सत्येंद्र कुमार यादव

2016 की बात है । उस वक्त मेरा बेटा अथर्व करीब 2 साल का होगा। उसकी मां कुसुम बॉथरूम में थी और अथर्व ने खेल-खेल में बाहर से डोर बंद कर दिया। जब कुसुम बॉथरूम से निकलने की कोशिश की तो दरवाजा बाहर से बंद पाया। उसने अथर्व को आवाज लगाई.. ‘बाबू दरवाजा खोलो …’ बाहर से अथर्व सिर्फ मम्मी-मम्मी बोल रहा था और साथ ही हंस भी रहा था। धीरे-धीरे 15 मिनट का वक्त बीत गया। अब कुसुम बॉथरूम में परेशान हो उठी थी । छोटा भाई अनिल दूसरे रूम में कंप्यूटर पर फिल्म देख रहा था। बेडरूम वाले हिस्से में आवाज ज्यादा थी इसलिए कुसुम की आवाज अनिल तक नहीं पहुंचा पा रही थी और इधर अथर्व को अपने किये की गंभीरता का अंदाजा नहीं था।

अब बॉथरूम के अंदर कुसुम की परेशानी बढ़ने लगी थी । फिर उसने बॉथरूम की खिड़की से सड़क की दूसरी छोर की बिल्डिंग में बालकनी पर खड़े शख्स को आवाज दी। सामने वाला भी समझ नहीं पा रहा था कि आवाज कहां से आ रही थी, क्योंकि बॉथरूम की खिड़की बहुत छोटी होती है। अगर सामने से प्रकाश ना आए तो कुछ दिखाई नहीं देता। दो तीन मिनट तक उस व्यक्ति को समझने में लगा कि आवाज कौन दे रहा है। जब उसे पता चला कि आवाज खिड़की से आ रही है… तो उसने पूछा कि क्या बात है..? कुसुम ने बताया कि बॉथरूम का दरवाजा बाहर से बंद हो गया है, कृपया मदद कीजिए। दूसरी मंजिल से उतर कर वो शख्स आया और बाहर वाले गेट को नॉक किया। अनिल ने दरवाजा खोला और पूछा क्या बात है? फिर उस शख्स ने बताया कि आपकी भाभी बॉथरूम में बंद है जाकर डोर खोल दें। अनिल तेजी से बॉथरूम की ओर गया और डोर खोल दिया। कुसुम ने पूछा कि मैं तभी से आवाज लगा रही थी आपको सुनाई नहीं दिया क्या ? अनिल ने कहा- कूलर और साउंड के शोर में मुझे कुछ पता नहीं चला।

ऐसा बहुत लोगों के साथ होता है। हर परिवार में बच्चों की इस तरह की शरारतों की कहानियां हैं। लेकिन जरा सोचिए जब एक व्यस्क एक कमरे में बंद हो जाता है तो वो भी बहुत जल्दी ऊब जाता है, घबरा जाता है… तो एक 2 साल की बच्ची अगर एक कमरे में बंद हो जाएगी तो अपनी मदद वो कैसे करेगी ? एक बंद फ्लैट में वो कैसे घंटों रहेगी ? सोच कर ही रूह कांप जाती है। लेकिन फिल्म पीहू में तो पीहू की मां अचेत अवस्था में बेड पर पड़ी है। पीहू को भूख लगती है तो वो मां को जगाती है लेकिन मां इतनी गहरी नींद में सो गई थी कि उसका उठना नामुमकिन सा था। थोड़ी देर मां को जगाने के बाद जब मां नहीं उठती है तो वो कभी फ्रीज से कुछ खाने के लिए खोजती है तो कभी कीचन में जाती है। फिर लौटकर अपने मां के पास आती है और रोने लगती है। रोते-रोते जब थक जाती है तो मां के ऊपर सो जाती है… बिल्कुल उसी तरह जिस तरह हर मां अपने बच्चे को सीने से चिपका कर सोती है। ठीक उसी तरह जब लाडली बेटी किसी बात पर रोती है तो मां पुचकारते हुए सीने से लगा लेती है। ठीक उसी तरह जब घर का कोई सदस्य चिढ़ता है तो रोने का नाटक करते हुए बच्चे अपने मां के गोद में चिपक जाते हैं। पीहू भी कुछ ऐसा ही करती है।

फिल्म के निर्देशक विनोद कापड़ी और नन्ही ‘पीहू’

