टीम बदलाव

“बाबूजी सच कहूं, मेरी निगाह में न कोई छोटा है न कोई बड़ा, मेरे लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है, जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है..”। 26 जून 2016 को रायपुर में विनय तरुण स्मृति कार्यक्रम में धूमिल की रचना ‘मोचीराम’ की इन चंद लाइनों के साथ एक प्रस्तुति आकार लेती है। मंच जहां कुछ देर पहले तक आदिवासियों और पीड़ितों के मुद्दों पर बातें हो रहीं थी, वो मंच अब एक कवि की संवेदना का गवाह बन रहा था।

सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ की रचना- ‘मोचीराम’ को शिरीष खरे ने बड़ी खूबसूरती से अपने अभिनय के जरिए संवारा। ‘राँपी से उठी हुई आँखों’ से संवाद करते हुए शिरीष वहां मौजूद हर शख्स को टटोलते रहे। ‘पेशेवर हाथों और फटे जूतों के बीच’ के आदमी की अलग-अलग मनोदशाएं रायपुर प्रेस क्लब के इस अनगढ़ मंच पर तैर रहीं थीं।  ‘अँगुली की चोट छाती पर
हथौड़े की तरह’ महसूस हो रही थी। जूते और आदमी की नवैयत को बयां करती ये कविताई शिरीष खरे के संवेदनशील अभिनय से बखूबी संप्रेषित होती गई।

कोई जूता ‘चकतियों की थैली’ उस हताश और निराश आदमी का प्रतीक बन गया, जो  ‘टेलीफ़ून के खंभे पर
उम्मीद की पतंग की तरह खड़खड़ा रहा है।’ मोचीराम के मन में बसा इंसान ठगी नहीं करता वो तो ये सवाल करता है- ‘बाबूजी! इस पर पैसा क्यों फूँकते हो?’mochi
प्रस्तुति में शिरीष खरे उस आदमी की नवैयत से भी दर्शकों को रूबरू कराते हैं, जो हमेशा हड़बड़ी में रहता है। एक आदमी निकलता है/सैर को/न वह अक्लमंद है/न वक्त का पाबंद है
उसकी आँखों में लालच है/ हाथों में घड़ी है/ उसे जाना कहीं नहीं है/मगर चेहरे पर
बड़ी हड़बड़ी है।

‘हिटलर के नाती’ की तरह कैसे मोचीराम पर रौब गांठा जाता है और नामा देने के वक्त जनाब नट जाते हैं, ये भी शिरीष की हरकतों से बयां हो गया। शरीफों को भले ही ग़लतफहमी हो लेकिन मोचीराम इन सबसे परे हैै। वो समझता है कि पेशे और जूते के बीच एक आदमी रहता है। इसी बीच मोचीराम उछलकर मंच पर रखे डेस्क पर चढ़ जाता है। और वहां से वो ऐलान करता है, जो कवि की संवेदना का चरम है-

motchi2और बाबूजी! असल बात तो यह है कि ज़िंदा रहने के पीछे/
अगर सही तर्क नहीं है/तो रामनामी बेंचकर या रंडियों की/दलाली करके रोजी कमाने में/कोई फ़र्क नहीं है/और यही वह जगह है जहाँ हर आदमी/ अपने पेशे से छूटकर
भीड़ का टमकता हुआ हिस्सा बन जाता है

एक कविता की प्रस्तुति बेहद टफ हो जाती है। अगर ज़रा सा भी दर्शकों से कनेक्ट टूटा नहीं कि भाव कहीं और बिखर सकते हैं और अभिनेता कहीं और भटक सकता है। लेकिन शिरीष खरे पूरी कविता में इस संतुलन को साधे रखते हैं।  वो पल भर में ज़िंदगी की तल्खियों के बीच ‘बसंत’ का एहसास भी करा देते हैं। मोचीराम का मन कभी-कभी झुंझलाए बच्चे की तरह काम पर आने से इंकार कर देता है लेकिन मोचीराम के मन में बसा ‘शायर’ कविताई करता चला जाता है। ये वो मौका होता है जब दम साधे कविताई का मजा ले रहे दर्शक खुद ब खुद तालियां बजा उठते हैं। मगर जो ज़िंदगी को किताब से नापता है/जो असलियत और अनुभव के बीच/खून के किसी कमज़ात मौके पर कायर है/वह बड़ी आसानी से कह सकता है/कि यार! तू मोची नहीं, शायर है/असल में वह एक दिलचस्प ग़लतफ़हमी का शिकार है/जो वह सोचता कि पेशा एक जाति है/और भाषा पर/आदमी का नहीं, किसी जाति का अधिकार है।

mochi1प्रस्तुति में भाषा पर अधिकार के जाति बोध पर करारे व्यंग्य के साथ कविता आगे बढ़ती है। ‘पेट की आग के डर’ से अन्याय पर चोट करता है ये मोची। और ये बताता है कि ‘इन्कार से भरी हुई एक चीख़’/और ‘एक समझदार चुप’/दोनों का मतलब एक है/भविष्य गढ़ने में, ‘चुप’ और ‘चीख’/अपनी-अपनी जगह एक ही किस्म से/अपना-अपना फ़र्ज अदा करते हैं।

कविता के अंत में शिरीष खरे के हाथ जुड़ते हैं तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई देती है। शिरीष खरे ने करीब 10 साल पहले इस कविता की प्रस्तुति दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के ब्रह्मपुत्र हॉस्टल में की थी। मंच सज्जा बदली लेकिन प्रस्तुति के कथ्य में वही प्रभाव नज़र आया। मंच पर चंद कुर्सियां, उसमें टंगे जूते और एक रस्से से लटकते जूते-चप्पल, बस इतना ही था। उसके बाद शिरीष खरे का अभिनय था, धूमिल की कविता का दम था और दर्शकों के हिलोरें लेते भाव थे।सवाल करती ‘चीख’ भी ‘चुप्पी’ समेटे थी।


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