अरुण प्रकाश

kumar ashishहमारे देश में पुलिसिया ख़ौफ़ की कहानी किसी से छिपी नहीं है। पुलिस की छवि कुछ ऐसी है कि उसका नाम लेने पर सिर्फ डर और भय ही याद आता है। अंग्रेजों के जमाने में बनी छवि को तोड़ने की कोशिश पुलिस विभाग की तरह से भी कम ही हुई है, वजह चाहे जो भी रही हो। आजादी के 68 बरस बाद भी पुलिस का रवैया बहुत ज़्यादा नहीं बदला है। ऐसे में पुलिस को प्यार और आदर की नज़र से देखने की बात से एक तरह का रोमांच तो जरूर पैदा होता है। मधेपुरा में पुलिस, मीडिया और जनता को जोड़ने के लिए एक व्हाट्स ग्रुप बना तो उसकी टैग लाइन रखी गई- ‘लव योर पुलिस’। 

मधेपुरा के पुलिस कप्तान कुमार आशीष के साथ टीम बदलाव के छोटे से इंटरेक्शन से इस फलसफे को लेकर थोड़ा भरोसा पैदा होता है। कुमार आशीष की कोशिश है कि पुलिस के प्रति लोगों के नजरिए में बदलाव आए। पब्लिक पुलिस अफ़सर से प्यार का नाता बनाए और पुलिस इस भावना का सम्मान करे। दिल्ली के जेएनयू से पढ़े-लिखे मधेपुरा के युवा एसपी कुमार आशीष एक ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं, जिसमें संवाद की अनंत संभावनाएं हों। शिकवे-शिकायतें भी एक सभ्य और शालीन समाज की मर्यादा के साथ हों। 

साहेब तक सीधी पहुंच- पहली तसल्ली तो इतने भर से हो जाती है।
साहेब तक सीधी पहुंच- पहली तसल्ली तो इतने भर से हो जाती है।

कुमार आशीष जैसे गिने-चुने पुलिस अफ़सरों की ऐसी कोशिशों का कामयाब होना पूरे समाज के हित में है। मधेपुरा में महज 6 महीने में उन्होंने कुछ ऐसे सख़्त फैसले लिए हैं, जिससे पुलिसवालों के बर्ताव में बदलाव आया है। थाना इंचार्ज या पुलिसकर्मी किसी से दुर्व्यवहार करने से पहले 100 बार सोचते हैं। ग़लत व्यवहार की शिकायत उन्हें लाइन हाजिर करने के लिए काफी है। कुमार आशीष पूरी तरह से हाईटेक हैं। वो सोशल साइट्स पर भी लोगों की समस्याओं को सुनते हैं। कई छोट-छोटे लेकिन सराहनीय कदम उठाकर कुमार आशीष पुलिस की छवि बदलने की मुहिम में जुटे हैं। टीम बदलाव के साथी अरुण प्रकाश से बातचीत में कुमार आशीष ने अपने अनुभव और ऐसा करने के पीछे की सोच को साझा किया।

बड़े बदलाव को मुस्तैद है कुमार आशीष और उनकी टीम।
बड़े बदलाव के लिए मुस्तैद है कुमार आशीष और उनकी टीम।

बदलाव– ‘लव योर पुलिस’, सुनने में जितना अच्छा लगता है भरोसा उतना ही मुश्किल ?

कुमार आशीष– आप ठीक कह रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में मैंने इस दिशा में काफी काम किया है। जिससे ये तो समझ में आ गया कि अगर आप नेक-नीयत से कुछ भी करेंगे तो लोग आप पर भरोसा जरूर करेंगे। 6 महीने की कड़ी मेहनत के बाद धीरे-धीरे लोग पुलिस पर भरोसा करने लगे हैं। मेरी कोशिश पुलिस को जनता का दोस्त बनाना है और ये असंभव नहीं है।

बदलाव– पुलिस के प्रति लोगों में भरोसा कैसे जगाया जाए, इसके लिए क्या कुछ करना पड़ता है? 

कुमार आशीष– अगस्त 2015 में बतौर एसपी मेरी मधेपुरा में तैनाती हुई । उस दौरान विधानसभा चुनाव चल रहा था । मेरे सामने शांतिपूर्ण चुनाव करना चुनौती थी। लिहाजा मैंने हर मुमकिन कोशिश की। आपराधिक तत्वों को जेल में डाला। भारी मात्रा में असलहे और 13 हज़ार लीटर से ज्यादा शराब जब्त की। नतीजा ये हुआ कि चुनाव शांतिपूर्ण संपन्न हुआ और यही मेरे लिए जनता का भरोसा जीतने की पहली सीढ़ी थी।

