निष्पक्ष मीडिया शब्द सुनते ही दौरा पड़ जाता है। वे पुरानी कहानियां दोहराते हैं, आपसे झगड़ने आते हैं और पूछते हैं कि मीडिया तो पहले भी निष्पक्ष नहीं था तो फिर आप इस समय क्यों इस बात की दुहाई दे रहे हैं? इनमें से ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जिन्होने 2014 के बाद होश संभाला है। ज़ाहिर है, बहस का कोई फायदा नहीं है।
मैं भारतीय मीडिया के संकट को मोदी युग के संकट से परे देखता हूं। मोदीजी एक दिन रिटायर हो जाएंगे लेकिन यह देश कभी रिटायर नहीं होगा। बेशक भारत में सतयुग लौट आये और फिर से दूध की नदियां बहने लगें लेकिन दूध में मक्खी कहां गिरी यह बताना वाला भी कोई तो होना ही चाहिए। इसलिए मीडिया की ज़रूरत हमेशा बनी रहेगी।
अब सबसे बड़ा सवाल क्या इस देश का नागरिक समाज वाकई निष्पक्ष मीडिया की ज़रूरत महसूस करता है? अपराधी मुक्त संसद, ईमानदार सरकार और निष्पक्ष न्यायपालिका की बातें तो कभी-कभार सुनने को मिल भी जाती हैं, लेकिन क्या नागरिक समूह कभी इस बात को लेकर आवाज़ बुलंद करता है कि उन्हे स्वतंत्र मीडिया चाहिए? जो थोड़े बहुत लोग इस बारे में कुछ बोलते सुनाई देते हैं, वे ‘बुद्धिजीवी’ करार दिये जाते हैं। ज़ाहिर है, जहां मूर्खधारा ही मुख्य धारा हो और बुद्धिहीनता गर्व करने लायक चीज़ बना दी गई हो, वहां चंद आवाज़ें सुने कौन?
सिविल सोसाइटी नाम की चीज़ अब लगभग खत्म हो चुकी है। देश में अब दो ही प्रजातियां हैं- कंज्यूमर और कोर वोटर। इस देश का पूरा तंत्र इन्हीं प्रजातियों के दिमाग पर राज करने की नीयत से संचालित होता है। आर्थिक उदारीकरण के बाद से भारत के इंस्टीट्यूशन एक-एक करके खत्म किये जाने लगे। मीडिया इन कोशिशों का पहला और सबसे बड़ा शिकार था। फलते-फूलते संपादक और पत्रकार कभी यह समझ नहीं पाये कि वे एक ऐसे रास्ते पर धकेले जा रहे हैं, जहां से पीछे लौटना एक दिन लगभग नामुमकिन हो जाएगा।
मैं हमेशा से मानता आया हूं कि मीडिया के मौजूदा स्वरूप के लिए सिर्फ पत्रकारों को दोष देना ठीक नहीं है। संपादक नाम की स्वतंत्र संस्था आज से बहुत पहले खत्म हो चुकी थी। रिमोट पूरी तरह मालिकों के हाथ हैं और एंकर से लेकर स्टार रिपोर्टर तक महज कठपुतलियां हैं। कॉरपोरेट मीडिया लोकतंत्र की सलामती की लड़ाई लड़ पाएगा इस बात की उम्मीद छोड़ दीजिये।
तो फिर विकल्प क्या है? जवाब उन वरिष्ठ पत्रकारों को भी ढूंढना चाहिए जिनकी आंखों के सामने और जिनके नेतृत्व में भारतीय मीडिया का क्रामिक पतन हुआ है। मुझे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के वो शुरुआती दिन याद हैं, जहां कई लोग बेसिक्स ऑफ जर्नलिज्म की बात करते थे, एथिक्स की बात करते थे और उन्हें हिकारत के भाव से देखा जाता था। यह माना जाता था कि वे ओल्ड फैशंड लोग हैं और नये जमाने के दर्शकों तक वैसी ख़बरें संप्रेषित करने में सक्षम नहीं हैं, जो अपील करे। ऐसे तमाम ‘ओल्ड फैशंड’ लोग एक-एक करके न्यूज रूम से बाहर होते चले गये।
इस देश की पत्रकारिता लगभग मर चुकी है। पत्रकारिता बचेगी तभी लोकतंत्र बचेगा। कॉरपोरेट संचालित मीडिया उस युद्ध में बराबर का भागीदार है जो इस देश की जनता के खिलाफ और उसी के संसाधनों से लड़ा जा रहा है। अगर इस देश को लोकतंत्र और निष्पक्ष मीडिया चाहिए तो उसे विकल्पों की ओर देखना होगा। चंदे से चलने वाले कई छोटे मीडिया समूह प्रभावशाली ढंग से अपना काम कर रहे हैं। इन्ही में एक नाम द वायर है। ऐसे कई और नाम हैं। लेकिन भारत जैसे विशाल देश की ज़रूरतें ऐसी कुछ संस्थाओं से पूरी नहीं होंगी।
इस देश को वैकल्पिक मीडिया के ऐसे मॉडल खड़े करने होंगे जो बिना कॉरपोरेट फंडिंग के और तमाम राजनीतिक दलों से सामान दूरी बरतते हुए चल सकें। ऐसे पूर्व संपादकों को इस दिशा में पहल करनी चाहिए जिनका ट्रैक रिकॉर्ड बेदाग रहा है। ईएमआई और बच्चों की फीस के चक्कर में फंसे अधेड़ पत्रकार इस बारे में मदद नहीं कर सकते लेकिन उन्हे यथासंभव चंदा देना चाहिए।
जोशीले युवा ज़रूर वैकल्पिक मीडिया खड़ा करने में अपना योगदान दे सकते हैं। मुख्यधारा की पत्रकारिता से अलग हुए मुझे एक अरसा हो गया। इसके बावजूद फेसबुक पर कई युवा मुझसे संपर्क करते हैं और यह बताते हैं कि पत्रकारिता के मौजूदा हालत को लेकर वे किस कदर बेचैन हैं। इससे अंदाजा होता है कि नई नस्ल का हाल उतना बुरा भी नहीं है, जितना हम समझते हैं। मैं वैकल्पिक मीडिया के एक ऐसे मॉडल की कल्पना करता हूं जो इस देश के बुजर्ग और बेदाग पत्रकारों के मार्गदर्शन, युवा पीढ़ी के श्रमदान और अधेड़ कॉरपोरेट पत्रकारों के चंदे से चले। मेरे दिमाग में इसे लेकर कई और बातें हैं। अगर फेसबुक पर चर्चा आगे बढ़ी तो अपनी राय दूंगा। टैगिंग के खिलाफ हूं इसलिए किसी को टैग नहीं कर रहा हूं। फिर भी उम्मीद है कि गंभीर पत्रकार और खासकर वरिष्ठजन इस पोस्ट पर गौर करेंगे।

राकेश कायस्थ।  झारखंड की राजधानी रांची के मूल निवासी। दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय। खेल पत्रकारिता पर गहरी पैठ। टीवी टुडे,  बीएजी, न्यूज़ 24 समेत देश के कई मीडिया संस्थानों में काम करते हुए आपने अपनी अलग पहचान बनाई। इन दिनों एक बहुराष्ट्रीय मीडिया समूह से जुड़े हैं। ‘कोस-कोस शब्दकोश’ और ‘प्रजातंत्र के पकौड़े’ नाम से आपकी किताब भी चर्चा में रही।

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