आशीष सागर दीक्षित

ashish sagar 3उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विभाजित बुंदेलखंड का इलाका पिछले कई सालों से प्राकृतिक आपदाओं का दंश झेल रहा है। भुखमरी और सूखे की त्रासदी से अब तक 62 लाख से अधिक किसान ‘वीरों की धरती’ से पलायन कर चुके हैं। साल 2005 से माह नवम्बर 2015 तक चार हजार किसान कर्जखोरी में आत्महत्या कर चुके हैं। कुछ ने फांसी लगा ली, कुछ ट्रेन से कटकर मरे और कुछ आत्मदाह कर खाक हो गए। 

आशीष की आंखों देखी- 6

‘वीरों की धरती’ कहा जाने वाला बुंदेलखंड देश में महाराष्ट्र के विदर्भ जैसी पहचान बना चुका है। बुंदेलखंड का भूभाग उत्तर प्रदेश के बांदा, चित्रकूट, महोबा, उरई-जालौन, झांसी और ललितपुर और मध्य प्रदेश के टीकमगढ़, छतरपुर, सागर, दतिया, पन्ना और दमोह जिलों तक पसरा है। यह इलाका पिछले कई साल से दैवीय और सूखा जैसी आपदाओं का दंश झेल रहा है। किसान ‘कर्ज’ और ‘मर्ज’ के मकड़जाल में जकड़ा है। तकरीबन सभी राजनीतिक दल किसानों के लिए झूठी हमदर्दी जताते हैं।

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता एवं किसान नेताओं की मानें तो इस इलाके के किसानों की दुर्दशा पर दो साल पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल की आंतरिक समिति ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक रिपोर्ट पेश की थी। विकास के लिए कुछ सिफारिशें भी कीं थीं, लेकिन यह रिपोर्ट अब भी पीएमओ में धूल फांक रही है। इस रिपोर्ट का हवाला देकर मऊरानीपुर के भारतीय किसान यूनियन (भानु गुट) के किसान नेता शिवनारायण सिंह परिहार बताते हैं कि बुंदेलखंड में पलायन सुरसा की तरह विकराल है।

आंकड़ों की बात करें तो उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड के जिलों में बांदा से सात लाख 37 हजार 920, चित्रकूट से तीन लाख 44 हजार 801, महोबा से दो लाख 97 हजार 547, हमीरपुर से चार लाख 17 हजार 489, उरई (जालौन) से पांच लाख 38 हजार 147, झांसी से पांच लाख 58 हजार 377 व ललितपुर से तीन लाख 81 हजार 316 और मध्य प्रदेश के हिस्से वाले जनपदों में टीकमगढ़ से पांच लाख 89 हजार 371, छतरपुर से सात लाख 66 हजार 809, सागर से आठ लाख 49 हजार 148, दतिया से दो लाख 901, पन्ना से दो लाख 56 हजार 270 और दतिया से दो लाख 70 हजार 477 किसान और कामगार आर्थिक तंगी की वजह से महानगरों की ओर पलायन कर चुके हैं।

किसान आत्महत्या और बुंदेलखंड विशेष पैकेज पर निगरानी रखने वाले संगठन प्रवास सोसाइटी के मुताबिक इस समिति ने बुंदेलखंड की दशा सुधारने के लिए बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण के गठन के अलावा उत्तर प्रदेश के सात जिलों के लिए 3,866 करोड़ रुपये और मध्य प्रदेश के छह जिलों के लिए 4,310 करोड़ रुपये का पैकेज देने की भी अनुशंसा की थी। संगठन यह भी बताता हैं कि सिर्फ उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेली किसान करीब छह अरब रुपये किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के जरिए सरकारी कर्ज ले चुके हैं। उधर, 7266 करोड़ का बुंदेलखंड पैकेज भी मार्च 2015 में पूरा हो चुका है। बुन्देली पलायन का वैसे तो आज तक कोई ज़मीनी सर्वे सरकार की तरफ से नहीं हुआ लेकिन हर साल पल्स पोलियो अभियान के आकड़े से यहाँ के गाँव में हो रहे पलायन की तस्वीर साफ हो जाती है।