मां, जिनके आशीष ने कामयाबी की राह आसान की। मां अब साथ नहीं है, लेकिन कुमार आशीष ने उन्हें अपनी ज़िंदगी में भगवान का दर्जा दे दिया है।
मां, जिनके आशीष ने कामयाबी की राह आसान की। मां अब साथ नहीं है, लेकिन कुमार आशीष ने उन्हें अपनी ज़िंदगी में भगवान का दर्जा दे दिया है।

हालांकि चुनाव के अगले दिन ही मां के निधन की वजह से मुझे अपने घर जाना पड़ा, जब तक मैं पारिवारिक जिम्मेदारियों से लौटता तब तक अपराधियों ने आतंक मचा रखा था। हर तरफ से लूट और हत्या की ख़बरें आ रही थी, लिहाजा मैंने बेस्ट पुलिस अधिकारियों की एक टीम बनाई। इस टीम में टेक्निकल से लेकर साइबर सेल के एक्सपर्ट्स शामिल किए। अपनी टीम की मदद से मैंने इलाके के कई नामी बदमाशों को सलाखों के पीछे पहुंचाया। दिसंबर आते-आते अपराध पर काफी हद तक लगाम लग गया।

बदलाव– आपने सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर पुलिस को ला खड़ा किया है, इससे क्या फायदा हो रहा है?

पुलिस को स्मार्ट और संवेदनशील बनाने की कवायद आसान नहीं। पिछले 6 महीनों में मधेपुरा में पुलिसवालों की कई वर्कशॉप की गई है।
पुलिस को स्मार्ट और संवेदनशील बनाने की कवायद आसान नहीं। पिछले 6 महीनों में मधेपुरा में पुलिसवालों की कई वर्कशॉप की गई है।

कुमार आशीष– सोशल मीडिया ही वो माध्यम है जो पुलिस को जनता का दोस्त बनाने में हमारी मदद कर रहा है। आप यकीन नहीं करेंगे जब जनवरी में मैं मधेपुरा पुलिस को फेसबुक पर लेकर आया, और उस पर अपना फोटो लगाया तो पहले ही दिन करीब 2 से 3 हज़ार लोग इस अकाउंट से जुड़ गए। मुझे समझने में देर नहीं लगी कि जनता पुलिस के करीब आना चाहती है। लिहाजा मैंने पुलिस को जनता के करीब भेजने का फ़ैसला किया। सोशल साइट्स पर जनता की जो भी शिकायतें होती हैं, उसे तुरंत दूर किया जाता है। किसी भी तरह की जानकारी मिलते ही उस पर बिना देर किए कार्रवाई की जाती है। मैं खुद दिन हो या रात जब जैसी जरूरत पड़ती है, मौके पर पहुंच जाता हूं। रेड मारने में देर नहीं करता। आज मधेपुरा पुलिस के अकाउंट से 10 हज़ार से ज्यादा लोग जुड़ गए हैं। बाकि अलग-अलग थाना प्रभारियों के पेज से जुड़े लोगों की संख्या तो पूछिए मत।

ये है असर- चौसा के थाना अध्यक्ष, सुमन कुमार सिंह... गो टू स्कूल कैंपेन में सहभागिता निभाते हुए।
ये है असर- चौसा के थाना अध्यक्ष, सुमन कुमार सिंह… गो टू स्कूल कैंपेन में सहभागिता निभाते हुए।

बदलाव– पुलिस पब्लिक की दोस्ती, खयाल कैसे आया? ऐसी मुहिम आपने मधेपुरा से पहले भी चलाई थी क्या?

कुमार आशीष– मेरे लिए ये दूसरा प्रयोग है ? साल 2014 की बात है। ट्रेनिंग के बाद मेरी पहली पोस्टिंग दरभंगा में एएसपी के पद पर हुई। वहीं मुझे सोशल मीडिया की ताकत देखने को मिली। मैंने पुलिस का फेसबुक अकाउंट खोला। उस पर मिलने वाली शिकायतों पर आधी रात को भी कार्रवाई कर देता।

24 दिन का वक़्त ही क्या होता है? अगर इतने छोटे वक्त में जनता किसी अधिकारी के लिए सड़क पर उतरे तो कुछ तो बात रही होगी...
24 दिन का वक़्त ही क्या होता है? अगर इतने छोटे वक्त में जनता किसी अधिकारी के लिए सड़क पर उतरे तो कुछ तो बात रही होगी…

एक बार शिकायत मिलने पर शराब माफियाओं के ख़िलाफ़ मुहिम चलाई और नियम का पालन न करने वाले ठेकों पर ताला लगा दिया। नतीजा ये हुआ कि मैं दरभंगा में 24 दिन भी नहीं टिक सका, क्योंकि जिस शराब के ठेके को बंद कराया था वो किसी राजनेता की क्षत्रछाया में चल रहा था। मेरे तबादले के ख़िलाफ़ इलाके के लोगों ने काफी प्रदर्शन किया। फिर भी कोई फायदा नहीं हुआ और मैं बेगूसराय भेज दिया गया। यहां भी मेरी मुहिम जारी रही, खेल-कूद से लेकर स्कूलिंग तक अलग-अलग तरह से लोगों के बीच काम किया और अगस्त में बतौर एसपी मधेपुरा आ गया।

बदलाव– पुलिस में फैले भ्रष्टाचार से निपटने के लिए आपका क्या प्लान है ?

