भारती द्विवेदी

bharti dwedi-2क्या आपने कभी गाली को एन्जॉय किया है? सुनकर अजीब लगा ना ! ऐसा सच में होता है गांव की शादियों में। मैं बिहार के मोतिहारी जिले में हूँ। यहाँ मेरा घर भी है और ननिहाल भी। मौका है कजन की शादी का। 4-5 दिन में बहुत सी रस्में होंगी, मस्ती होंगी, गाने होंगे और उन गानों में गालियां। गालियां भी ऐसी की दांतों तले ऊँगली दबा लो। ये यूपी-बिहार की शादियों में बहुत ही कॉमन बात है।

घर की महिला मण्डली जो लग्न चुमावान की रस्म में बिजी हैं। इसमें दूल्हे-दुल्हन को पुराना पीला कपड़ा पहनाया जाता और धान और सोने से नेग किया जाता। और लड़की की माँ रस्म को पूरा कर रही हैं तो मेरी मासियां ये गाना गा रही हैं “भाभी दिल से चुमेली अवर चानी से भाभी, जरी के छिनार लाड़िकाईं के भाभी खोजेली भातार (पति) मुजवानि में । मतलब भाभी पूरे मनोयोग से चूम रही है, हाथ में चाँदी भी है। मग़र भाभी तो बचपन की छिनाल है। मूँज की झाड़ों में यार ढूंढती रही है… और फिर यही रस्म जब मासियां करेगी तो मामियां जवाब में यही गाने गाएंगी। हर शादी में चारों तरफ हंसी ठिठोली चलती रहती है। कोई भी असहज नहीं होता इस माहौल से। मैं और आप जरूर शर्मा जाएंगे लेकिन ये औरतें नहीं।

इन गानों का लॉजिक भी जनिये

1-कहते हैं लड़की वाले दहेज-बेटी देने के बाद भी खुद को दबा और हारा हुआ महसूस करते हैं, इसलिए इन गालियों के जरिये वो अपनी भड़ास निकालते हैं।

2-पहले लोगों की शादी बहुत जल्दी होती थी। उस उम्र में लड़के-लड़की अपनी बॉडी को लेकर भी सहज नहीं होते थे और जानकारी भी नहीं होती तो एक तरह से इन गालियों के जरिये उन्हें सहज कराया जाता था।

3-पुराने ज़माने में जब 2 परिवारों के बीच रिश्ता बनता था तो महिलाएं एक-दूसरे का नाम जानने और बराबरी के लिए गालियां देती।

4-एक वजह ये भी होती थी की पहले औरतें मुखर नहीं होती थी तो जब भी घर में शादी-ब्याह होता तो उन्हें खुलकर बात करने, हंसी ठिठोली करने का मौका मिलता था।

चार-पांच दिनों में और भी बहुत सी रस्में होंगी। हर रस्म के लिए आँखें नम कर देने वाले गाने भी होंगे और कुछ ये मस्ती के लिए गालियों के गाने। क्योंकि मैं गालियों वाले गानों की बात कर रही तो आपको कुछ और गाने बता दूँ “मोर साम सुंदर गउरी के छुछुंदर अइले भसुर अछत देहनी छिटेला त फ़ाँक गईले भसुर “। मतलब, मेरी गौरा इतनी सुंदर है मग़र उसका जेठ आया एकदम छछूंदर… अक्षत चढ़ाने को दिया तो फ़ाँक गया। ये गाना गुरहेथिन की रस्म का है। इसमें दूल्हे का बड़ा भाई दुल्हन को घर से लाये गहने, कपड़े और श्रृंगार का सामान मन्त्रों और पूजा के बाद देते हैं।

” कहांवा बइठईबs पूजा शुभई धरु बाबूजी के नामs कोहबर धरु अम्मा के नामs कोहबर बाबूजी जे हमरो जिमीदारवा अम्मा रनिया हमार कोहबर।। कहांवा बइठईबs मनीषs दुलहा धरु बाबूजी के नामs कोहबर बाबूजी जे हमरो भंडुआवा आमा जगली छिनारs कोहबर… कोहबर में बैठा कर बेटी से पूछा कि अपने पिताजी और माँ का नाम लो तो उसने लिया। पिता जमींदार हैं और माँ रानी। पर जब दूल्हा से पूछा गया तो राज खुल गया। उनके बाबूजी ठहरे भँड़वे और माँ इंटरनेशनल छिनाल। ये गाना कोहबर की रस्म का है।

साभार- manuprashant.blogspot.com

कोहबर एक ऐसा घर होता है, जिसकी दीवारों पर प्रेम क्रीड़ाएँ करते स्त्री पुरुषों के चित्र बने होते हैं। भावी गृहस्थी की जरूरतों की चीजें बनाई गयी होती हैं। जैसे हल-बैल इसका उद्देश्य होता है नव दम्पत्ति के भीतर भावी दाम्पत्य को लेकर उत्साह भरना। गृहस्थी की शिक्षा देना और उनके अंदर की प्रेम और काम भावना को जगाना। ” सुई डोले सुई डोले कलाई बीचे घड़िया में सुई डोले कहेली समsधि बहू सिर दरद करेला कापार दरद करेला हमरो अंकित बाबू डागदर हईं बएद हईं आला लगावस जोबनिये में सुई डोले ” कलाई घड़ी के बीच सुईयां डोल रही हैं। समधि की औरत कहती है कि उसका सिर दुःख रहा है। मेरा सुझाव है कि मेरे अंकित बाबू अच्छे वैद्य हैं जो जोबन में आला लगाकर इलाज करते हैं। ये गीत भी भात खाने के समय का है। कहते हैं साथ खाना खाने से रिश्ते मजबूत होते हैं और यही कांसेप्ट लागू होता है, शादी में भी। दोनों पक्ष के लोग आपस में मिलते हैं, और सम्बन्ध को मजबूती देते हैं, लिहाज़ा साथ खाने का रिवाज़ है।


bharti dwedi-1भारती द्विवेदी। ईटीवी और कुछ मीडिया संस्थानों में काम के बाद इन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता।