पीयूष बबेले

उनके भीतर एक घड़ी है, जो लगातार काम की रफ्तार को सांसों की रफ्तार से तेज किए रहने को आतुर है. मैं जब भी घंटी बजाता हूं तो वे दरवाजा खोलते हुए कहते जाते हैं- आइये पीयूष जी बैठिये और भीतर के कमरे की ओर इशारा कर देते हैं. मैं वहां पहुंचकर कुर्सी पर रखी किताबों को मेज पर रखी किताबों के ऊपर रखकर अपने लिए जगह बनाता हूं. इस बीच वे बाहर के कमरे में कंप्‍यूटर पर चल रहे काम को स्थिर करते रहते हैं, ताकि मेरे जाने के बाद वे वहीं से काम शुरू कर सकें, जहां उन्‍होंने छोड़ा था.

मैं लिहाजवश पहले अक्‍सर पूछ लिया करता था कि कहीं आपको काम में डिस्‍टर्ब तो नहीं कर दिया और वे हमेशा कहते थे: नहीं. शुरू में मुझे लगा कि वे तकल्‍लुफ में ऐसा कहते हैं, लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि वह जो कह रहे हैं, उसका मतलब भी वही है. और अब लगता है कि असल में वे जो कह रहे होते हैं, हर बार ही उसका मतलब ठीक वही होता है. न ज्‍यादा, न कम. कोई इतना संतुलित कैसे हो सकता है. कोई अपनी पूरे जीवन को कंप्‍यूटर की तरह प्रोग्राम में कैसे ढाल सकता है. कोई अच्‍छा खासा पढ़ा-लिखा और प्रतिष्ठित आदमी, बिना किसी कुंठा या गुस्‍से के हम्‍माली तक कैसे कर सकता है. और सबसे बढ़कर यह कि वह आदमी दुनिया के सर्वश्रेष्‍ठ लेखकों की 400 के करीब सर्वश्रेष्‍ठ किताबों को हिंदी भाषा में अकेले, अकेले मतलब अकेले, कैसे ला सकता है.

संवाद प्रकाशन के मालिक और संपादक आलोक श्रीवास्‍तव मेरे लिए ऐसी ही पहेली हैं. मेरी तरह वे भी पेशे से पत्रकार हैं. जिन संस्‍थानों की चाकरी मैंने की उनके मुलाजिम वह भी रहे हैं. उनकी आमदनी भी उतनी ही रही होगी जितनी आमदनी IIMC से पास होने के बाद टाइम्‍स ग्रुप में काम करने वाले किसी सामान्‍य पत्रकार की होनी चाहिए. इस लिहाज से उनकी माली हालत सामान्‍य के करीब ही बनती है. मुझमें उनमें यही फर्क है कि मैंने पारंपरिक गृहस्‍थी बसायी और उन्‍होंने किताबों के साथ जीवन आबाद कर लिया. इस छोटे से अंतर ने बहुत बड़ा अंतर पैदा कर दिया. हम एक नौकरी करते हैं और उससे कार, मकान की किश्‍त, बच्‍चों की फीस और डॉक्‍टरों का कर्जा चुकाते हैं. उन्‍होंने फिजूलखर्ची से तौबा की और कुछ पैसा जोड़ा. फिर कुछ और पैसा बचाकर प्रकाशन खोला. फिर नौकरी छोड़कर पूरे प्रकाशक बन गए. विश्‍व साहित्‍य के वे ज्‍यादातर महान उपन्‍यास, जिनके नाम मैंने विद्वानों से सुने थे, उनके घर में किताबों की दीवार या ढूह की तरह खड़े रहते हैं. उन सबका हिंदी अनुवाद कराके संवाद प्रकाशन ने छापा है. दुनिया के महान लोगों की आधिकारिक जीवनियां, बड़े सम्‍मान और पुरस्‍कारों से नवाजी गई किताबें, दुनिया के नायकों की जीवनियां और बहुत सी वे किताबें जो दुनिया में कहीं भी छपी हों, लेकिन इंसान को इंसान बनाने के काम आती हैं, आलोक जी उन्‍हें छापने को तत्‍पर रहते हैं.

