कोरोना संकट के बीच सबसे ज्यादा निराश मीडिया ने किया-अखिलेश कुमार

कोरोना संकट के बीच सबसे ज्यादा निराश मीडिया ने किया-अखिलेश कुमार

अरुण यादव

कोरोना की वजह से देश की रफ्तार थम गई है। हर तरफ सन्नाटा है और इस सन्नाटे में एक अजीब सी मायूसी भी है। जिस सरकारी सिस्टम को कई तरह से खारिज करने की कोशिशें हो रही थीं, उसी सरकारी तंत्र के भरोसे देश कोरोना से लड़ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वक्त आ गया है कि सरकारी तंत्र को फिर से इतना मजबूत कर दिया जाए कि निजी संस्थानों का मुंह ताकते रहने की जरूरत कम हो। आज सरकारी संस्थानों से पढ़े लिए युवा निजी संस्थानों में तैयार नई पौध से ज्यादा संजीदगी और संवेदनशीलता के साथ समाज की सेवा में जुटे नजर आ रहे हैं। ऐसे ही एक युवा का नाम है अखिलेश कुमार। पुलिस अधिकारी की भूमिका छोड़ कर पटना यूनिवर्सिटी में व्याख्याता के तौर पर अपनी नई भूमिका तलाश रहे हैं। लॉकडाउन के दौरान अखिलेश कुमार क्या कर रहे हैं, बदलाव के लिए अरुण यादव ने उनसे लंबी बातचीत की।

बदलाव- पुलिस आज कोरोना वारियर्स की भूमिका निभा रही है, आपको ये मलाल तो नहीं कि काश आज आप पुलिस सेवा में होते ?

अखिलेश कुमार- सच कहूं तो कोरोना संकट के शुरुआती दिनों में एक दो बार ये ख्याल जरूर आया, लेकिन मैंने समाज की सेवा के लिए नया रास्ता निकाल लिया और आज हम घर बैठकर ही जरूरतमंदों की सेवा में जुटे हैं और उसमें काफी सुकून भी मिल रहा है। अभी मैं दो स्तर पर काम कर रहा हूं। पहला उन छात्रों के लिए जो घर पर बैठे हैं और उनकी पढ़ाई ठप पड़ी है और दूसरा उन छात्रों और मजदूरों के लिए जो लॉकडाउन की वजह से घर से दूर कहीं फंस गए हैं ।

दूर-दराज के इलाकों में फंसे ऐसे लोगों की मदद भी एक बड़ा काम है।

स काम में हमारा प्रशासनिक अनुभव बहुत काम आ रहा है । सबसे पहले मैंने अपने मित्रों से बात की और लोगों की मदद के काम में जुटने का सुझाव दिया और सभी लोगों ने सहमति जताई। फिर क्या हम लोगों ने मिलकर एक नंबर जारी किया और उसका विज्ञापन भी दिया जिसके जरिए लोग आज हमसे संपर्क कर रहे हैं । खास बात ये है कि जरूरतमंद भी सामने आ रहे हैं और जरूरतमंदों को मदद देने वाले भी हमसे संपर्क कर रहे हैं। हम तो बस उन कड़ियों को जोड़ रहे हैं।

बदलाव- आप किस रूप में लोगों की मदद कर रहे हैं, राशन दे रहे हैं या फिर पैसा पहुंचा रहे हैं ?

अखिलेश कुमार- राशन और पैसा दोनों दिया जा रहा है। अब तक हम लोगों ने करीब एक हजार से ज्यादा लोगों को राशन उपलब्ध कराया है और करीब 65 हजार रुपये जरूरतमंदों को कैश के तौर पर दिए गए हैं ताकि वो अपनी जरूरत खुद तय करें और उसे जुटाएं। ये राहत बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन सुकून इस बात का है कि कम से कम कुछ तो कर पा रहे हैं । हमारे पास वही फोन कर रहा है जिसकी मदद सरकार या फिर जनप्रतिनिधि नहीं कर पा रहे।

हम लोगों ने पटना ड्राइव नाम से अभियान चला रखा है, जिसमें पटना नही नहीं अलग-अलग जिलों में भी लोग जुड़े हुए हैं। हमारे पास जहां से कॉल आती है उस इलाके में मौजूद अपने साथियों से संपर्क करता हूं और इस तरह ये सुनिश्चित किया जाता है कि जिसने भी कॉल की है उसकी हर हाल में मदद हो सके।

बदलाव- क्या इस काम में कोई सामाजिक संगठन भी आपकी मदद कर रहे हैं?