अक्सर आप देखते होंगे कि छोटे बच्चे घर के स्विच ऑन ऑफ करते रहते हैं । उनका ध्यान ऐसे ही शरारत करने में होता है। आप बार-बार उन्हें रोकते हैं। करंट लगने के डर की वजह से आप तमाम उपाय करते हैं । कभी टेप से… तो कभी सेफ बोर्ड लगाते हैं। लेकिन उस दिन पीहू के कमरे में उसे रोकने वाला कोई नहीं था। मां बेड पर पड़ी थी और बेटी कमरे में घूम घूम कर कभी गीजर का स्विच ऑन कर देती है तो कभी ओवन, हीटर .. तो कभी फैन को ऑन-ऑफ करती है। यही नहीं ज्यादा भूख लगती है तो वो कीचन में जाकर गैस जला लेती है और उस पर पापड़ सेंकने लगती है। लेकिन क्या करे उस दिन उसके हक में कुछ भी नहीं हो रहा था। वो परेशान हो गई थी।

फोन की घंटी बजती है तो वो दौड़ते हुए मोबाइल फोन की ओर बढ़ती है लेकिन फोन इतना ऊपर था कि वो पहुंच नहीं सकती। फिर क्या था उसने स्टूल का सहारा लिया और फोन को हाथ में उठा लिया.. लेकिन यहां भी उसे निराशा ही हाथ लगी…क्योंकि, फोन उसके हाथ से छूट कर फर्श पर गिर गया। इस तरह वक्त धीरे धीरे मिनट से घंटों में बदल गया । जैसे जैसे वक्त बीतता जा रहा था वो थकती जा रही थी। बार-बार मां को जगाने की कोशिश कर रही थी… मां उठो ना.. भूख लगी है… उठो न मां… बोलते बोलते सो जाती थी। फिर जब नींद खुलती थी तो सर्वाइव करने का संघर्ष शुरू हो जाता था। घर में जो उसके पहुंच में था उसे खा कर अपनी भूख मिटाने की कोशिश करती रही। इसी बीच वो अपने खिलौनों के साथ भी मस्ती करती रही । खेल खेल में ही पीहू बालकनी में पहुंचती है और नीचे की ओर देखती है। तभी उसके हाथ से खिलौना छूटकर नीचे गिर जाता है । आप जानते हैं जब किसी बच्चे का खिलौना गिर जाता है तो उसे पाने के लिए वो क्या कर सकता है। पीहू बालकनी की रेलिंग पर चढ़ जाती है… तभी पैर फिसल जाता है… और!!!!!!!!!!

आगे क्या होता है ये तो 16 नवंबर को फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा। लेकिन ट्रेलर आप देखेंगे तो आप अंदर से कांप उठेंगे। आपको अपने बच्चे की चिंता सताएगी और बार-बार सोचेंगे कि पीहू का क्या हुआ ? उसकी मां को क्या हो गया था ? अगर मेरा बेटा ऐसे फंस जाएगा तो वो कैसे रहेगा ? आपके जेहन में आपकी लापरवाहियों कौंध उठेगी। आप ये सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि छोटे बच्चे जब घर में हों तो बॉथरूम बंद करें या नहीं… अगर आप घर से बाहर उन्हें अकेले छोड़कर गए हैं तो कहीं वो घर के अंदर से दरवाजा ना बंद कर लें.. ऐसे तमाम सवाल आपके मन में आने लगेंगे। पीहू का ट्रेलर रिलीज हो गया है। आपको एक बार देखना चाहिए क्योंकि रिलीज होने के कुछ ही घंटों में 18 लाख से ज्यादा लोग इसे देख चुके हैं और सभी यही कह रहे हैं कि 2 साल की बच्ची को लेकर ये फिल्म बनाना आसान नहीं था। 2 साल की बच्ची में अपने बच्चों की हरकतें, शरारतें देखेंगे और जो आप गलतियां करते हैं उसे भी महसूस करेंगे । ट्रेलर देखें- https://www.youtube.com/watch?v=zhWLhuEhXm4

ये फिल्म सच्ची कहानी पर बनी है । पत्रकार और फिल्म निर्देशक विनोद कापड़ी ने एक रोमांच पैदा जरूर किया है और दर्शकों में उत्सुकता पैदा कर दी है।देश से लेकर विदेश तक इस फिल्म की चर्चा है । कई फिल्म समारोहों में फिल्म समीक्षकों ने इसे सराहा भी है । महानायक अमिताभ बच्चन ने भी तारीफ की है।

अभिनेता मनोज बाजपेयी और अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने भी पीहू की सफलता की शुभकामनाएं दी हैं ।

ये फिल्म जहां आपको अपने बच्चों के साथ जोड़ती है वहीं ‘नानी मोरनी’ जैसे  गाने आपको ही नहीं आपके बच्चों को भी गुदगुदाएंगे । 


सत्येंद्र कुमार यादव, टीवी पत्रकार

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