उर्मिलेश / पहले पनगढ़िया साहब ने साथ छोड़ा। फिर अरविंद सुब्रह्मण्यम गये! रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने भी साथ छोड़ा! और तो और भल्ला साहब भी चले गये! अब देखिए, देश के तीन प्रमुख राज्य छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश ने भी धक्का दे दिया! जनाब, वक्त का कोई ठिकाना नहीं! पता नहीं कब कैसी करवट ले! यकीन मानिए, लोकतंत्र में कोई एक नेता महाबली नहीं हो सकता। इसमें जनता सर्वोपरि होती है! किसी भी दल या नेता को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि वह जनता को लंबे समय तक बेवकूफ बना सकता है!अहंकार, प्रतिशोध और नफ़रत के रास्ते कोई नेता या दल लोकप्रिय नहीं हो सकता!

पुष्यमित्र
वोटर बहुत स्मार्ट होते हैं। उसने दंभी भाजपा वालों को हराया तो मगर निक्कमे और चाटुकार कांग्रेसियों को भी एमपी और राजस्थान दोनों जगह फंसा कर रखा है। लोग समझ गए हैं, बहुमत मतलब अहंकार। उन्हें मजबूत सरकार नहीं, मजबूर सरकार पसंद है। जो हर फैसले के पहले दूसरे लोगों से भी विमर्श करे। मनमानी करते हुए कभी नोटबन्दी तो कभी जीएसटी जैसे फैसले न ले। उम्मीद है कि इस फैसले से मोदी सरकार ने भी अपने नथुने में लगाम की रस्सी का बल महसूस किया होगा।एक और बात- पिछले 4-5 साल के राजनीतिक घटनाक्रम में सीखने की एक जरूरी बात है। वह यह कि किसी नेता की अंधभक्ति या उसका मुग्ध प्रशंसक बन जाना ही लोकतंत्र के लिये सबसे अधिक घातक होता है। इससे बचना चाहिये। कल से कई मित्र राहुल गांधी के बयान पर लहालोट हो रहे हैं, मगर उनलोगों ने गौर नहीं किया कि बयान से ठीक पहले सुरजेवाला ने उन्हें कांग्रेस का त्राता कहा और राहुल ने इस बात का कतई विरोध नहीं किया। कल के बयान का एक ही अर्थ है कि राहुल की टीम को पता है, अपने कोर वोटरों को कैसे खुश करना है। बाकी इस चुनाव में कांग्रेस किस तरह भाजपा होने की कगार पर पहुंच गई यह किसी से छुपा नहीं है। कल के नतीजे, भाजपा के दम्भ को पराजित करने का श्रेय राहुल का तो कतई नहीं है। अगर किसी का है तो यह किसानों और नौजवानों के है और मोदी के जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लम्बे समय से मुखर उन सोशल मीडिया वालों का है, जिन्होंने हर झूठ को समय पर उजागर किया और हर गलत फैसले का मजबूती से विरोध किया। वोट की फसल भले कांग्रेस ने काटी हो, विपक्ष की असल भूमिका इन्हीं फेसबुकियों ने निभाई है।