‘सांसद’ अमिताभ बच्चन बनाम दिल्ली के ठग

एसके यादव के फेसबुक वॉल से साभार

सांकेतिक तस्वीर

बात 1985 चांदनी चौक, नई दिल्ली की है। उस समय इलाहाबाद से सांसद अमिताभ बच्चन हुआ करते थे। और मैं इलाहाबाद में आज अखबार में फोटोजर्नलिस्ट।
मैं दिल्ली किसी काम से गया हुआ था और मुझे अपने कैमरे के लिए एक बढ़िया लॉन्ग जूम लेंस 70-210 mm खरीदना था। तब लेंस और कैमरे किसी दुकान पर रखकर खुलेआम नहीं बेचे जाते थे, क्योंकि यह सभी विदेशी आइटम थे और ज्यादातर स्मगलिंग के माध्यम से नेपाल,कोलकाता या मद्रास से लाकर ग्रे मार्केट में बेचे जाते थे। चांदनी चौक उत्तर भारत का एक बड़ा ग्रे मार्केट था। मुझे बाजार के बारे में जानकारी नहीं थी। मैंने कई दुकानों पर पूछा लेकिन मनवांछित प्रोफेशनल लेंस नहीं नहीं मिला। मैं निराश भीड़भाड़ वाले बाजार में टहल रहा था, तभी फुटपाथ पर स्मगलिंग के सामान बेचने वाले दलाल टाइप के लोग भीड़ में आते जाते लोगों के कान में इंपोर्टेड सामानों का नाम लेकर फुसफुसाते हुए दिखे।

मुझे पता था इनसे बात करते ही यह गले पड़ जाएंगे। लेकिन मजबूरी थी, मुझे लेंस हर हाल में चाहिए था। मैंने एक दलाल से लेंस के बारे में पूछताछ की तो वह मुझे लेकर मुख्य सड़क से सटी लेन मैं एक कपड़े की दुकान पर ले गया और दुकानदार के कान में कुछ कह कर मुझे उसके हवाले कर दिया। मुझे आश्चर्य हुआ कि कपड़े का दुकानदार दराज में से चार पांच कैमरे और लेंस के कैटलॉग निकालता है वह मेरे सामने रख देता है, “बताओ इसमें से कौन सा आइटम चाहिए”
मुझे वांछित लेंस कैटलॉग में मिल गया, उसने पेंसिल से उसे अंडर लाइन किया, और फिर उस दलाल को इशारा करके बुला कर कैटलॉग उसे थमा दिया। दलाल बोला चलो माल गोदाम पर रखा है, दाम भी वहीं बताया जाएगा। मुझे शक हुआ और मैंने कहा मैं और कहीं नहीं जाऊंगा। लेंस यही मंगवाओ। दुकानदार बोला स्मगलिंग का सामान दुकान पर नहीं बेचते, गोदाम पर ही जाना पड़ेगा

मेरी मति मारी गई थी मैं दलाल के साथ चल दिया,उसने दुकान से निकलते ही मुख्य मार्ग पर खड़े रिक्शे पर मुझे बिठाया और कहा थोड़ी दूर पर गोदाम है। वह गुरुद्वारा पार करते हुए आगे एक पुलिस चौकी के निकट रिक्शे से उतर कर मुझे एक सुनसान गली की तरफ ले जाने लगा। मेरी घबराहट बढ़ रही थी, मेरे पास एक बैग में कैमरा था और मेरे पर्स में कैश पैसा था। तब एटीएम का चलन नहीं था।
मुझे लग रहा था मैं गलत कर रहा हूं, लेकिन परिस्थितियों के वशीभूत मैं उसके साथ बढ़ता गया। मैं एक समझदार और स्मार्ट फोटोजर्नलिस्ट था, किसी भी परिस्थितियों से निपट लेने मैं अपने को सक्षम मानता था, यही आत्मविश्वास मुझे उसके जाल में फंसाता जा रहा था। डर इसलिए लग रहा था कि मैं समुद्र समान विशाल और अनजान शहर दिल्ली में था।
घुमावदार रिहायशी टाइप गली में 100 गज चलने के बाद वह अचानक एक घर के दरवाजे पर रुका, दरवाजा खटखटाया, दरवाजे के छेद से एक आदमी झांकता है और दरवाजा खोल देता है। मैंने कहा यह तो घर है,वो बोला अंदर है गोदाम। अंदर जाते हुए मैंने पलट कर देखा तो वहां बैठे आदमी ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। लेकिन घर के अंदर सामने कपड़े की बड़ी दुकान सजी हुई थी, जिस पर तीन-चार सेल्समैन और काउंटर पर एक आदमी बैठा था। दलाल ने मुझे उनसे मिलाया। उसने कैटलॉग देखा और कहा कि आपने ये लेंस फाइनल कर लिया है, यही लेंस चाहिए? मोलभाव के बाद ₹4000 (आज के हिसाब से 80 हजार) मैं सौदा तय हुआ। उसने कहा पैसा जमा करो मैंने कहा पहले माल दिखाओ, मैंने कहा मैं उसे देखूंगा समझूंगा तभी खरीदूंगा। उसने मुझे भरोसे में लेते हुए कहा कि आप पैसा जमा कर दीजिए , तभी गोदाम पर पैसा देने से माल मिलेगा। अगर आपको लेंस पसंद नहीं आया तो आप अपना पैसा वापस ले लीजिएगा।