अखिलेश कुमार- बिल्कुल, जो भी संगठन हमारी मुहिम में आना चाहता है उसको मना नहीं किया जाता। जैसे पटना में एक संगठन है जो अपनी रसोई में बना खाना जरूरतमंदों तक पहुंचा रहा है, हमारे पास अगर खाने के लिए कॉल आती है तो हम उसकी मदद जरूर लेते हैं। इन सबके साथ ही हमारी नयोदय विद्यालय से जुड़ी टीम बहुत काम आ रही है। पटना ही नहीं देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद नवोदय के साथी काफी मदद कर रहे हैं । इन सबकी मदद से ही आज एक लाख तक का फंड मैं निजी रूप में एकत्र कर चुका हूं जिसका करीब 65 फीसदी हिस्सा जरूरतमंदों तक पहुंचा भी चुका हूं ।

बदलाव- इस दौरान की ऐसी कोई घटना, जिससे आप उबर नहीं पा रहा हों। वो तस्वीर जो एक सवाल की तरह आपके जेहन में कौंध रही हो।

अखिलेश कुमार- ऐसे एक दो नहीं, बहुत से वाकये हैं। पंजाब, कर्नाटक, गुजरात समेत कई राज्यों में फंसे मजदूरों की मदद करने में हमारे पुराने सहयोगी काफी काम आए, लेकिन इसी दौरान दिल्ली से आया एक फोन दिल को छू गया।

हुआ कुछ यूं कि बिहार में सुपौल के छातापुर का रहने वाले सिकंदर अपनी कैंसर पीड़ित मां का इलाज कराने के लिए दिल्ली के एम्स गए हुए थे, लेकिन लॉकडाउन और कोरोना की वजह से एम्स में उनकी मां का इलाज नहीं हो पा रहा था। ज्यादा दुख तब हुआ जब इलाके के जनप्रतिनिधियों ने भी सिकंदर की मदद नहीं की। कहीं से सिकंदर को हमारा नंबर मिला और उन्होंने अपनी आपबीती सुनाई । लिहाजा मैंने दिल्ली में अपने डॉक्टर मित्र और बैचमेट ऋषिकेश को फोन किया और सिकंदर की मदद के लिए गुजारिश की। ऋषिकेश ने मुझे निराश नहीं किया और सिकंदर की मां को एम्स में एडमिट कराया और कीमोथेरेपी शुरू हुई ।

इसी तरह बेंगलुरु में बिहार में कुछ मजदूर फंसे थे और हम लोगों ने अपने साथियों की मदद से उनकी सहायता की। लुधियाना में करीब 30 मजदूर फंसे हुए थे उन लोगों ने फोन किया और बताया कि दो दिन से वे लोग खाना नहीं खाये हैं । लिहाजा हम लोगों ने लुधियाना के डीसी ऑफिस सीधे बात की, शुरुआत में डीसी ऑफिस ने आनाकानी जरूर की लेकिन हम लोगों ने तब तक उनका पीछा नहीं छोड़ा जब तक उनको मदद नहीं मिल गई ।

ऐसा नहीं है कि संकट की इस घड़ी में सिर्फ मजदूर परेशान है । घर से दूर रहने वाला हर कोई मुश्किल में है । छात्रों का बड़ा समूह भी मुश्किल झेल रहा है। अभी कुछ दिन पहले ही पटना से एक छात्र की कॉल आई वो अच्छे परिवार से था, लेकिन पैसा और राशन खत्म होने की वजह से 2 दिन से खाना नहीं खाया था लिहाजा हम लोगों ने उस लड़के तक दाल, चावल और आटा पहुंचाने का इंतजाम किया।

बदलाव- आपने शुरू में छात्रों की पढ़ाई में मदद करने का भी जिक्र किया था उनकी मदद कैसे कर रहे हैं ?

अखिलेश कुमार- एक तो हम लोग छात्रों की काउंसलिंग कर रहे हैं । इसके लिए एक नंबर जारी किया गया है, जिसपर तय समय के दौरान छात्रों के फोन आते हैं और उनके सवालों के जवाब दिये जाते हैं । 10 और 12 वीं के बच्चों को फोन पर ही गाइड कर रहे हैं कि आगे की पढ़ाई की दिशा क्या रखे और कैसे करें । इसके अलावा सिविल सर्विसेज के छात्रों को भी उचित मार्गदर्शन दिया जा रहा है, ऑन लाइन तैयारी के लिए जरूरी सामग्री उपलब्ध कराई जाती है। कुछ सवाल भी भेजे जाते हैं जिसका जवाब भी छात्र लिखकर मेल करते हैं और उसकी नियमित जांच की जाती है। कुछ इसी तरह लॉकडाउन में सुबह से शाम तक करीब 12-13 घंटे मैं और मेरी टीम व्यस्त रहती है ।

बदलाव- लॉकडाउन में फंसे कुछ छात्रों को सरकारें निकाल रही हैं लेकिन मजदूरों को अपनी जगह पर रहने के लिए कहा जा रहा हैं, क्या ये सही है?

