सुनो आहना, तुम्हें पता है 11 अक्टूबर को इंटरनेशनल गर्ल चाइल्ड डे है? नहीं पता होगा शायद.

वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम और उनकी बेटी आहना ।

दुनिया के लिए भले आज गर्ल चाइल्ड डे हो. मेरे लिए तो हर रोज गर्ल चाइल्ड डे है. जब से तुम मेरी जिंदगी में आई हो तब से आज तक ग्यारह साल हो गए गर्ल चाइल्ड डे मनाते. सुबह तुम्हारा मुंह देखकर उठता हूं. रात तुम्हें सोते देखकर सोता हूं. दिन भर नजरों से दूर होकर भी जेहन में इस कदर रची -बसी होती हो कि दूरियों का अहसास ही नहीं होता. तुम हमारे जीवन का वो ध्येय हो जिसका अहसास तुम्हारे आने के बाद ही हुआ. जीवन में रंग तो पहले भी गहरे थे . बहुरंगी दुनिया तुम्हारे आने के बाद ही रची जा सकी. तुम हमारे इन्द्रधनुषी सपने की वो सात रंग हो , जिसका हर रंग दूसरे से ज्यादा गहरा है. तुम्हारा हंसना, तुम्हारा बोलना , तुम्हारा रुठना , तुम्हारा भागना, तुम्हारा चीखना, तुम्हारा रोना , तुम्हारा सोना , तुम्हारा जागना…क्या -क्या बताऊं ? तुम्हारा हर पल मेरे लिए संजीवनी है, ऊर्जादायनी है. भले ही तुम ग्यारह साल की हो लेकिन तुम पापा की सबसे अच्छी दोस्त हो.

तुम पापा से जितने सवाल करती हो, पापा के बारे जितना सोचती और जितनी चिंता करती हो कि कभी -कभी मां जैसी लगने लगती हो. बेटियां इतनी जल्दी सयानी हो जाती है क्या आहना? पापा के चेहरे को तुम पढ़ लेती हो. पापा की चाल को भांप लेती हो . पापा की खुशी को माप लेती हो. मुझसे चुहल करती हो,जिद करती हो. चिढ़ाती हो . कभी -कभी मेरी कमजोर नस पर हाथ रखकर छेड़ती भी हो. कभी कोई अच्छी बात कहकर मुझे गुदगुदाती हो. कितने रुप हैं तेरे आहना? कम उम्र में कितनी समझदार हो गई हो तुम?

तीन -चार दिन पहले ही की ही तो बात है. तुम एक दिन स्कूल की कोई किताब लेकर आ गई थी. GENDER DISCRIMI NATION पर कुछ सवाल लेकर आ गई थी. मैंने तुम्हें समझाया था कि समाज में ये होता रहा है लेकिन तुम्हारा गुस्सा कम नही हो रहा था. तुम बार -बार यही कह रही थी लेकिन ये कैसे हो सकता है पापा कि गर्ल को ही राइट न मिले. पहनने , बोलने , घूमने, बात करने की आजादी पर तुम बात कर रही थी. मैं चौकने वाली खुशी से तुम्हारा चेहरा देख रहा था. फिर तुमने ही कहा था कि ऐसे भेदभाव आप लोग नहीं करते हो लेकिन स्मॉल टाउन में होता है. मैंने पूछा क्या होता है तो तुमने कहा था – लड़कियों को पढ़ाते नहीं हैं. हाउसहोल्ड में काम कराते हैं. ये सब गलत है न पापा. पता नहीं ये सब तुम्हें किसने बताया.

कितनी समझदार हो रही है मेरी आहना, तुमने मुझे कई बार आगाह भी किया है. मुझे ही समझाया है कि बेटियों के साथ क्या और कैसे करना चाहिए . मैं हर बार चौकता हूं तुम्हारी बातों पर. तुम फिल्मों में भी कहीं लड़कियों से भेदभाव देखती हो तो सिनेमा हॉल में ही सवाल पूछने लगती हो. आमिर खान की दंगल फिल्म देखकर भी तुमने कई सवाल किए थे. सोसाइटी या स्कूल के स्पोर्ट्स ग्राउंड भी तुम्हें कुछ ऐसा दिखता है तो तुम घर आकर ऐतराज दर्ज कराती हो. याद है आहना ? हाल ही में हमारे एक दोस्त की बेटी की शादी का कार्ड पढ़कर तुमने जोर से रिएक्ट किया था. बहुत खूबसूरत हिंन्दी में एक बड़े पत्रकार की तरफ से लिखा गया था कि हमारी बेटी अब पराई होने जा रही है. इतना पढ़कर ही तुम भड़क गई थी. विरोध जताया था कि अंकल ने ऐसा क्यों लिखा? लड़कियां पराई कैसे हो जाएगी? शादी होने से पराई का क्या मतलब ? एक साथ कई सवाल दागे थे तुमने. बहुत समझाने पर भी समझी नहीं कि परंपरा और रुढ़ियों ने कैसे हमारे समाज में लड़के और लड़कियों के भेद को गहरा कर दिया है.

नए जमाने के मां -बाप भी उसे कम नहीं कर पा रहे हैं. सदियों के सवाल तुमने सेकेंडों में पूछे थे. हम मिनटों में समझाते रहे थे. तुम कहां समझने वाली थी. हम बदल रहे हैं बेटी लेकिन हमारी कंडीशनिंग ही ऐसी हुई है कि जेहन लड़कियों को पराई ही मानता है. मैं तुम्हारे विरोध पर चकित था .खुश भी था. गौरवान्वित भी था. तुमने उस दिन मुझे भी एक रूढि से उबार दिया हमेशा के लिए . उस दिन मैं थोड़ा और बदल गया. उसी दिन मैंने कार्ड वाले अंकल को तुम्हारी बात बताई, वो भी चौंके. उन्होंने तो इतनी दूर तक सोचा ही नहीं था. उन्होंने भी माना कि कार्ड में ये नहीं लिखना चाहिए था.

