मुझे दुलराता है, मेरे गांव का स्टेशन

शंभु झा

sambhuji stationमेरा गांव रेलवे लाइन के किनारे है। गांव की ज़मीन पर ही रेलवे स्टेशन बसा है। स्टेशन बसा है, जैसे घर बसता है। स्टेशन हमेशा मुझे घर जैसा लगता है। गांव के स्टेशन पर पहुंचो तो लगता है घर पहुंच गए। एक तसल्ली रहती है कभी मेरा घर खो भी गया तब भी स्टेशन नहीं खोएगा। जिस आदमी का स्टेशन गुम हो जाता है, वो पूरी ज़िंदगी सफ़र करता रहता है, लेकिन कहीं नहीं पहुंचता।

मेरा स्टेशन देहाती है। पानी हैंडपंप का है। बेंच पत्थर की है। शेड एसबेस्टस और टिन का है। चाय औंटे हुए सोंधे-सोंधे दूध की है। गिलास कांच का है। चाय दुकानवाला बाबा सत्तर का है। चाय वाले बाबा का बेटा इसी स्टेशन पर ट्रेन में बैठकर दिल्ली चला गया। लेकिन बाप को स्टेशन ने ही रोक लिया। बेटे से ज़्यादा प्यार करता है यह स्टेशन।

दिल्ली वाला बेटा री-फिल की तरह होता है। पिता को तीन वक़्त का खाना, दो वक़्त की चाय और दवा ख़रीद कर देने के बाद, दिल्ली वाले बेटे की ज़िम्मेदारी ख़त्म हो जाती है। स्टेशन इस बूढ़े को रोटी, कपड़ा और ‘किक’ देता है। ‘किक’ यानी जीने का मकसद। ट्रेनों की सीटी और एनाउंसमेंट के शोर के बीच जब दस मुसाफिर एक साथ चाय मांगते हैं तो मिलती है असली किक—जिसके दम पर सत्तर की उमर में दस घंटे काम करता है यह बाबा।

यह स्टेशन बाबा के दादा से भी पहले का है। इतिहास की खुरचन समेटते हुए खूब लंबे प्लेटफार्म पर छोटा सा शेड है। बारिश होती है तो सब मुसाफिर—अप वाले और डाउन वाले- पैसेंजर वाले और एक्सप्रेस वाले—मुंबई जाने वाले और बेगूसराय वाले—सबके सब शेड के नीचे एकजुट हो जाते हैं। बारिश ख़त्म हो जाती है तो सबको अपनी अपनी पहचान याद आ जाती है। लोग बीजेपी और जेडीयू हो जाते हैं। मुसाफिर पूछते हैं कि ट्रेन कब आएगी, लेकिन यह कोई नहीं पूछता कि ट्रेन कितने नंबर प्लेटफॉर्म पर आएगी क्योंकि प्लेटफॉर्म एक ही है।

चना ज़ोर गरम वाला, घुघनी वाला, चिनिया बदाम वाला… लाई वाला… और कटे हुए नारियल वाला, सब रंगमंच के पात्रों की तरह उसी एक प्लेटफॉर्म पर आवाज़ लगाते हुए घूमते रहते हैं। मुसाफिरों के पास स्मार्ट फोन आ गया है लेकिन अभी उन्हें कैंडी क्रश और व्हाट्स ऐप के जोक्स की आदत नहीं पड़ी है। वे प्लेटफॉर्म पर बैठकर मोबाइल में घुसते नहीं हैं, आपस में बातें कर लेते हैं।

कहने को बहुत कुछ है। सवा सौ साल पुराने स्टेशन की बात सवा पन्ने में समेटना मुमकिन नहीं हैं। लेकिन एक बात ज़रूर कहूंगा। अगर आप महिला यात्री हैं तो मेरे स्टेशन पर ज़्यादा सुरक्षित हैं क्योंकि बेटा खानदान का होता है, बेटी गांव की होती है। जब तक मोहिउद्दीन नगर स्टेशन गांव में है, यहां किसी बेटी को हेल्पलाइन की ज़रूरत नहीं है।

sambhuji profile

शंभु झा। महानगरीय पत्रकारिता में डेढ़ दशक भर का वक़्त गुजारने के बाद भी शंभु झा का मन गांव की छांव में सुकून पाता है। फिलहाल इंडिया टीवी में वरिष्ठ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत।


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