पुष्यमित्र
किशनगंज शहर से टेढ़ागाछ प्रखंड की तरफ जाना था। दोस्तों ने मुझे दो रास्ते बताये। पहले रास्ते से 100 किमी की दूरी तय करनी थी, दूसरे रास्ते से 50-55 किमी। मगर साथ में उन्होंने यह भी कहा कि 50-55 किमी वाले रास्ते में एक चचरी पुल है और रास्ता कई जगह गड़बड़ है। यानी सड़कें खस्ताहाल हैं। उन्होंने कहा कि अगर आरामदेह सफर करना है तो 100 किमी वाले रास्ते से जाओ। अगर टेढ़ागाछ के दर्द को समझना है तो लौचा घाट के रास्ते से जाना। जाहिर सी बात है हमने लौचा घाट वाला रास्ता चुना।

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कौल नदी, जिसे आगे चल कर कनकई के नाम से पुकारा जाता है पर यह लौचा घाट है।जब हम वहां पहुंचे तो नदी की धारा कमजोर हो चली थी, दो पतली धाराओं में बह रही थी। दोनों पर चचरी के पुल बने थे। जिस पर पैदल के अलावा, टू-व्हीलर और फोर व्हीलर गाड़ियां पार हो रही थीं। यह संयोग था कि जब हम घाट के किनारे खड़े फोटोग्राफी कर रहे थे, तभी एक एंबुलेंस उस चचरी पुल से गुजर रही थी, जिसकी तस्वीर हमने ले ली।

नदियों और धारा से अटे कोसी-सीमांचल के इलाके में बांस और बल्लियों से बने चचरी के पुल कभी इस इलाके की लाइफ लाइन हुआ करते थे। क्योंकि सरकारों के पास तब इतना पैसा नहीं हुआ करता था कि हर नदी और धार पर पुल बनवाये। तब इन इलाकों के नाविक ऑफ सीजन यानी बाढ़ का पानी उतरने पर चचरी पुल तैयार करते। जब नदी में पानी बढ़ता और चचरी का पुल बह जाता तो नावें चलने लगतीं। मल्लाह समुदाय के ये घटवार दोनों सीजन में लोगों से अपना मेहनताना वसूलते। मगर नीतीश कुमार की सरकार जब आयी और वर्ल्ड बैंक से मदद मिली तो बिहार के कोने-कोने में सड़क और पुल बन गये। इस इलाके का दुर्भाग्य यह रहा कि उस दौर में भी यहां चचरी के पुल बचे ही रह गये। उन्हीं में से एक है लौचा घाट का चचरी पुल।

लौचा घाट इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस रास्ते पर आसपास के कई पंचायत तो निर्भर हैं ही, अररिया और नेपाल के लोग भी इस रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। यह किशनगंज के प्रमुख रास्तों में से एक है। हालांकि उस घाट पर पुल बन रहा है, मगर यह 2012 से ही बन रहा है। 2014 में तैयार होना था, मगर 2019 तक तैयार नहीं हो पाया। इस चुनावी साल में भी सीएम उसके उद्घाटन का क्रेडिट नहीं ले पाये।
जैसा कि हमने पहले ही बताया, लौचा घाट इस इलाके का इकलौता ऐसा घाट नहीं है, जिस पर चचरी पुल बने हैं। ऐसे दर्जनों पुल हैं। उस इलाके के पापुलर सोशल मीडिया ग्रुप खबर सीमांचल के मोडरेटर उन घाटों का नाम गिनाते हैं। ये हैं, पलसा घाट, मटियारी घाट, होलिया घाट, निशंद्रा घाट, असुरा घाट, हांडीभाषा घाट, खरखरी घाट, रतवा घाट, मिरचान टोला घाट, दल्ले गांव घाट, कंचनबाड़ी घाट, कुढ़ैली घाट, गोरुमारा घाट और हारीभाषा घाट। लौचा घाट की तो खुशकिस्मती है कि यहां पुल बन रहा है, इन तमाम घाटों में से ज्यादातर ऐसे हैं, जिन पर पुल बनने की बात सोची भी नहीं गयी है. लिहाजा चचरी पुल ही इनका सहारा हैं।
जब पानी का बहाव कम हो जाता है तब ऐसे पुल कारगर होते हैं।
घाट पर कई लोग मिलते हैं, जो बातचीत में ये बताते हैं कि जैसे रात ढलती है या मौसम बदलता है यह रास्ता चलने लायक नहीं रहता। फिर भले ही किसी की तबीयत खराब हो जाये या किसी गर्भवती महिला को दर्द शुरू हो जाये। गांव से उसका निकलना असंभव हो जाता है। इस घाट के अड़ोस-पड़ोस के दर्जनों पंचायत के लोगों का यही हाल है।
यह सच है कि इन इलाकों के लोगों का यह दुःख नया नहीं है। इन्हें इसके साथ जीने की आदत है। पर अगर अगल-बगल के इलाकों में रास्ता बेहतर हो जाये तो जो लोग विकास के इस दौर में छूट जाते हैं, उनका दुख और भी गहरा हो जाता है।

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पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। प्रभात खबर की संपादकीय टीम से इस्तीफा देकर इन दिनों बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता  करने में मशगुल ।