धीरे धीरे हम सब बदल रहे हैं बेटा. बदलेंगे. समाज भी बदलेगा. वक्त भी बदलेगा. तुम्हारी जैसी बेटियां ही समाज की इस रूढिवादी और बेटावादी सोच को ध्वस्त करेगी कि बेटा ही वारिस होता है. बेटे से ही वंश चलता है. बेटा ही नाम रौशन करता है. अपने तेवर और अपने हौसले को कभी डिगने मत देना आहना, तुम जैसी बेटियां ही हम जैसे पिताओं को बदलने पर मजबूर करेंगी. हम सदियों पुरानी उस सोच से निकलेंगे जिसमें बेटियों को अभिशाप और बेटों को वरदान माना जाता था. बेटों की पैदाइश पर जश्न और बेटी के पैदा होने पर मातम मनाया जाता था.
एक जमाना था जब देश में हजारों बेटियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था. जमाना बदला. कोख में बेटियों की पहचान करने की तकनीक आ गई. तब कोख में ही मारा जाने लगा. अभी भी हर साल न जाने कितनी अजन्मी बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है. बाहर की दुनिया में कदम रखने से पहले ही उनकी मासूम धड़कनों पर कुचल दिया जाता है. ये सब वही करते हैं जिन्हें सिर्फ बेटा चाहिए होता है. भले ही वो बड़ा होकर कपूत बने. मां-बाप को बेसहारा छोड़कर अपनी बीवी -बच्चों के साथ अपनी दुनिया बसा ले. चाहिए तो बेटा चाहिए. खानदान का चिराग चाहिए. कमाकर घर चलाने वाला बेटा चाहिए. उन्हें क्या पता कि बेटियां क्या होती हैं. एक बार बेटियों को आने तो दो. पढ़ने तो दो. बढ़ने तो दो, फिर देखो .

सुनो आहना , हमारे लिए तो तुम सौ बेटों के बराबर हो. भरोसा है तुम पर. तुम्हारे हौसले पर. जब भी कभी तुम्हें लगे कि हम बेटी होने की वजह से तुम्हें वो नहीं दे पा रहे हों जो किसी बेटे को मिलता है तो हमें एक बार नहीं सौ बार टोकना, लड़ना, चीखना, भिड़ना, मत झुकना हमारे सामने. अधिकार है तुम्हारा हर उस चीज पर जो किसी बेटे को मिल सकता है. हमसे मांगना. समाज से मांगना. सरकार से मांगना. सिस्टम से मांगना. हक से मांगना. ये सोचकर कभी मत हारना कि तुम बेटी हो. हम नहीं करेंगे तुम्हें कभी विदा. विदा तो उस घर से होता है कोई, जो उसका नहीं होता है. अब वक्त बदल रहा है आहना. बेटियां बदल रही है. मम्मी -पापा भी बदल रहे हैं. हम तुम्हारे साथ रहेंगे. तुम्हारे सपनों के साथ. आखिर तक.

पितृसत्ता में वंश परंपरा का बहुत लोभ होता है जिसकी वजह से पुत्र की कामना की जाती है. मैं इससे ऊपर उठ चुका हूँ और इस सोच की मुख़ालफ़त करता हूँ. मैं जब जब तुम्हें देखता हूँ तो वंश परंपरा के सारे लोभ से परे चला जाता हूँ और ख़ुद को निर्मल पाता हूँ. तुम ही मेरी वारिस हो और इसके अतिरिक्त कोई पहचान ढोने की जरुरत नहीं. तुम्हारी अपनी स्वतंत्र पहचान बने, यही कामना है. इन्सान अपने कर्म से जाना जाए और अपनी कीर्ति से सम्मानित हो न कि वंश परंपरा से. तुम एक स्वतंत्र इकाई हो, व्यक्ति हो. तुम स्त्री पैदा हुई हो मगर तुम्हें स्त्री बनाए रखने के तमाम उपकरणों और साज़िशों का घोर विरोध करुंगा. तुम्हें कभी गैरबराबरी का शिकार न होना पड़े और स्त्री होने के कारण कमतरी का अहसास न होने पाए, इसका ख़याल रखूंगा.

मैं चाहता हूँ कि तुम आर्थिक रुप से इतनी मज़बूत बनो कि किसी पर निर्भरता न रहे. संपत्ति का बँटवारा असमान है भारतीय समाज में. क़ानून तो बदल गया लेकिन समाज का बदलना बहुत आसान नहीं. एक सदी और लगे शायद. बहुत उम्मीद नहीं कि संपत्ति से पितृसत्ता का क़ब्ज़ा हटेगा. यह लडाई कुछ तुम्हें और कुछ मुझे लड़नी होगी. पहल मुझे करना है और आगे तुम्हें संभालना है. ख़ुद को गिल्ट से बचाए रखना भी जरुरी. इसके पहले ख़ुद को आर्थिक मज़बूती देना जरुरी. वह शिक्षा और सूझ से आती है. शिक्षा में भी पहले बहुत भेदभाव हुए. सब मैने देखा है… बदलते वक़्त के साथ यह भेद खत्म है. हमारे दौर के पिताओं ने इस मामले में गैरबराबरी लगभग खत्म कर दी. तुम्हें भी समान अवसर मिलेगा और तुम आर्थिक ताक़त लेकर उभरो.

-अजीत अंजुम, वरिष्ठ पत्रकार

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