धीरेंद्र पुंडीर

इस देश में अगस्त के महीने से पहले ही पूरे देश में तैयारी शुरू हो जाती है क्योंकि इसी महीने में देश का सबसे बड़े त्यौहार यानि स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को आता है। कई त्यौहार भी आते है। लेकिन लोगों को सिर्फ 15 अगस्त का इंतजार रहता है। लेकिन पहली बार देश को उसके प्यारे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी के दोहते ने बताया कि अगस्त का महीना बच्चों की मौत का महीना होता है। ये बात नईं पता चली है। सिद्धार्थनाथ सिंह नाना से भी नहीं सीखें कि अगस्त का महीना बच्चों की मौत का नहीं इस देश की आजादी का होता है। मौत का नाम तुमने दिया। वो अस्पताल में आएँ थे सांस रोकने की प्रैक्टिस करने किसी बाबा के आश्रम नहीं।

बेशर्म सरकार के दो मंत्रियों को बैठे हुए देख रहा था और सोच रहा था कि परिवारवाद के विरोध पर रात दिन गाल बजाने वाली पार्टी के दोनों मंत्री नेताओं के परिवार के ही कुल दीपक है। सिद्धार्थनाथ सिंह के साथ जुगलबंदी में थे लालजी टंडन के बेटे आशुतोष टंडन। हैरानी की बात है कि दोनों सफाई ऐसे दे रहे थे कि जैसे बच्चों ने इस महीने में मरने की विशेष तैयारी की हुई थी और वो इसलिए भी मरना चाहते थे कि ये अगस्त है और इस महीने में बच्चे मरते है। काशी में मरना सुने थे सिद्धार्थनाथ सिंह ये अगस्त में मरने का गणित कहां से निकाला है।
मैं सोच रहा था कि दो घंटे ऑक्सीजन नहीं था ये बात इतने प्यार और सम्मान और मुस्कुराहट से साथ बता रहे थे सिद्धार्थनाथ सिंह की लगता था जैसे कोई प्रेम कहानी बता रहे हो। बेशर्मी की चमक के साथ चमकते हुए सिद्धार्थनाश सिंह से किसी बौंने ने ये सवाल ही नहीं किया कि महान नजूमी क्या ये बता सकते हो कितनी देर तक एक बच्चा बिना ऑक्सीजन के जिंदा रह सकता है। और अगर ये बात वो खुद अपनी नाक मुंह बंद कर के वहां दिखा देते तो शायद देश को पता भी चलता।
बहुत दिन पहले रूचिका गिरोत्रा केस में कानून की हंसी उड़ाती हुई अभियुक्त और पूर्व डीजीपी राठौड़ की विषैली हंसी ने डरा दिया था और आज जिस तरह से हंसी के साथ वो प्रेस कांफ्रैंस की जा रही थी वो भी किसी भी विलेन की स्वाभाविक एक्टिंग को पानी पिला सकती थी। बता रहे थे कि मैन्युअली ऑक्सीजन कुछ देर तक दी गई अरे भाई कितनी देर। कौन दे रहा था डॉक्टर दे रहे थे या फिर पार्टी के कार्यकर्ता।
ये उन पार्टी के कार्यकर्ताओं के मुंह पर ये नेता आज तमाचा मार रहे थे जिन्होंने रात दिन मेहनत कर इस पार्टी को सत्ता में लाने के ख्वाब को पूरा किया था। लिखने को तो आज कितना भी दर्द लिखा जा सकता है लेकिन लगता है कि आज की रात सिर्फ उन बच्चों को याद करने की रात है जिनके परिवार वाले पानी बिन मछली की तरह से अपनों की याद में तड़प रहे होंगे। और ये तड़पन और बढ़ती जा रही होगी जब फाईंलों में गुलाबी लिखने वाले नौकरशाह आंकड़े पर आंकड़े फेक रहे है जनता के बीच।  बाबा योगी राज आप आंकड़े तो दे रहे हो लेकिन उस जिलाधिकारी का क्या कर रहे जिसके दफ्तर तक ये बात बताई जा चुकी थी। उस अधिकारी का क्या कर रहे हो जिसको इसकी खबर थी। क्या ये लोग सिर्फ लापरवाही के अधिकारी हैं?


dhirendra pundhirधीरेंद्र पुंडीर। दिल से कवि, पेशे से पत्रकार। टीवी की पत्रकारिता के बीच अख़बारी पत्रकारिता का संयम और धीरज ही धीरेंद्र पुंढीर की अपनी विशिष्ट पहचान है। 

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