धीरेंद्र पुंडीर

ravish -1“आप मेरी नहीं अपनी चिंता करे क्योंकि अब बारी आपकी है। आप सरकारों का हिसाब कीजिए कि आपके राज में बोलने कि कितनी आज़ादी है और प्रेस ‘भांड’ जैसा क्यों हो गया? यह मजाक का मसला नहीं है। मैं जानना चाहता हूं कि समाज का पक्ष क्या है, मैं आम लोगो से जानना चाह रहा हूं कि इसके पक्ष में बोलेंगे या नहीं, आप मीडिया के आज़ाद स्पेस के लिए बोलेंगे कि नहीं, आप किसी पत्रकार के लिए आगे आएंगे कि नहीं, अगर नहीं तो मैं युवा पत्रकारों से अपील करता हूं कि इस समाज के लिए आवाज उठाना बंद कर दे। यह समाज उस भीड़ में मिल गया है, यह किसी भी दिन आपकी बदनामी से लेकर हत्या में शामिल हो सकता है। पत्रकारों ने हर क़ीमत पर समाज के लिए लड़ाई लड़ी है, बहुत कमियां रही है और बहुतों ने अपनी क़ीमत वसूली है, लेकिन मैं देखना चाहता हूं कि समाज आगे आता है कि नहीं।” ये कथन है वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार का।

