IAS RAVI YADAV
बेटे ने बढ़ा दिया किसान पिता का मान। मां की खुशी के कहने ही क्या?

उत्तर प्रदेश के संतकबीर नगर जिले के देवलसा गांव में एक किसान परिवार के घर और खेतों में इस बार एक ऐसी ‘फ़सल’ लहलहा रही है, जिसके बीज सालों पहले बोए गए थे, और जिसे ये परिवार अब सालों तक थोड़ा-थोड़ा कर काटता रहेगा, खुश होता रहेगा। ये फ़सल है घर के लाडले रवि यादव की कामयाबी की। रवि ने यूपीएससी की परीक्षा में कामयाबी हासिल की है। एक किसान पिता फिलहाल तो इस ‘फ़सल’ को निहारने और उसका बखान करने में ही गदगद है। खुशी के इन पलों में बदलाव के लिए रवि से कुछ बातें की ए पी यादव ने।

देवलसा गांव का पहला आईएएस बेटा

बदलाव– गांव की गलियों में खेलते-कूदते IAS जैसे बड़े सपने की शुरुआत कब और कैसे हुई ?

रवि यादव– बचपन से ही ‘साहब’ बनने का सपना था, लेकिन IAS क्या होता है न मुझे पता था न परिवार के लोगों को। हां, चाचा जी समझाने के लहजे में इतना जरूर कहते- “बचवा, पढ़ लिखकर कलक्टर बन जाओ, साहेब का मानी-मतलब सब समझ जाओगे।” थोड़ा बड़ा हुआ गुरूजनों का सहयोग मिला और 10वीं तक आते-आते IAS का मतलब ही नहीं समझा, इरादा भी पक्का हो चला।

बदलाव– अपने शुरुआती दिनों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में आप क्या सोचते हैं ?

रवि यादव– गांव के सरकारी प्राइमरी स्कूल में ही शुरुआती पढ़ाई हुई। इंटर मीडिएट तक गांव के आसपास के स्कूल जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। लेकिन ग्रेजुएशन के लिए गांव से 25 किलोमीटर दूर एक कॉलेज में दाखिल लिया। गांव से कॉलेज की सीधी कनेक्टिविटी नहीं थी। थोड़ी दूर जाने पर गाड़ी मोटर जरूर मिल जाती लेकिन इतना पैसा नहीं था। इसलिए घर से 25 किमी की दूरी साइकिल से नापी और बीकॉम की पढ़ाई की।

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बदलाव– सिविल परीक्षाओं की तैयारी के दिनों की कुछ यादें…

रवि यादव– साल 2011 मेरे जीवन का वो पल था जब मैं पहली बार तैयारी के लिए शहर की ओर चल पड़ा। पूरी पढ़ाई गांव में हुई, लिहाजा न तो शहर की जानकारी थी और न वहां के रहन सहन की। इलाहाबाद में सिविल की तैयारी होती है ऐसा सुना था, सो वहीं के लिए निकल पड़ा।
जब पहली बार इलाहाबाद पहुंचा तो बिल्कुल अकेला था, रहने का कोई ठिकाना नहीं था। इलाहाबाद पहुंचने में रात हो गई थी, सोचा- कहां भटकूंगा। फिर तय किया कि स्टेशन पर ही रात गुजारता हूं, सुबह देखा जाएगा। लिहाजा स्टेशन पर ही सो गया। सुबह उठा और ठिकाने की तलाश में निकल पड़ा । कर्नलगंज में एक 1800 रुपए किराए पर एक रूम लिया, रेंट थोड़ा ज्यादा था लेकिन उससे सस्ता कोई और नहीं मिला। रहने के लिए छत का ठिकाना हो गया था सो कोचिंग की तलाश में निकल पड़ा । काफी तलाश करने के बाद एक सस्ता और अच्छा सा कोचिंग सेंटर मिल गया और तैयारी शुरू कर दी।

बदलाव- … तो इन चार-पांच सालों का खर्च कैसे चलता रहा…

रवि यादव– माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए कोचिंग के टीचर्स ने सलाह दी कि पहले कोई नौकरी हासिल कर लो और फिर सिविल की तैयारी करते रहो। IAS और SSC का पैटर्न देखा तो ज्यादा अंतर नहीं लगा। SSC का इम्तिहान दिया। पहली कामयाबी मिली और मैं लेखाधिकारी बन गया। 15 मार्च 2013 को इलाहाबाद ही ज्वाइन कर लिया, लेकिन IAS की तैयारी नहीं छोड़ी ।

बदलाव– जब रिजल्ट आया तो आप कहां थे और जानकारी कैसे मिली?