तत्‍परता का आलम यह है कि जब उन्‍होंने पिछले पुस्‍तक मेले में 100 के करीब नई किताबें छापने की घोषणा कर दी तो मुझे यह बात हजम ही नहीं हुई. मेरा उनका नया नया परिचय था तो मैंने चुपचाप कई बार टटोला कि इनकी टीम कहां है, कितने लोग काम कर रहे हैं. लेकिन हर बार पाया कि वे अकेले लगे हैं. उनके कंप्‍यूटर के बगल में दीवार पर कई सूचियां टंगी रहती हैं. उन पर किताबों के नाम लिखे रहते हैं. इनमें से कुछ नामों पर सही और कई पर क्रॉस का निशान होता है. असल में यह उन पांडुलिपियों की सूची है जिन्‍हें वे एडिट करने में जुटे रहते हैं. वे एक के बाद दूसरी किताब का संपादन किए चले जाते हैं. फिर उसे पेज मेकर या जो भी सॉफ्टवेयर है, उसमें डालते हैं. फिर खुद ही डिजाइन सेट करते हैं. उसके बाद बगल में रखे प्रिंटर पर प्रिंट लेंगे और खुद ही प्रूफ पढ़ने बैठ जाएंगे. इसी बीच हफ्ते दस दिन के लिए शहर से गायब होकर अपने डिजाइनर के पास जाएंगे और किताबों के बेजोड़ कवर तैयार कर लाएंगे. फिर सबसे सस्‍ती और सबसे अच्‍छी मिल से कागज मंगवाएंगे. प्रेस वाले से मोलभाव कर लेंगे. उसके यहां चक्‍कर लगा आएंगे. किताब कहीं छपेगी, कवर कहीं और छपेगा.

कभी कागज लाकर आ रहा ट्रक कहीं अटक जाएगा . एक के अटकने से बाकी चीजें लटकेंगी. कामों की समय सीमाएं एक दूसरे से टकराने लगेंगीं. लेकिन उनके मानसिक कंप्‍यूटर के प्रोग्राम को पता है कि भारत में ऐसे ही होता है. फिर वो भूरी शक्‍कर वाली चाय बनाकर मेरे लिए ले आएंगे और भारत के कागज उद्योग से लेकर प्रकाशन उद्योग तक की समस्‍याओं पर सिलसिलेवार प्रकाश डालेंगे. ये बातें करते करते लोगों के लालच और गैर-पेशेवर रवैये पर उन्‍हें गुस्‍सा आएगा. एक ऐसा गुस्‍सा जिसमें उग्रता कम और चिंता ज्‍यादा होती है. वे इन विसंगतियों का बयान ऐसे करेंगे, जैसे पूरा राष्‍ट्र किसी गफलत में कपास ओंटने लगा हो. मैं कहीं टोकूंगा तो कहेंगे, पहले मुझे अपनी बात खत्‍म कर लेने दीजिए. और जब कभी कोई नया विषय छेड़ दूं तो कहेंगे कि इस पर अलग से एक किताब लिखी जा सकती है.

उनका पूरा जीवन किताब हो गया है. एक ऐसी किताब जो हिंदी भाषा को एक ऐसी ज्ञान समृद्ध भाषा बना देना चाहती है, जहां गांव का कोई लड़का यह न कह सके कि उसे अंग्रेजी नहीं आती थी, इसलिए वह महान विचारों या साहित्‍य से वंचित रह गया. समाज को इस वंचना से दूर करने के लिए वे बहुत जल्‍दी में हैं. अक्‍सर कहने लगते हैं कि मेरे पास कम समय बचा है, काम बहुत करना है. दिन रात काम करने के बावजूद उनका काम छूटा जा रहा है. उन्‍हें लगातार और नई-नई किताबें दिखती रहती हैं, जिन्‍हें वे हिंदी में लाना चाहते हैं. लाना ही नहीं चाहते यह तय करना चाहते हैं कि उनकी कीमत वाजिब हो. जब वे किताबों के दाम तय करते हैं तो सबसे पहले यह सोचते हैं कि क्‍या इलाहाबाद का कोई लड़का उसे आसानी से खरीद पाएगा.