अखिलेश कुमार- देखिए पहली बात तो ये कि अगर हमने फैसला किया है कि किसी मजदूर को वापस नहीं लाया जाएगा तो सबसे पहले हमें उन्हें ये भरोसा दिलाना होगा कि वो जहां है पूरी तरह सुरक्षित हैं और उनको रहने और खाने की कोई दिक्कत नहीं होगी। दुर्भाग्य से लॉकडाउन के दूसरे चरण में भी हमने कोई ठोस एक्शन प्लान मजदूरों के सामने नहीं रखा जिस वजह से उनकी बेचैनी बढ़ रही है और आने वाले वक्त में देश के लिए ज्यादा मुश्किल खड़ी हो सकती है ।

ये आपदा की स्थिति है तो हमें आपदा की तरह ही काम करना होगा। इसके लिए दो चरणों में काम करना होगा। पहले हमें हर इलाके से पंचायत प्रमुख से उनके गांव के उन मजदूरों की लिस्ट मंगानी होगी जो दूसरे शहरो में गए हैं और फिर उसे जिला मुख्यालय पर अलग अलग प्रदेश और शहरों की लिस्ट बनानी होगी । जिसमें मजदूरों का नाम और कॉन्टैक्ट नंबर और पता मौजूद रहेगा । फिर हर जिले की लिस्ट प्रदेश की राजधानियों में भेजकर हर राज्य की अलग-अलग लिस्ट बनानी होगी। फिर दूसरे चरण का काम शुरू होगा । इसके लिए हर प्रदेश के लिए एक-एक अधिकारी को बतौर प्रतिनिधि राज्य में भेजना होगा जो वहां के स्थानीय प्रशासन से मिलकर उन मजदूरों तक अपनी पहुंच बनाए और उनके रहने-खाने का इंतजाम करे । मजदूरों को कोई भी समस्या हो तो वो उस अधिकारी तक आसानी से पहुंच सके । ऐसा करने से हम मजदूरों का ना सिर्फ भरोसा जीत पाएंगे बल्कि उन्हें उसी शहर में रोकने में भी कामयाब हो पाएंगे ।

बदलाव- क्या मजदूरों को उनके घर भेजने का इंतजाम नहीं किया जा सकता ?

अखिलेश कुमार- बिल्कुल किया जा सकता है और उसके लिए हमारे पास पर्याप्त संसाधन भी हैं । अगर मजदूरों को भेजना है तो उस काम को चरणबद्ध तरीके से करना होगा । इसके लिए दो तरीके हैं । पहला ये कि दूसरे प्रदेशों में फंसे मजदूरों के लिए सीधी ट्रेन चलानी होगी । मसलन अगर अहमदाबाद से किसी को पटना आना है तो अहमदाबाद से पटना के लिए सीधी ट्रेन चले, बीच में किसी भी स्टेशन पर कोई यात्री ना चढ़े । इसी तरह आपको हर शहर से दूसरे शहर के लिए ट्रेन चलानी होगी । भीड़ ना हो उसके लिए पहले से ट्रेनों की बुकिंग करनी होगी जिसके लिए कोई भी पैसा ना वसूला जाए । उन्हीं मजदूरों को मूवमेंट की इजाजत मिले जिनके पास कोरोना नेगेटिव का सर्टिफिकेट हो । जब ट्रेन शहर पहुंचे तो वहां से अलग-अलग इलाकों के लिए बसों का इंतजाम किया जाए और फिर स्थानीय प्रशासन की मदद से उन्हें गांव के स्कूलों में क्वारंटीन किया जाए । ये थोड़ा रिस्की जरूर है लेकिन मुश्किल नहीं । अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो वक्त बीतने के साथ-साथ मजदूरों की बेचैनी बढ़ेगी और फिर नया संकट खड़ा होगा।

बदलाव- जब मजदूरों की बात आती है तो हमारी सोच क्यों बदल जाती है, इसका क्या परिणाम होगा?

अखिलेश कुमार- इसका नतीजा बहुत भयावह हो सकता है, जिसकी हम परिकल्पना भी नहीं कर सकते । देखिए जिस तरह जगह-जगह से खबरें आ रही हैं कि लोगों को ठीक से खाना नहीं मिल रहा है वो बेहद दुखद है । जरा सोचिए इसमें तमाम बच्चे भी होंगे और गर्भवती महिलाएं भी होंगी, अगर वो भूखा रह रहे होंगे तो उनकी सेहत पर कितना असर पड़ेगा। हम एक बहुत बड़ी बीमार पॉपुलेशन तैयार करने की दिशा में बढ़ रहे हैं । जिसका खामियाजा देश को ही उठाना पड़ेगा ।

बदलाव- कोरोना संकट के बाद देश को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है ?

