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अनीश कुमार सिंह

केरवा के पात पर उगेलन सूरूज मल झांके-झुंके… ये गाना घर-घर में बज रहा था लेकिन घर में उदासी छाई थी। मां खरना पर अकेली बैठी थी, तभी दरवाजे पर कोई खटखटाता है। खरना से उठकर मां दरवाजा खोलती है और अगले ही पल उसकी आंखें छलक उठती हैं। दरवाजे पर दीपक खड़ा था, हाथ में छोटा बैग लिए। रास्ते भर की थकान एक पल में फुर्र हो गई जब दीपक ने अपनी मां को देखा। दीपक दिल्ली से आया था अपने गांव। ट्रेन में रिजर्वेशन तो मिला नहीं, बस जैसे-तैसे ट्रेन से घर आ गया था। अब तो घर में जैसे रौनक आ गई। घर में चहल-पहल सुनकर पड़ोस की चाची और फुआ भी आ गईं। दीपक को देखते ही इतनी खुश हुईं जैसे उनका अपना बेटा असम से घर आया हो, छठ में। बेचारी चाची दीपक में अपना बेटा ढूंढ रही थीं।

वैसे दीपक भी घर कहां आने वाला था। मां ने फोन कर छठ में बुलाया था। लेकिन दीपक को इस बार भी छठ में छुट्टी नहीं मिलने वाली थी। घर में एक बूढ़ी औरत और छठ जैसा बड़ा त्योहार। घर में हाथ तक बंटाने वाला कोई नहीं था। एक काम करने चलती तो सौ काम पीछे पड़े रहते। एक अकेली जान आखिर करती भी तो क्या? हर बार कोसी रखती थी लेकिन इस बार कोसी नहीं रखने का फैसला किया था। क्योंकि एक अकेली जान से इतना कुछ होने वाला भी तो नहीं था। आखिर छठ के घाट पर कोसी और ईख कौन ले जाता? लेकिन दीपक के अचानक आ जाने से सूखे चमन में जैसे बहार आ गई थी। मंद मंद बजने वाले टेप रिकॉर्डर की आवाज अचानक तेज हो गई थी।

chhat3हम तोहसे पूछी बरतिया, ई बरतिया से केकरा लागी… ए करिले छठ बरतिया से बेटवा लागी।।

एक पल में ऐसा लगा मानो दीपक के आने की खुशी में सारा घर जैसे चहचहा उठा हो। अब तो घर के बरामदे में चाचा-चाची, फुआ और आस-पड़ोस के लोग भी जुट गए थे। ‘… अभी अइलह का बबुआट्रेन लेट हो गईल रहे का…? अरे बहुत भीड़भाड़ चल रहल बा ट्रेन में…हमरो पोता दिल्ली से आवे के रहलन सन…बाकिर तत्काल में भी टिकट ना मिलल।  बिना जवाब के एक के बाद एक सवाल। दीपक बेचारा थका हारा मन में बस यही सोच रहा था कि काश! उसके पास एक उड़नखटोला होता। एक पल में अचानक वो खुद पर हंस पड़ा। शायद इस ख्याली पुलाव बनाने के एहसास भर से वो हंस पड़ा था। और अलान पर लटके लालटेन की मंद मंद रोशनी को निहार रहा था। गांव में बिजली आ चुकी थी लेकिन कब आती कब जाती पता नहीं चलता था। इसलिए गांव में आज भी ‘भरली सांझ’ में ओसारे पर लालटेन जलाने का रिवाज है। कुछ ही देर में बगल वाली चाची की बेटी बुचिया भी दीपक की मां का हाथ बंटाने पहुंच गई। मां ने सबके लिए खरना का प्रसाद बुचिया के हाथों भिजवाया और सबने प्रसाद खाया।