अकेले बाँदा से 32 हजार किसान दिहाड़ी मजदूरी के लिए गुजरात के ईंट-भट्टों में काम करने गए हैं। ये आंकड़ा सूखे के इजाफे के साथ बढ़ता और घटता है। साल 2015 के माह अक्टूबर-नवम्बर में संपन्न जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत सदस्य चुनाव में भी किसान दूरस्थ शहरों से अपने गाँव नही लौट पाया। ग्राम प्रधानी के चुनाव 6 दिसंबर तक समाप्त होने हैं। बुंदेली किसानों के पलायन को चुनावी मुद्दा न बनाए जाने पर विभिन्न दलों के नेता अलग-अलग तर्क देते हैं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद विश्वंभर प्रसाद निषाद कहते हैं कि एसपी सरकार किसानों के हित में कई कल्याणकारी योजनाएं चला रही है और मुख्यमंत्री ने बुंदेलखंड विकास निधि की धनराशि में बढ़ोतरी कर यहां के समग्र विकास का वादा किया है। उनका कहना है कि जब विकास होगा, तब अपने आप पलायन रुक जाएगा।

बुंदेलखंड की तस्वीर
बुंदेलखंड की तस्वीर

उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायक दल के नेता और बांदा जिले की नरैनी सीट से विधायक गयाचरण दिनकर बुंदेलखंड में किसानों और कामगारों के पलायन का ठीकरा कांग्रेस और केंद्र सरकार पर फोड़ते हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आंतरिक समिति की रिपोर्ट पर अमल करते तो शायद हालातों पर काबू पाया जा सकता था, लेकिन जानबूझ कर ऐसा नहीं किया गया। अब केंद्र की मोदी सरकार भी किसानों के लिए अब तक वादे के सिवा कुछ नही कर सकी। देश में एक अदद किसान आयोग की आवश्यकता है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव साकेत बिहारी मिश्र कहते हैं कि राहुल गांधी हमेशा बुंदेलखंड पर मेहरबान रहे हैं, उनकी सिफारिश पर ही विशेष पैकेज दिया गया है, लेकिन मौजूदा एसपी सरकार ने इसकी धनराशि दूसरे कार्यो में खर्च कर दी। बीजेपी ने अपने घोषणा-पत्र में स्पष्ट किया था कि केंद्र की सत्ता में आने पर वह प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना और कम ब्याज दर पर कृषि ऋण उपलब्ध कराएगी। सिंचाई की समस्या दूर करने के लिेए नदियों को एक-दूसरे से जोड़ने की परियोजना भी अधर में है।

हाल ही में आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और स्वराज्य अभियान के संयोजक योगेन्द्र यादव ने भी हरियाणा से शुरू हुई अपनी ‘संवेदना यात्रा ‘ के दूसरे पड़ाव में विदर्भ और मराठवाड़ा की जगह बुन्देलखंड के सूखे को अपने सर्वे का आधार बनाया है। वे अर्थशास्त्री ज्या द्रेंज के साथ मिलकर यहाँ झाँसी, ललितपुर, जालौन के 200 गाँव की 28 तहसीलों में सूखे का सर्वे करवा रहे हैं। वहीं सूखे की हाय-तौबा के बीच केंद्र सरकार ने भी सूखे के आंकलन के लिए कृषि मंत्रालय में निदेशक हार्टिकल्चर अतुल पटेल को 5 और 6 नवम्बर को बुंदेलखंड के जिलों का दौरा करने को भेजा।

उत्तर प्रदेश सरकार अपनी रिपोर्ट में खरीफ की फसल में 70 फीसदी का नुकसान मान रही है। अकेले बाँदा में 95,184 हेक्टेयर रकबे में दलहन और तिल की खेती चौपट हुई है। यहाँ लघु सीमांत किसानों ने 68,241 हेक्टयेर में तिल, ज्वार, बाजरा, अरहर, धान बोया था जो बेकार हो गया। प्रदेश सरकार से जिला प्रसाशन ने बाँदा के लिए ही 73 करोड़ रूपये अनुदान देने की मांग की है जिसमे सीमान्त किसानों के लिए 56,75,21000 और बड़े कास्तकार के लिए 17,90,75000 रुपये की मांग की गई है।

बुजुर्ग राजनीतिक विश्लेषक और अधिवक्ता रणवीर सिंह चैहान क कहना है कि सभी दल किसानों की झूठी हमदर्दी दिखाकर अपना मकसद पूरा करते हैं और अभागे किसान आत्महत्या करने को मजूबर हैं। किसानों के दर्द और सियासतदानों के हमदर्द बोलों का ये अंतहीन सिलसिला पता नहीं कितनी खुदकुशियों के बाद थमेगा?


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बाँदा से आरटीआई एक्टिविस्ट आशीष सागर की रिपोर्ट। फेसबुक पर एकला चलो रेके नारे के साथ आशीष अपने तरह की यायावरी रिपोर्टिंग कर रहे हैं। चित्रकूट ग्रामोदय यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र। आप आशीष से ashishdixit01@gmail.com इस पते पर संवाद कर सकते हैं।


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