प्रवीण कुमार दूबे के फेसबुक वॉल से साभार

हज़ारों हाथ ऊपरवाले के सामने दुआ के लिए उठे तो दुआ कैसे क़बूल नहीं होती। मेरी पत्नी और उनके भाई दोनों की हालत में क्रमश: सुधार हो रहा है। अभी कुछ दिन हॉस्पिटल में और रहना होगा लेकिन दोनों कुछ देर उठकर बैठने लगे। मेरी पत्नी ने जो कदम अपने भाई के लिए उठाए वैसा बहुत कम लोग ही सोच पाते हैं। लोग राखी का त्यौहार मनाते हैं मगर मेरी पत्नी जाह्नवी तो राखी को जी गई। हैपेटाइटिस की बीमारी में उनके छोटे भाई का लिवर पूरी तरह ख़राब हो गया।बीते शनिवार जब जबलपुर हॉस्पिटल ने हाथ पूरी तरह खड़े कर दिए कि 90 फीसदी उम्मीद ख़त्म तो परिवार के बाकी लोगों ने रोना शुरू कर दिया लेकिन जाह्नवी ने उस बचे हुए 10 फीसदी के विकल्प पर फोकस किया। ये 10 फीसदी जटिल और बेहद कठिन था लेकिन असंभव नहीं, वो था, एयर एम्बुलेंस के ज़रिए कुछ घंटों में गुड़गांव के मेदांता ले जाना और उतनी ही स्पीड से लिवर ट्रांसप्लांट करना। उसने एयर एम्बुलेंस बुक करने को कहा और खुद लिवर डोनेट का निर्णय लिया। कुछ घंटो में ही वो उसे लेकर मेदांता पहुँची और अपना लीवर देकर भाई को यमराज के पंजों से छुड़ा लाई।

भोपाल से बाय रोड जबलपुर जाना, जबलपुर एयर एम्बुलेंस बुलाना और मेदांता पहुंच कर 24 घंटे के अंदर ट्रांसप्लांट भी करा लेना, वाकई बहुत जीवट का काम था। एम्बुलेंस में अटेंडेंट ज्यादा जा नहीं सकते थे और रूटीन की फ्लाइट भी मुझे नहीं मिली। मैं बेटे के साथ ट्रेन से जब दिल्ली पहुंचा तो ये ओटी में जा चुकी थी। लगभग 14 घंटे के जटिल ऑपरेशन की परमिशन भी डॉक्टर ने मुझसे फोन पर ली और ये बताया भी कुछ भी हो सकता है। डोनर, रिसीवर दोनों की जान को ख़तरा हो सकता है लेकिन मैं जानता था कि पवित्र उद्देश्य में ईश्वर सदैव सहायक होते हैं, लिहाज़ा मैं चिंतित तो था लेकिन भयभीत नहीं। तुम वाकई क़माल हो बेटू, शुद्ध अंत:करण वाली निस्वार्थ और चरम तक ईमानदार। रिश्तों और अपने पेशे दोनों के प्रति। मुझे याद पड़ता है कि बेहद समृद्ध आर्थिक पृष्ठभूमि में पली बढ़ी लेकिन मेरे साथ कितने अर्थाभाव को मुस्कुराहट के साथ झेल गई। कभी मेरे ईमान को भी डगमगाने नहीं दिया।

यूं तो मैं भी सीधी रीढ़ की हड्डी वाला व्यक्ति हूं लेकिन तुमने भी मुझे लगातार प्रेरित किया कि अभाव झेले जा सकते हैं लेकिन कभी किसी से गैर वाज़िब मदद के लिए न हाथ फैलाना और न ही ऐसी किसी पेशकश को क़बूल करना। सरकार से मांगने पर संभवतः एयर एम्बुलेंस मिल सकती थी या कोई आर्थिक सहायता हो सकती थी लेकिन उसने ऐसे किसी प्रस्ताव पर सोचना तो दूर बल्कि लोगों को सूचना तक देने से मना किया। ये ठीक है कि मुझे बेहतर संस्कार परिवार से मिले लेकिन उसे लगातार तराशा तुमने। तुम्हारी बहादुरी, समर्पण और जीवट को सलाम है। चरम तक प्यार तो मैं यूं भी तुम्हें करता था लेकिन अब तुम्हारा स्थान मेरे मन में आदर के सर्वोच्च दर्जे पर रहेगा। ऐसे दौर में जब कुछ लोग सगे भाई को एक पैकेट दूध देने में नाक भौं सिकोड़ते हों, ऐसे में अपने शरीर का अंग काटकर देना, तुम्हारी तरह कोई विरला ही कर सकता है। ईश्वर के प्रसाद के तौर पर तुम मेरे जीवन में आई हो। दीर्घायु रहो, ऐसे ही समर्पण के साथ अपने हर टास्क को पूरा करने का हौसला तुम्हें प्रभु से मिलता रहे। जल्दी पूरी तरह से स्वस्थ्य होकर आओ घर। मेरे ध्यान की दुनिया की समंदर सी शहज़ादी ।

ला व्यक्ति हूं लेकिन तुमने भी मुझे लगातार प्रेरित किया कि अभाव झेले जा सकते हैं लेकिन कभी किसी से गैर वाज़िब मदद के लिए न हाथ फैलाना और न ही ऐसी किसी पेशकश को क़बूल करना। सरकार से मांगने पर संभवतः एयर एम्बुलेंस मिल सकती थी या कोई आर्थिक सहायता हो सकती थी लेकिन उसने ऐसे किसी प्रस्ताव पर सोचना तो दूर बल्कि लोगों को सूचना तक देने से मना किया। ये ठीक है कि मुझे बेहतर संस्कार परिवार से मिले लेकिन उसे लगातार तराशा तुमने। तुम्हारी बहादुरी, समर्पण और जीवट को सलाम है। चरम तक प्यार तो मैं यूं भी तुम्हें करता था लेकिन अब तुम्हारा स्थान मेरे मन में आदर के सर्वोच्च दर्जे पर रहेगा। ऐसे दौर में जब कुछ लोग सगे भाई को एक पैकेट दूध देने में नाक भौं सिकोड़ते हों, ऐसे में अपने शरीर का अंग काटकर देना, तुम्हारी तरह कोई विरला ही कर सकता है। ईश्वर के प्रसाद के तौर पर तुम मेरे जीवन में आई हो। दीर्घायु रहो, ऐसे ही समर्पण के साथ अपने हर टास्क को पूरा करने का हौसला तुम्हें प्रभु से मिलता रहे। जल्दी पूरी तरह से स्वस्थ्य होकर आओ घर। मेरे ध्यान की दुनिया की समंदर सी शहज़ादी ।