अखिलेश कुमार- चुनौतियां कई तरह की आती दिख रही हैं, आर्थिक स्तर पर पहले से ही कमजोर हो चुका हमारा देश और मुश्किल हालात से गुजरेगा। अब उससे हमारी सरकार किस रूप में निपटती है ये वक्त बताएगा लेकिन लॉकडाउन जितना लंबा खिंचेगा मजूदर उतना ही डरेगा और जब वो घर लौटेगा तो शायद ही शहर की ओर रुख करने की हिम्मत जुटा पाएगा। ऐसे में अर्थव्यवस्था का पहिया घुमाने में मदद करने वाला मजदूर जब नहीं मिलेगा तो मुश्किल और बढ़ेगी । दूसरी चुनौती है लोगों को डर से उबारने की। आज हमारे आसपास कोरोना का डर अपनी पैठ बना चुका है अगले कम से कम 2 साल तक हम लोगों से मिलने-जुलने में डरा डरा महसूस करेंगे । तीसरी चुनौती है असंतोष की । जिस तरह हम विदेश से लोगों को निकालकर ले आए, छात्रों को भी देश के अलग अलग हिस्सों से निकाल रहे हैं लेकिन मजदूरों की नहीं सोच रहे उससे असंतोष बढ़ने का खतरा बना रहेगा ।

बदलाव- संकट की इस घड़ी में मीडिया का रोल आप कैसा देख रहे हैं, क्या मीडिया अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभा रहा है ?

बदलाव- सच कहूं तो सबसे ज्यादा निराशा मीडिया से ही हुई है। सरकारों की बतइंतजामी शायद कुछ दिन में मजदूर और नौकरीपेशा लोग भूल भी जाएंगे लेकिन मीडिया देश में जो खाई बना रहा है उसे पाटना शायद मुश्किल होगा। डर इस बात का भी है कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो देश में एक वक्त ऐसा आएगा जब गृहयुद्ध के हालत बन जाएंगे और उसके लिए मीडिया सबसे ज्यादा जिम्मेदार होगा । मीडिया आज सरकार से सवाल करने की बजाय मजदूरों और कमजोर लोगों पर सवाल उठाने लगा है । इसे मीडिया का भ्रष्टाचार कहें तो गलत नहीं होगा।

बदलाव- संकट की इस घड़ी में निजी अस्पताल और निजी स्कूलों की भूमिका को लेकर आप क्या कहेंगे ?

अखिलेश कुमार- सबसे पहले तो डॉक्टर्स, पुलिस और उन तमाम कोरोना वारियर्स को सलाम जो इन दिनों कोरोना के खिलाफ जंग में पहली पंक्ति में खड़े हैं। देखिए ये जो कोरोना वारियर्स हैं अगर कोई रिसर्च किया जाय तो शायद पता चले कि इनमें ज्यादातर लोग सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल कर पढ़े और बड़े हुए हैं। कई बार लगता है निजी संस्थान हमेशा आपको सबसे पहले अपना फायदा याद दिलाते हैं। ऐसे में एक बात तो साफ है कि हमें अब इस बात को समझना होगा कि निजी संस्थानों की बजाय सरकारों को मजबूर करना होगा कि वो सरकारी संस्थानों को मजबूत बनाएं ताकि कोरोना जैसा कोई दूसरा संकट आए तो हम और मजबूती से लड़ सकें ।

हमें सरकारी संस्थानों को इतना बड़ा बनाना होगा कि उसके सामने निजी संस्थान बौने लगने लगें और हममें ये सामर्थ्य है, क्योंकि जब हम बड़े बड़े पुल बना सकते हैं, बुलेट ट्रेन की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं तो फिर स्कूल और अस्पताल में बेहतर कर सकते हैं जरूरत सिर्फ इच्छा शक्ति की है।

बदलाव- संकट की इस घड़ी में समाज के लोगों से कुछ अपील करना चाहेंगे ?

अखिलेश कुमार- मेरी बार-बार लोगों से यही अपील है कि जितना हो सके जहां तक हो सके लोगों की भूख मिटाने में मदद करें। संकट की इस घड़ी में पूरे समाज को साथ आना होगा । कोई एक भी शख्स भूखा ना सोने पाए, समाज और सरकार दोनों को सुनिश्चित करना होगा।

बदलाव से बात करने के लिए शुक्रिया ।

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