अजीत अंजुम

प्यारा सा ये लड़का इस दुनिया में नहीं रहा . विकल्प त्यागी नाम था इसका . फेसबुक पर Zypsy’s Story के नाम से प्रोफ़ाइल बना रखी थी . यक़ीन नहीं हो रहा कि इस उम्र में वो दुनिया को अलविदा कह गया . दिसंबर के आख़िरी हफ़्ते में मैं लखनऊ गया तो उससे मिलने उसके दफ़्तर गया था . उसकी सेहत को लेकर उसे झिड़का भी था . वो मेरी बातें सुनता रहा, फिर पढ़ने-लिखने की बातें करने लगा . मुझसे पूछने लगा कि सर, आजकल आप क्या पढ़ रहे हैं ? फिर अपनी बताने लगा .

विकल्प की यादें

बीएजी के मीडिया स्कूल में पहली मुलाक़ात से अब तक विकल्प त्यागी से जुड़ी इतनी यादें हैं कि उसके जाने का ग़म परेशान कर रहा है . जब कभी फेसबुक पर मैं किसी से बहस करता था और जवाब में कोई अभद्र टिप्पणी करता तो वो मुझे मैसेज करता था . मुझसे आधी उम्र का होकर भी मुझे समझाता था कि आप सोशल मीडिया पर किसी से बहस में मत उलझिए . किताब लिखिए . कुछ बड़ा करिए . आप मेरे गुरु हैं इसलिए आपको कोई ऐसे कुछ कह देता है तो मुझे ठीक नहीं लगता है . मैं उसकी बात मानने की कोशिश भी करता था . मैं जब डिबेट शो करता था तो वो एक दर्शक और आलोचक की भूमिका में हमेशा अपना फ़ीडबैक देता था .

मुझे उस लड़के में हमेशा एक क़िस्म की बेचैनी दिखती थी . मीडिया छात्र के रूप में उससे पहली मुलाक़ात शायद 2010-2011 में हुई थी . पहली मुलाक़ात में ही उसने मुझे प्रभाव में ले लिया . वो काफ़ी देर तक मुझसे निर्मल वर्मा पर बात करता रहा . मैंने भी उसी की उम्र में निर्मल वर्मा का उपन्यास और यात्रा संस्मरण और कहानियाँ पढ़ी थी . फिर हम अक्सर ‘चीड़ों पर चाँदनी’ से लेकर ‘कौवे और काला पानी’, ‘वे दिन’ , ‘रात का रिपोर्टर’ से लेकर ‘पिछली गर्मियों में’, ‘लाल टीन की छत’ और ‘अंतिम अरण्य’ तक पर बातें करते . दुनिया जहान की किताबों पर बात करने का वो बहाना खोजता था. कई बार वो विदेशी लेखकों की कोई ऐसी किताब पर बात करने लगता , जो मैंने पढ़ी नहीं होती तो मैं बचने लगता था.

पूरे क्लास में सबसे अलग था विकल्प . दिखने में , पहनावे में, हुलिये में … लंबे बाल और बेतरतीब दाढ़ी रखने पर भी कई बार मैं गार्डियन की तरह टोकता था और वो सुनकर हँसता रहता . उन्हीं दिनों मेरे बर्थ डे पर अपने दोस्तों के साथ केक लेकर अ गया . खिलाया भी और लगाया भी . मैंने भी शरारती बच्चे का तरह विकल्प के चेहरे पर केक का लेप चढ़ा दिया . उसने तस्वीरें खिंचवाई और फेसबुक डाल दिया . 

मैं हमेशा उसे सिर्फ त्यागी बोलता था . उसका साथ मुझे ऊर्जा देता था . मस्तमौला , बिंदास , प्रतिभाशाली . हाँ , एक ख़ामी थी उसमें में . मैं उसके लिए उसे प्यार से अधिकार के साथ हड़काया रहता था कि ये छोड़ दो . आख़िरी बार मिला था , तब भी . मुझे उसके न होने की सूचना भी फेसबुक पर उसके दोस्तों की पोस्ट से ही मिली . पता नहीं कैसे क्या हुआ कि वो इस दुनिया को अलविदा कह गया . मैं उसके फेसबुक पेज पर उसकी तस्वीरें देख रहा था . उसका अल्बम उसकी शख़्सियत के रंगों का कोलाज है . इन्हीं तस्वीरों में एक मैं भी था . 

ख़ैर , नियति ने उसकी उम्र की मियाद बहुत कम तय कर दी थी . विकल्प , मेरे दोस्त …बहुत याद आओगे


10570352_972098456134317_864997504139333871_nअजीत अंजुम। बिहार के बेगुसराय जिले के निवासी । पत्रकारिता जगत में अपने अल्हड़, फक्कड़ मिजाजी के साथ बड़े मीडिया हाउसेज के महारथी । बीएजी फिल्म के साथ लंबा नाता । स्टार न्यूज़ के लिए सनसनी और पोलखोल जैसे कार्यक्रमों के सूत्रधार । आज तक में छोटी सी पारी के बाद न्यूज़ 24 लॉन्च करने का श्रेय । इंडिया टीवी के पूर्व मैनेजिंग एडिटर ।

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