रवि- उस वक़्त मैं गांव में ही था। इंटरनेट की कोई सुविधा नहीं थी, लिहाजा पास में ही गांव के एक चाचाजी की दुकान है। उनके यहां अखबार आया करता है, लिहाजा सबसे पहले उन्होंने ही जानकारी दी और पूरा परिवार खुशी से झूम उठा।

बदलाव– गांव के लोगों में क्या प्रतिक्रिया थी, क्या इससे पहले कोई IAS बना था?

रवि– नहीं मैं अपने गांव का पहला IAS बेटा हूं, हालांकि इस बार मेरे साथ जिले में दो और युवकों ने सिविल परीक्षा में सफलता हासिल की है। तब से हर दिन पूरे गांव में खुशियां मन रही हैं, जश्न सा माहौल है।
ये मोहब्बत देख मन गदगद है। गांव के हर दुख-दर्द को मैंने करीब से देखा है, मेरी चाहत है कि ऐसे इलाके में पोस्टिंग हो जहां, गांव के गरीब और बेसहारा लोगों के लिए कुछ कर सकूं।

ias ravi toffiबदलाव– गांव में कामयाबी का ये सिलसिला जारी रहे, इसके लिए क्या किया जाना चाहिए।

रवि यादव– बुरा न माने तो दिल की एक बात कहूं। टीचर्स को बच्चों को डांटने-फटकारने से नहीं रोकना चाहिए। वो हमारा बुरा नहीं चाहते, भले के लिए ही थोड़ी सख़्ती दिखाते हैं, जो कई बार बेहतर रिजल्ट दे जाती है।
गांव में सबसे बड़ी समस्या लाइट की होती है, 3-4 घंटे से ज्यादा बिजली आती नहीं। मैंने दीये की रौशनी में पढ़ाई की। कभी कभार तो केरोसिन भी घर में नहीं रहता, तो मां सरसों के तेल का दीया बनाकर उजाला करती थी। इसलिए मैं चाहता हूं कि गांवों में बिजली की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। कम से कम शाम को तो जरूर बिजली आनी चाहिए ताकि बच्चे पढ़ाई कर सकें। बच्चों के लिए गांवों में लाइब्रेरी की व्यवस्था होनी चाहिए।

बदलाव– गांव के बच्चों के लिए कोई संदेश ?
रवि- मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि हारिए न हिम्मत, बिसारिए न हरि नाम। हौसला रखिए और ईमानदारी से मेहनत कीजिए सफलता आपके कदम चूमेगी। अगर भूखे पेट सोने की नौबत आए तो विचलित न होइए। मैंने जली-भूनी रोटी खाकर भी रात बिताई है लेकिन मंज़िल से कभी नहीं भटका। यकीन मानिए जितना कष्ट होता है, उसका परिणाम उतना ही सुखद।

बदलाव- गांवों में रोजगार सबसे बड़ी समस्या है, ऐसे में स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम गांव के लिए कितना मददगार होगा?
रवि यादव– मेरा मानना है कि पढ़ेगा इंडिया तभी बढ़ेगा इंडिया। बेहतर शिक्षा के साथ हुनर को तराशने की व्यवस्था बेहद ज़रूरी है। गांवों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं, लेकिन प्रशिक्षण के अभाव में धूल जमी है। स्किल डेवलपमेंट स्कीम धूल की परत को साफ करने में सकारात्मक भूमिका निभा सकती है।

जमीर जिनका बुलंद हो, वो रवि की तरह उदय होते हैं। रिश्वत को ना करना ही इनके लिए वरदान बन गया।
जमीर जिनका बुलंद हो, वो रवि की तरह उदय होते हैं। रिश्वत को ना करना ही इनके लिए वरदान बन गया।

बदलाव- आपके जीवन से जुड़ी कुछ ऐसी बातें जो आप कभी नहीं भूल पाएंगे ?
रवि- (हंसते हुए) एक बार की बात है मैंने बैंक की नौकरी के लिए परीक्षा दी थी और पास भी हो गया था। इंटरव्यू के लिए कॉल भी आई लेकिन नहीं हो सका, क्योंकि मैंने रिश्वत नहीं दी। इंटरव्यू से पहले मेरी एक शख़्स से मुलाक़ात हुई और कहा कि 6 लाख रुपये का इंतजाम करो मैं तुम्हार सेलेक्शन करा दूंगा। लेकिन ना ही मेरी हैसियत थी और न ही मेरे ज़मीर ने ऐसा करने की इजाज़त दी। लिहाजा मैं इंटरव्यू छोड़ वापस गांव लौट गया और घरवालों को पूरी दास्तां सुनाई तो सबने एक सुर में यही कहा कि ‘अच्छा किया’। मेरा संयुक्त परिवार है । दादा-दादी, चाचा-चाची सभी ने मेरा हौसला बढ़ाया । अच्छा ही हुआ मैंने सच्चाई और ईमानदारी का रास्ता चुना नहीं तो आज IAS नहीं होता।