मैंने उसे पर्स में से पैसा निकाल कर दे दिया। इस दौरान उसने मेरे पर्स में रखे पैसे का भी अंदाजा लगा लिया।
पैसा देते ही दलाल और एक सेल्समैन वहां से रवाना हो गए। काउंटर पर बैठे दुकानदार ने मुझे चाय ऑफर की और वहां रखे कपड़े पसंद करवाने लगा।इधर समय बीतता जा रहा था और मेरी उलझन बढ़ रही थी। और दुकानदार लेंस के बारे में बात ही ना करता और बार-बार कपड़े पसंद करवाता और कहता यह ले लो, वो ले लो।मेरे मना करने के बावजूद उसने ढेर सारा कपड़ा खोल कर मेरे सामने रख दिया।मैंने उसे कड़ाई से मना किया मुझे इस में कोई रुचि नहीं है, इन सब में काफी समय बीत गया तो मैंने उससे कहा उन्हें जल्दी बुलाओ मुझे देरी हो रही है।
अब दुकानदार अपने असल रूप में आ गया। उसने कहा कि देखो यहां लेंस वगैरह कुछ नहीं मिलता यह तो कपड़े की दुकान है। जो आपको लेकर यहां आया था वह दलाल था वह अपना हिस्सा ₹2000 लेकर चला गया। 2,000 मेरे हिस्से में आए हैं इसके बदले तुम्हें कपड़ा खरीदना पड़ेगा। मैं गुस्से में आग बबूला हो रहा था, मैंने और कड़ाई के साथ उससे कहा कि मेरे पूरे पैसे वापस करो। दुकानदार कुटिल मुस्कान के साथ बोला कहां से आए हो? मैंने कहा इलाहाबाद से। उसने कहा आपको पता है दिल्ली की क्या चीज मशहूर है? मैंने कहा यह सब बकवास बंद करो। उसने कहा दिल्ली का ठग मशहूर है, और तुम इस समय दिल्ली के ठगों के चंगुल में फंस गए हो। मेरा शरीर गुस्से और भय से कांपने लगा। मुझे मेरे पर्स में रखे बाकी पैसे, बैग में रखा कैमरा और खुद की सुरक्षा सताने लगी। पल भर में मुझे सारी बात समझ में आ गई,मैंने सोचा अगर मैं भागा तो दरवाजे पर एक आदमी दरवाजा बंद करके बैठा है, मैं निकल नहीं पाऊंगा।
जोर जबरदस्ती से पार पाना आसान नहीं था, अचानक मुझे अपना बल याद आया, बिजली की तरह तेज दिमाग काम करने लगा, मैंने सोचा मैं एक पत्रकार होकर क्या वाकई ठग लिया जाऊंगा। मैंने सोचा यदि मैं पुलिस में जाऊंगा तो सबसे पहले तो पुलिस स्मगलिंग का सामान खरीदने के आरोप में मुझे पकड़ लेगी, फिर मैंने सोचा पुलिस पर पत्रकार होने की धौंस दूंगा, लेकिन खुद ही मन में जवाब आ गया कि यह सब ठगगिरी पुलिस की नाक के नीचे उनकी देखरेख में उनकी मिलीभगत से ही हो रही होगी।
मुझे फोटो पत्रकारिता में लाने वाले आज अखबार इलाहाबाद के तत्कालीन संपादक श्री Shashi Shekhar जी याद आई और मैंने सोचा जब मैं उन्हें अपने ठगे जाने की कहानी बताऊंगा तो वह क्या सोचेंगे? अचानक मेरे दिमाग में एक बात आई, मैंने दुकानदार से कहा तुम्हें पता है मैं इलाहाबाद से आया हूं , वह बोला हां, मैंने कहा वहां की कौन सी चीज फेमस है? उसने कहा पता नहीं. मैंने कहा वहां के सांसद अमिताभ बच्चन है, और मैं इलाहाबाद का पत्रकार हूं, मेरे पैसे चुपचाप वापस कर दो वरना मैं यहां से निकलकर सीधे सांसद आवास पर जाऊंगा और उसके बाद तुम्हारा क्या हश्र होगा तुम सोच लो। वह मेरी धमकी में नहीं आया, पलट कर बोला जाओ जो करते बने कर लेना। मैं तेजी से बाहर भागा, अपने सारे इष्ट देव को याद करने लगा और गुस्से में तेज आवाज में बोला दरवाजा खोलो, ईश्वर ने साथ दिया,दरवाजा खुल गया और मैं वहां से भागते हुए जब मुख्य मार्ग पर भीड़ में आ गया,तब मेरी जान में जान आई।