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दीपक के मन में अब भी एक बेचैनी सी थी और कुछ सवाल उमड़ रहे थे। काश! दिल्ली से पटना तक बस सेवा होती जिससे लोगों के पास घर आने का एक और रास्ता होता। चार महीना पहले से ही टिकटें बुक हो जाती हैं। अगर वेटिंग लिस्ट में आप रह गए तो चार महीने बाद भी आपका वेटिंग लिस्ट का नंबर आगे खिसकता नहीं। बहुत मारामारी है भई। प्रीमियम ट्रेनों का हाल तो पूछिए ही मत। इनकी टिकटें इतनी महंगी कि आम आदमी इसके बारे में सोच भी नहीं सकता। स्लीपर का टिकट भी सेकंड एसी के बराबर।

दीपक के मन में इस बारे में बिहार परिवहन निगम और दिल्ली परिवहन निगम को लिखित में सुझाव देने की बात चल ही रही थी कि बुचिया सामने पानी का गिलास लेकर खड़ी हो गई। सबने पानी पीया और कुछ देर की बातचीत के बाद सब अपने-अपने घर चल दिए। तब तक टेप रिकॉर्डर भी बंद हो चुका था। दीपक अपने बिस्तर पर था लेकिन घर की औरतें पूजा वाले कमरे में बैठीं छठी मईया का गीत गुनगुना रही थीं।

कोपी-कोपी बोलेली छठी मईया, सुनू हे सेवक लोग… उ हमरा घाटे, दुभिया उपजेही गइले, मकरी पसरी गइलें।।

धीरे-धीरे गाना सुनते-सुनते न जाने कब दीपक को नींद आ गई और सपने में ही दीपक अपने बचपन की यादों में खो गया। वह दऊरा लेकर अपने बड़े भाई के साथ छठ के घाट पर जा रहा है। उसके बगल में हाथ में खाली लोटा लेकर उसकी मां जा रही हैं और उसके पीछे बाकी के घरवाले नंगे पैर। जैसे-जैसे घाट नजदीक आता है वैसे वैसे लाउडस्पीकर की आवाज तेज होती जाती है। और वैसे वैसे मां के साथ चली जा रही पर्वयतीन की आवाज दबती जाती है। लेकिन सपने में भी दीपक को वो गीत साफ-साफ सुनाई दे रहे थे।

‘केरवा जो फरेला घवध से, ऊपर सुगा मंडराए…उ जे भैया जे बानू ने दीपक सिंह, दउरा घाटे पहुंचाए।।’chhat

रोजी-रोटी के चक्कर में लोग अपना गांव छोड़कर शहर में बसने लगे। धीरे-धीरे काम के बोझ तले इतने दब गए कि घर भी आना लगभग भूलते जा रहे हैं। दीपक भी उन लोगों में से एक है जो हर बार की तरह इस बार भी छठ में घर नहीं आने वाला था। इस बार उसकी अंतरात्मा ने उसे झकझोरा और फिर वो सबकुछ छोड़-छाड़कर अपने घर आ गया। जब दीपक से इस बारे में पूछा तो उसका कहना था- नौकरी तो फिर मिल जाएगी भाई, लेकिन जो खुशी मैंने अपनी मां के चेहरे पर देखी है, वैसी खुशी मैं कई साल से मिस कर रहा था।

शाम हुई। सबके घर से दऊरा निकलना शुरू हुआ। हर बार दीपक की मां दूसरों से घाट तक दऊरा ले जाने की मिन्नतें करती थीं लेकिन इसबार उनकी आंखों में गजब की चमक थी और दीपक की आंखें अपनी मां की खुशी देखकर डबडबाई सी थीं। पीछे से मां की आवाज में वो खनक जिसे सुनकर दीपक के तन मन में जैसे स्फूर्ति सी आ गई।…..

‘कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए…..’


anish k singh

अनीश कुमार सिंह। छपरा से आकर दिल्ली में बस गए हैं। इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन से पत्रकारिता के गुर सीखे। प्रभात खबर और प्रथम प्रवक्ता में कई रिपोर्ट प्रकाशित। पिछले एक दशक से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सक्रिय।


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