रवीश, हिंदी टीवी पत्रकारिता के स्टार है। पत्रकारिता की लंबी ज़िंदगी से स्टारडम हासिल किया है। लाखों लोग उनके फैन हैं। इसका सबूत है कि बहुत से लोगों ने उनके खत को शेयर किया। उस पर लिखा। चिंता जताई। चिंता अपनी जगह है और विचार अपनी जगह। सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत गालियों से आहत रवीश कुमार ने सोशल मीडिया से पलायन कर लिया। लेकिन पत्रकारिता में आगमन के समय की ख़ामोशी के साथ नहीं, बाकायदा गा-बजाकर। रवीश कुमार अच्छे पत्रकार हो सकते हैं, लेकिन ग़ुस्सा कुछ ज़्यादा आ गया। आज पत्रकारिता की हालत क्या है, उनके एक लेक्चर में सुन चुका हूं। अपने खत में वो युवा पत्रकारों से समाज की आवाज़ उठाना बंद करने की बात करते हैं। ये थोड़ी ज्यादती है। और अगली लाइन में वो समाज सुधारक और पत्रकार के बीच की विभाजक रेखा को बिलकुल मिटा देते हैं।
Ravish-Kumar-NDTV-1पत्रकार अपनी नौकरी करता है। इसके लिए वो बाकायदा तनख्वाह लेता है। कोई भी समाज पत्रकारों की क्रांति पर निर्भर नहीं होता। हजारों साल की सिविलाइजेशन में टीवी को आए हुए दो दशक भी नहीं हुए हैं। और अखबार को भी दो सौ ही साल हुए हैं। उससे पहले समाज अपने से चलता रहा, रास्ता देखता रहा और मौजूदा समय तक यानि आपके समय तक आया है। हर समाज को अपने संवाद की व्यवस्था करना आता है। पहले कवि और जब कवि भांड बन गए तब भाट और जब भाटों ने राजाओं को ही सर्वस्व बताना शुरू किया तो फिर लोकगीतों में जनता की आवाज मुखरित हुई। फिर अखबार आया तो जनता के लिए ये भी एक संवाद की चीज़ थी। बड़े अखबारो को चुनौती देते हुए कुछ एक पेजी अखबार भी निकले। नब्बे के दशक में ‘बुद्धू बक्सा’ स्मार्ट हुआ और आप जैसे ‘स्मार्ट लोग’ आम जनता के संवाद का जरिया बने।
क्या टीवी ही तय करेगा कि क्या सही है और क्या ग़लत? क्या आप जैसे पढ़े-लिखे लोग सूरज को सूरज कहेंगे तभी लोगों को रोशनी दिखेगी? आपने एनडीटीवी को न छोड़ना भी, अपनी प्रतिबद्धता में गिनवाया है। जिन लोगों ने एक टीवी चैनल छोड़कर दूसरा टीवी चैनल ज्वाइन किया, क्या वो आपसे कम प्रतिबद्ध हैं?
सोशल मीडिया एक ऐसा मंच बना है जिस पर देश ने एक्शन और रिएक्शन लेना शुरू किया है। लेकिन ये एक्शन और रिएक्शन लिखकर लिया जा रहा है। हो सकता है कि ये प्रोपेगंडा ज़्यादा हो लेकिन देश में बहुत सारी चीज़ें इसी पर चल रही हैं। पत्रकारिता के नाम पर देश भर में चल रही धींगामस्ती की पोल खोलने के लिए भी यही सोशल मीडिया कारगर साबित हुआ है। किसी भी पत्रकार के पास ऐसी एक दो दस नहीं सैकड़ों कहानियां होंगी, जो उसने अपने पत्रकारिता करियर के दौरान देखीं होंगी, जिन्हें चुपचाप दफना दिया गया। हाथ में कागज-पत्तर लेकर मीडिया के दरवाजे पर निराश खड़े लोगों को बहुत बार देखा है, मैने रवीश जी। लेकिन उस वक़्त सोशल मीडिया नहीं था, लिहाजा वो ग़रीब अपने कागजों के साथ ही वक़्त की रेत में दफन हो गए।
बहुत ज़्यादा पीछे जाने की ज़रूरत नहीं है मैं सिर्फ एक ही उदाहरण दे कर इस बात को साफ कर सकता हूं। निठारी कांड। दिनों, हफ़्तों नहीं महीनों तक निठारी के ग़रीब लोग अपने गायब बच्चों की फोटो, कुछ अखबारों में छपी कतरनों के साथ हर मीडिया चैनल के दरवाजें गुहार लगाने गए। लेकिन किसी को उनमें ख़बर नज़र नहीं आई। ये अलग बात है कि जैसे ही ये ख़बर निकली तो फिर हर कोई उनमें ‘रब’ देखने लगा था। ऐसी सैकड़ों घटनाएं आप आसानी से लिख सकते हैं।
ravish-2आज़ादी के दशकों बाद देश ने संवाद करना शुरू किया। एक दूसरे से संवाद करता हुआ समाज आपको आसानी से दिख जाता है, सोशल मीडिया पर। सवा अरब की आबादी के देश में एक छोटी सी धारा भी काफी बड़ी साबित होती है। देश की आबादी का 90 फ़ीसदी हिस्सा अभी इतना परिपक्व नहीं हुआ कि उसकी शिक्षा और रहन-सहन का स्तर आपके स्तर का हो जाए। इतिहास के साथ खिलवाड़, नौकरशाही की बर्बर चालाकियां और कबीले के नेताओं का सत्ता में काबिज होना, ये सब अलग-अलग हिस्सों में अलग तरह से मुखरित हुआ क्योंकि देश में एक दूसरे से संवाद करने का माध्यम मौजूद ही नहीं था। लिहाजा कई दिनों बाद एक छोटी सी ख़बर का इंतज़ार करते हुए लोग अपने सामने दिख रहे भदेस को ज़मीनी सच और आप जैसे पत्रकारों को एक मात्र सच मानकर स्वीकार कर रहे थे। क्या हम लोग इस बात से पल्ला झाड़ सकते हैं कि समाजवाद की आ़ड़ में हमने क्रिमिनल्स को नेताओं के रूप में स्वीकार किया? क्या बदलाव की राजनीति के नाम पर सामने आए लोगों के परिवारवाद या दूसरे आरोपो को मीडिया ने पूरा दिखाया? क्या उन पत्रकारों को आप कुछ कह पाए, जो जेपी के चेलों को जातिवादी नेता नहीं बल्कि पिछड़ों की आवाज़ बताने में लगे रहे। परिवारवाद, जातिवाद, और लूट को कानून बना देने वाले इऩ लोगो के महिमामंडन करने वालों को आप कभी कठघरे में खड़ा कर पाए?
मेरा उद्देश्य आपको कठघरे में खड़ा करना नहीं है लेकिन सोशल मीडिया को पूरे तौर पर एकपक्षीय घोषित करना शायद ठीक नहीं है। आपको इसी सोशल मीडिया ने इज्ज़त बख़्शी है। आपकी कई स्टोरीज को मैंने सैकड़ों के लाइक्स पाते देखा, शेयर होते देखा। अगर आपको सोशल मीडिया पर एक ख़ास ग्रुप ने निशाना बनाया है, तो जनाब ये एक ख़ास राजनीति है। आप पत्रकार होने के नाते इसको इग्नोर कर सकते हैं, जवाब दे सकते हैं और सबसे ऊपर अपनी लाइऩ पर डटे रह सकते हैं लेकिन संवाद के एक पूरे माध्यम को देश की नज़र में जलील नहीं साबित कर सकते। कोई पत्रकार या पत्रकारिता समाज से बड़ी नहीं होती है रवीश जी।

बहसें फ़िजूल थीं, यह खुला हाल देर में
अफ़सोस उम्र कट गई लफ़्ज़ों के फेर में
है मुल्क इधर तो कहत जहद, उस तरफ यह वाज़
कुश्ते वह खा के पेट भरे पांच सेर में
हैं गश में शेख देख के हुस्ने-मिस-फिरंग
बच भी गये तो होश उन्हें आएगा देर में
छूटा अगर मैं गर्दिशे तस्बीह से तो क्या
अब पड़ गया हूँ आपकी बातों के फेर में।

dhirendra pundhir


धीरेंद्र पुंडीर। दिल से कवि, पेशे से पत्रकार। टीवी की पत्रकारिता के बीच अख़बारी पत्रकारिता का संयम और धीरज ही धीरेंद्र पुंढीर की अपनी विशिष्ट पहचान है। 


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