उनकी सारी जिद इसी बात की है कि दुनियाभर की किताबें हिंदी में हों और उनके दाम वाजिब हों. इसीलिए वे अपनी उत्‍पादन लागत घटाने के लिए हर मेहनत करने को राजी हैं. यही लागत बचाने के लिए कम से कम 20 आदमी का काम उन्‍होंने अपने सिर ले रखा है. यह काम सिर्फ दिमागी काम तक सीमित हो ऐसी बात नहीं है. अपनी किताबें खुद ढोना, उनके लिए जिंदगी का रोज का काम बन गया है. अभी पिछले दिनों जब उन्‍हें कुहनी में दर्द हुआ और मेरे एक जानकार दोस्‍त ने कहा कि मामला टेनिस एलबो का लगता है तो उन्‍होंने डॉक्‍टर को दिखा लिया. टेनिस एलबो वाला पट्टा हाथ में पहनने लगे. लेकिन परहेज की हद यह कि अब किताबें अब दोनों हाथ से उठाने के बजाय डेढ़ हाथ से उठाते हैं. एक हाथ से पूरी ताकत भर किताबें और देसरे हाथ से आधी ताकत भर. जब याद दिलाता हूं तो बड़ी मासूम झिझक से कहते हैं कि काम कैसे चलेगा.

काम चलने का हाल यह है कि जिस कमरे में वह काम करते हैं, वहां लंबे समय तक पंखा ही नहीं था. मई की गर्मी में भी मैंने देखा कि वे मगन होकर काम किए जा रहे हैं, ऊपर सीलिंग फैन का सिर्फ डंडा लटक रहा है. किताबों वाले घर में चूहे न आ धमकें इसलिए खिड़कियां कसकर बंद करनी पड़ती हैं. गर्मी और ताजी हवा के अभाव में एक सीलन सी घर में पसर जाती है. मुझे यह सब जाते ही खटकता लेकिन आलोक जी को कोई फर्क नहीं पड़ता. उनके पास इतना काम है कि गर्मी लगने की फुर्सत ही नहीं है. जोर देता हूं तो कहते हैं कि शेड्यूल से पीछे हो जाएंगे. शाम को बाहर घूमने की सलाह देता हूं तो हां या न नहीं कहेंगे, यह बताने लगेंगे कि बंबई में घूमा करते थे. असल में जवाब तो वही है कि समय नहीं है. वे काल से होड़ लगाए बैठे हैं.

वो तो भला हो कि कुछ दिन के लिए उनके कंप्‍यूटर के हार्डडिस्‍क में कुछ प्रॉब्‍लम आ गई. प्रॉब्‍लम इतनी बड़ी नहीं थी कि सारा डेटा उड़ जाए और इतनी छोटी भी नहीं थी कि दो चार रोज काम न रोकना पड़े. इस दौरान उनकी सीलिंग के ठूंठ पर सीलिंग फैन उग आया. अटक-अटक के सांसें गिनने वाला वाई फाई कनेक्‍शन बदल गया. हालांकि खिड़की पर एसी जड़ने की रस्‍म नहीं हो सकी.

अभी वो फिर निकल लिए हैं. इस बार फिर पुस्‍तक मेले में ढेर सारी किताबें लॉन्‍च करने की तैयारी में हैं. एक बार फिर से वही चक्र शुरू हो जाएगा जिसका मैंने ताकतभर वर्णन किया. एक बार हिंदी फिर और समृद्ध हो जाएगी. उसके खजाने में ढेरों शोधपरक किताबें जुट जाएंगी. इस तरह आलोक श्रीवास्‍तव अपने जीवन के मिशन में और आगे बढ़ जाएंगे. उनकी किताबों में सुनहरे भविष्‍य के और… और सपने झांकने लगेंगे. अगर कुछ नहीं बदलेगा तो उनका पुराना पंसदीदा ब्राउन कलर का लैदर बैग, पुराने कपड़े और सफर में न थकने वाले जूते.

piyush bawele

पीयूष बवेले। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र। इंडिया टुडे  और दैनिक भाष्कर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी रह चुके हैं। ऑनलाइन मीडिया में कई बड़े ग्रुप के साथ नए प्रयोगों में संलग्न। आपकी पुस्तक ‘नेहरु मिथक और सत्य’ चर्चा में है।