यह दुनिया माया है

यह दुनिया माया है

पुष्य मित्र

जब तक भारत गांवों का, किसानों का देश था, तब तक दीपावली पर हर घर में लक्ष्मी आती थी। अगहन में जब धान के बोझे खलिहान में उतरते थे तो उससे निकलने वाले अनाज के दाने सिर्फ किसानों की कोठियां नहीं भरते थे वे गांव के हर दस्तकार कामगार के घर पहुँचते थे। चाहे वह पुरोहित हो या नाई, मल्लाह हो या कुम्हार।

मगर अब वक़्त बदल चुका है। अब दीपावली पर भले पूरा देश रोशनी की लडियां सजा कर लक्ष्मी का आह्वान करे, लक्ष्मी अंबानी, अडानी जैसे चंद घरों तक ही पहुँचती है। देश की 73 फीसदी सम्पत्ति पर सिर्फ 1 फीसदी लोगों का कब्जा है। जब से PMC बैंक का डूबना सामने आया है, तब से आम हिन्दुस्तानी पैसे को मोह माया ही समझने लगा है। जबकि पूंजीपति जानते हैं कि बैंकों में जमा हमारी मेहनत की कमाई भी उनकी ही है। वे जब चाहें उसे कर्ज के रूप में हासिल कर सकते हैं और डिफाल्टर बन कर हड़प सकते हैं। सिर्फ बैंकों का ही नहीं, शेयर बाज़ार, इनश्योरेन्स सेक्टर, प्रोवीडेंट फंड तक का पैसा उनकी पहुँच में आ गया है।

हां, दीपावली एक रस्म है। पैसे खर्च कर लक्ष्मी के आह्वान की परम्परा को निभाना है और कुछ पटाखे फोड़ कर खुश हो जाना है कि हम एक हिन्दू के तौर पर ताकतवर हो रहे हैं। दार्शनिकों ने ठीक ही कहा है, यह दुनिया माया है। इसी माया में हमें मस्त रहना है। लक्ष्मी भले हमारे घर का रास्ता भूल जाये हमें बुलाने की रस्म निभाते रहना है। लोग कहे मंदी है तो उन्हे बता देना है कि देश में कितने मर्सिडीज और fortuner बिक रहे हैं।


पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। प्रभात खबर की संपादकीय टीम से इस्तीफा देकर इन दिनों बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता  करने में मशगुल ।

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