पशुपति शर्मा के फेसबुक वॉल से साभार

अल्लामा इकबाल ने एक कविता लिखी थी, बच्चे की दुआ। पीलीभीत के एक स्कूल के प्रिंसिपल साहब ने इसे प्रार्थना सभा में शरीक कराया। कुछ लोगों को नाग़वार गुजरा। प्रिसिंपल साहब सस्पेंड कर दिए गए। मैं निजी तौर पर प्रिंसिपल साहब के खिलाफ इस कार्रवाई की निंदा करता हूं।

मैं आदर्श मध्य विद्यालय, बैलोरी, पूर्णिया का छात्र रहा हूं। वहां हमारे प्रिसिंपल साहब बापू का प्रिय भजन हर दिन प्रार्थना में गवाया करते थे- ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सनमति दे भगवान।….

सबको सनमति देने की दुआ के साथ इकबाल की वो कविता भी साझा कर रहा हूं, जिसे लेकर नया विवाद खड़ा किया जा रहा है।

बापू ने ‘सहिष्णुता’ का पाठ भी पढ़ाया है। पढ़िए कविता, इसके मायने समझिए और फिर राय बनाइए…

बच्चे की दुआ-

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी

ज़िंदगी शम्अ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी!

दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए!

हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए!

हो मिरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत

जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब

इल्म की शम्अ से हो मुझ को मोहब्बत या-रब

हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना

दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना

मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को

नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

पशुपति जी के फेसबुक पर लोगों की टिप्पणियां

अनिल झा

इस दुआ में कहीं कुछ भी तो आपत्तिजनक नहीं है! प्रिंसिपल साहब के ख़िलाफ़ कार्रवाई अनुचित और निंदनीय है।

नानक कुमार झा

मैं एक सरकारी शिक्षक हूँ…और विद्यालय में हिंदी पढाता हूँ….आठवीं कक्षा की हिंदी की किताब में ये कविता है….जब मैंने ये कविता बच्चों को पढ़ाया तो यकीन मानिए बच्चों की आँखे नम थीं, मन उत्साह से भरा हुआ था, समाजिक गतिविधियों में डूबने की चाहत नजर आ रही थी, एकजुटता में बंधने की शारिरिक भाषा स्पष्ट नजर आ रही थी……कई भावनाओं से ओत-प्रोत इस कविता में ऐसे लोगों को क्या नज़र आया जो प्रिंसिपल साब को निलंबित कर दिया गया…इस कार्रवाई की मैं घोर नहीं घनघोर निंदा करता हूँ…..पता नहीं देश की समझ कहाँ जा रही है…

ब्रह्मानंद ठाकुर

इस प्रार्थना गीत की सही समझ नहीं रहने के कारण सम्बंधित अधिकारी ने गलत निर्णय लिया हैः और सही समझ धर्मनिरपेक्ष
,जनवादी , वैज्ञानिक शिक्षा से ही पैदा होती है , जो अपने देश में नदारद है। मैं भी प्रिंसिपल साहब का समर्थन और उस अधिकारी की प्रिंसिपल पर की गई कार्रवाई की निंदा करता हूं। इस प्रारँथना मे सब के लिए दुआ की ग ई हैः।

राजीव सिंह

पशुपति जी हम वहीं हमाज बनाते हैं जो चाहते हैं। प्रार्थना को भी हिन्दू मुस्लिम खांचे में बांटा जा यहा है। अन्नू सिंह का एक ब्लॉग है ‘मैं घुमंतू. मैंने वहां पहली बार इस कविता का जिक्र सुना था तो गूगल पर सर्च कर पूरी कविता पढ़ी थी। फिर राजी फिल्म के गाने ऐ वतन में भी ये आया है और गाना क्या डूबकर गाया है। कुछ लोगों को मुस्लिम नाम से ही चिढ़ है।