कुमार आशीष– जब भी मुझे मौका मिलता है जनता से सीधा संवाद करता हूं। फेसबुक से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में मैं हर किसी से अपील करता हूं कि कभी भी पुलिसवाला आपसे रिश्वत मांगे या फिर डराए-धमकाए तो उसकी सूचना सबूत के साथ दें। उस पर कार्रवाई होगी।

बदलाव की हरी झंडी... कप्तान साहब, इसे थामे रखिए... काफिला ज़रूर बनेगा... ज़रूर बढ़ेगा
बदलाव की हरी झंडी… कप्तान साहब, इसे थामे रखिए… काफिला ज़रूर बनेगा… ज़रूर बढ़ेगा

बदलाव– सुना है आप जनता से गलत तरीके से बात करने पर भी पुलिसवालों पर कार्रवाई कर देते हैं।

कुमार आशीष– हा..हा….हा….ये करना ज़रूरी है। पुलिस और पब्लिक को एक दूसरे का दोस्त बनाना है तो हर छोटी से छोटी बातों का ध्यान रखना होगा। किसी ने मुझे सबूत के साथ शिकायत भेजी कि एक पुलिसवाले ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया है, लिहाजा मैंने उसे लाइनहाजिर कर दिया।

बदलाव– पुलिसवालों को नई भूमिका के लिए तैयार करना एक चुनौती है, उसके लिए क्या कुछ कर रहे हैं ?

कुमार आशीष– इस दिशा में मैंने काफी काम किया है। इसके लिए बाकायदा प्रोफेशनल के जरिए पुलिसवालों को ट्रेनिंग दिलाई जा रही है। फिटनेस से लेकर बातचीत के तरीके सिखाएं जा रहे हैं। हमारी कोशिश ये है कि पुलिस अंग्रेजों के जमाने से बाहर निकले ताकि जनता के भीतर से उसका डर ख़त्म हो।

कहते हैं सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का? यहां तो कोतवाल साहब भी रडार पर हैं।
कहते हैं सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का? यहां तो कोतवाल साहब भी रडार पर हैं।

बदलाव– क्या आपको कभी पुलिस से डर लगता था। पुलिस सेवा में आने का मन कैसे बना ?

कुमार आशीष– (हंसी के साथ) सच कहूं तो बचपन में पुलिस के नाम पर मैं क्या, पूरा गांव कांप उठता था। इलाके में कांस्टेबल आ गया तो जैसे लगता था क्या हो गया? आखिर पुलिस क्यों आई?  पुलिसवालों से दूर रहो, कुछ इस तरह के विचार आते थे। वैसे तो पुलिस में ही आना है, ऐसा कुछ कभी नहीं सोचा। हां ये जरूर सपना था कि सिविल सर्विस में जाना है और आज यहां हूं ।

बदलाव– बचपन से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक पढ़ाई लिखाई कहां से की ?

कुमार आशीष– 12वीं तक की पढ़ाई होम टाउन में की और उसके आगे की दिल्ली से। जेएनयू में पढ़ने का सौभाग्य मिला। वहीं से पीएचडी भी की और IPS तक का सफर तय किया।

बदलाव– जेएनयू के दिनों की कुछ यादें बांटना चाहेंगे ?

जेएनयू के दिनों की कुछ यादें
जेएनयू के दिनों की कुछ यादें

कुमार आशीष– जेएनयू के दिन भी क्या दिन थे? बिंदास लाइफ थी। दिल्ली से लेकर अमेरिका तक गांव से लेकर शहर तक कोई ऐसा मुद्दा नहीं होता था, जिस पर हम लोग चर्चा नहीं करते थे। सीनियर हो या जूनियर क्लास रूम हो या खाने की टेबल, पढ़ाई के साथ मस्ती भी खूब होती थी। आज भी मेरे काम को लेकर काफी दोस्तों का फोन आता है, सराहना करते हैं जिससे कुछ नया करने की ऊर्जा मिलती है।

बदलाव- उम्मीद है कि आप इसी तरह समाज में नया बदलाव करते रहेंगे ताकि समाज को एक बेहतर पुलिसिंग मिल सके। बदलाव से बात करने के लिए शुक्रिया ।

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अरुण प्रकाश। उत्तरप्रदेश के जौनपुर के निवासी। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र। इन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सक्रिय।


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