बाजार की भीड़ में मैं ठगा हुआ खड़ा था। सामने ही एक पुलिस चौकी थी, मैंने सोचा यहां पर शिकायत करने से कोई फायदा नहीं यह सब उन्हीं के लोग हैं। वहां से मैं तेजी से लाल किला चौराहे की तरफ भागा।रास्ते में थाना भी पड़ा मैं वहां भी नहीं रुका।
मैंने तय कर लिया था कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से शिकायत करने पर ही कुछ हो सकता है। लाल किले चौराहे पर पुलिस की पेट्रोलिंग जिप्सी दिखी। मैंने उसमें बैठे इंस्पेक्टर से अपनी आपबीती बताई और कहा कि मैं एसपी सिटी या एसएसपी से मिलना चाहता हूं।इंस्पेक्टर ने कहा यहां तो डीसीपी और कमिश्नर होते हैं, वैसे आपको उनसे मिलने की जरूरत नहीं,आप थाने जाइए आपकी मदद होगी।मैंने कहा मैं पत्रकार हूं और मैं अच्छी तरह जानता हूं कि बिना थाने की जानकारी और मिलीभगत के इस तरह खुलेआम ठगी नहीं हो सकती। इसलिए मुझे थाने से कोई उम्मीद नहीं है। इंस्पेक्टर ने कहा मेरे कहने से आप एक बार थाने जाइए अगर मदद ना होगी तो फिर आइएगा मैं आपकी पूरी मदद करूंगा।
मैं थाने पहुंचा संयोग से सामने बैठे थानेदार मिल गए। मैंने उनसे सारी बात बताई, खुद के पत्रकार होने और सांसद अमिताभ बच्चन का भी हवाला दे दिया। थानेदार कुछ भले दिखे, उन्होंने दो डंडाधारी सिपाहियों को बुलाया, उन्हें कुछ समझाते हुए, मुझे उनके साथ उन दुकानदारों के पास जाने को कहा। मैंने ताव में आकर कहा यह डंडा धारी सिपाही उनका कुछ नहीं कर पाएंगे। थानेदार ने दृढ़ता से कहा आप चिंता ना करें आपका काम होगा।
दोनों सिपाही चांदनी चौक की उस पहली दुकान पर गए, दुकानदार ने मुझे पहचानने से ही इंकार कर दिया। मैंने चीख कर सिपाहियों से कहा-मैंने कहा था आप लोगों से कुछ नहीं हो पाएगा। फिर सिपाहियों ने दुकानदार से कुछ कानाफूसी की, और कहा आपने जिस दुकान पर पैसा दिया वहां चलिए। अब हम लोग उस गली वाली दुकान में पहुंच गए। दुकान के अंदर जाने पर फिर वही बात पहचानने से इनकार। दबाव देने पर दुकानदार ने आने की बात स्वीकार की लेकिन यह कह दिया कि जिस दलाल के साथ आए थे, पूरा पैसा वही दलाल लेकर भाग गया।
मैंने सिपाहियों से कहा मैंने पहले ही कहा था आपसे कुछ नहीं होगा आप थाने वापस चलिए। उन सिपाहियों ने दुकानदार से कुछ कानाफूसी की। सिपाही उसे समझाने लगे कि मामला सांसद अमिताभ बच्चन तक जाएगा। इतना सुनते ही दुकानदार नरम पड़ गया। उसने दराज खोला और वही मेरी ₹4000 की गड्डी निकाल कर मेरे हाथ में रख दिया।
मेरे जान में जान आई। मन ही मन मैंने अमिताभ बच्चन जी को धन्यवाद दिया और कसम खाई कि अब कभी दिल्ली के दलालों के चक्कर में नहीं पडूंगा।


बाद में मैं कोलकाता गया और वहां से वो लेंस कोलकाता पोर्ट के निकट किसी मार्केट से खरीद लाया। Nikon 70-210 MM, f2.8. यह शानदार लेंस अगले कई सालों तक इलाहाबाद में कहर बरपाता रहा। और बाद में 6 दिसंबर1992 अयोध्या में बाबरी विध्वंस के समय हादसे का शिकार भी हुआ, इसकी भी दिलचस्प कहानी है जो फिर कभी।
कल रात जब अमिताभ जी के कोराना पॉजिटिव पाए जाने की खबर मिली, तो उनके साथ इलाहाबाद में कवरेज के दौरान बिताए गए एक-एक पल फिल्म की स्लाइड की तरह दिमाग में तैरने लगे और यह कहानी याद आ गई।

नोट:तस्वीरें सांकेतिक है

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