सियासत उसके लिए किसी अबूझ पहेली से कम नहीं थी। चुनाव लड़ना तो दूर उसके बारे में सोचने की फिर उसे फरसत नहीं थी। घर का कामकाज निपटाने के बाद वो परिवारर का खर्च चलाने के लिए पति के साथ रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने निकल जाती।

चाय वाली बनी ग्राम प्रधान
चाय वाली बनी ग्राम प्रधान

हर दिन सैकड़ों लोगों को चाय पिलाती, लोग चाय पीते-पीते सियासत की चर्चा करते और फिर चले जाते। इसी बीच साल 2014 में आम चुनाव के दौरान 7 RCR  तक की चर्चा होने लगी । कासगंज के मजरा जात पटियाली गांव की पूजा के चुनावी सफर की सीख और समझ की शुरुआत भी यही से हुई । पीएम मोदी का बचपन चाय बेचने से शुरू हुआ था लेकिन पूजा शादी के बाद चाय बेचने के काम में लगी । पीएम मोदी मां-बाप के काम में हाथ बंटाने के लिए चाय बेचा तो पूजा पति के परिवार का पेट पालने के लिए कासगंज के रेलवे स्टेशन पर चाय बचने लगी । वो पति से पीएम मोदी की चाय बेचने की कहानी सुना करती थी ।

पूजा ग्रेजुएट है लिहाजा उसे चाय बेचने के साथ जब कभी फुरसत मिलती वो मोदी के बारे में पढ़ती रहती । ये सिलसिला करीब डेढ़ साल तक चला और इसी दौरान यूपी में पंचायत चुनाव का ऐलान हो गया । संयोग से पूजा का गांव अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गया और पूजा के पति ने उसे चुनाव लड़ने की सलाह दी और वो चुनाव मैदान में कूद पड़ीं। पूजा कहती है- “ये सब उनके लिए आसान नहीं थी, लेकिन उनके पति ने हर कदम पर उनका साथ दिया और आज मैं चाय बेचने वाली से गांव की मुखिया बन गईं हैं “

कासगंज के मजरा जात पटियाली गांव प्रदेश से सबसे बड़े गोवों में से एक है। 16 मौजों के मजरा गांव में 4353 मतदाता हैं और चुनाव के दौरान करीब 56 फ़ीसदी यानी 2421 वोट पड़े थे । चुनाव मैदान में कुल 16 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमाने उतरे लेकिन पूजा ने सबकी जमानत जब्त कर दी और 447 वोट पाकर 100 मतों से अपनी जीत पक्की की । पूजा के लिए ये जीत काफी खास है क्योंकि आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब पूजा के मौजे से कोई चुनाव जीता है।

पूजा के ख़िलाफ़ गांव में जितने उम्मीदवार मैदान में उतरे उनमें पूजा सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी थीं । पूजा ने ग्रेजुएट के साथ बीएड की भी डिग्री ले रखी है जबकि चुनाव में उनको चुनौती देने वाली एक दो को छोड़ ज्यादातर प्राथमिक शिक्षा की ली थी लिहाजा गांव के लोगों ने एक पढ़ी लिखी महिला के हाथ में अपना भविष्य सौंप दिया। पूजा पीएम मोदी को अपना आदर्श मानती हैं और कहती हैं कि उनके परिवार से कभी किसी का राजनीति से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं रहा है लिहाजा जब गांव वालों ने उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है तो वो उन्हें निराश नहीं करेगीं । अब गांव में बदलाव उनका सपना है और उसे साकार करने के लिए वो हर मुमकिन कोशिश करेंगी।

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