राकेश कायस्थ

अगर लालू यादव केवल इसलिए दोषी करार दिये गये क्योंकि उनका नाता पिछड़े समाज से हैं तो फिर ए.राजा और कनिमोड़ी टू जी में कैसे छूट गये? हर चीज़ का असाधारण सरलीकरण प्लेग से भी ज्यादा संक्रमक बीमारी है। सोशल मीडिया देखकर लगता है कि पूरा देश इस बीमारी की चपेट में है। टू जी, आदर्श स्कैम और अब लालू के चारा घोटाले में जो अलग-अलग फैसले आये हैं, उनसे कुछ विचारणीय बिंदु उभरकर सामने आये हैं-

पहली बात- करप्शन के मुद्दे पर इस देश में इतनी बात हो चुकी है कि अब इसकी कोई एंटरटेनमेंट वैल्यू तक नहीं बची है। आम भारतीयों द्वारा पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा बोला जानेवाला डायलॉग था- पूरा सिस्टम बिका हुआ है। अगर सुप्रीम कोर्ट और सीएजी नहीं होते तो जाने इस देश का क्या होता।
टू जी प्रकरण में फैसले के बाद सीएजी गंभीर सवालों के घेरे में हैं और रही बात हायर ज्यूडिशियरी की तो उसका जितना अवमूल्यन तीन साल में हुआ है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब चीफ जस्टिस पर करप्शन के गंभीर इल्जाम लगे। ऐसा कभी नहीं हुआ जब खुलेआम सीनियर एडवोकेट पैर पटकते हुए कोर्ट से बाहर निकल जायें। ऐसा कभी नहीं हुआ जब कोई सीनियर एडवोकेट न्यायपालिका के स्तर और जजों के आचरण पर गंभीर सवाल उठाते हुए रिटायरमेंट की घोषणा करे।

दूसरी बात- कमियों और आलोचनाओं के बावजूद भारतीय न्यायपालिका अपना अलग वजूद बनाये रखने में अब तक कायमाब रही थी। लेकिन अब यह बहुत साफ महसूस होता है कि न्यायपालिका भी ताकतवर सत्ता तंत्र की परछाई से बाहर नहीं है। ज्यूडिशियल एक्टिज्म जैसे शब्द लगभग गायब हो गये हैं। अगर कहीं एक्टिविज्म नज़र आता है तो उसकी राजनीतिक अंर्तध्वनियां भी साफ-साफ सुनाई देती हैं। सवाल यह है कि अगर न्यायपालिका नहीं बचेगी तो आखिर इस देश में फिर क्या बचेगा?

तीसरी बात- अगर कोई फैसला पक्ष में हो तो कानून जीत और खिलाफ जाये तो जज बेईमान। बिना तथ्यों के सार्वजनिक विमर्श को इस रास्ते पर ले जाने के नतीजे भयावह होंगे। लेकिन पूरा विमर्श इसी रास्ते पर जा रहा है।
सोहराबउद्दीन एनकाउंटर मामले में निचली अदालत का फैसला अमित शाह के पक्ष में गया तो वहां न्याय की जीत हुई। जीत इतनी पक्की थी कि जांच एजेंसियों ने आगे अपील करने की ज़रूरत नहीं समझी। ऐसा ही कई दूसरे ऐसे मामलों में हुए जहां आरएसएस से जुड़े लोगो पर कानून की तलवार लटक रही थी। लेकिन टू जी में फैसला आरोपियों के पक्ष में गया तो जज साहब का इतिहास भूगोल निकाला जाने लगा और सोशल मीडिया पर संगठित ट्रोलिंग शुरू हो गई। चारा घोटाले पर फैसला आने के बाद लालू यादव के भक्तो ने भी कुछ ऐसी ट्रोलिंग शुरू कर दी।

चौथी बात- पिछड़े और कमज़ोर लोगो के प्रति सिस्टम पूर्वाग्रह रखता है। यह बात मैं लगातार महसूस करता हूं और इसपर कई बार लिख भी चुका हूं। एक ही तरह के मामले में दो अलग-अलग लोगों खिलाफ कोर्ट के अलग-अलग स्टैंड की बहुत सारी कहानियां हैं। मुझे याद है कि जब चारा घोटाले का मामला खुला था तो दिल्ली के कुछ अंग्रेजी अखबार इसे ग्वाला स्कैम लिखते थे। हवाला से ग्वाला की तुकबंदी बिठाना कूढ़मगज उपसंपादकों के लिए एक क्रियेटिव आइडिया रहा होगा लेकिन इसमें घनघोर जातीय पूर्वाग्रह और द्वेष था। लालू यादव को लेकर मीडिया और समाज का एक तबका हिकारत का भाव रखता है और यह कोई छिपी हुई बात नहीं है।

पांचीवीं बात- जिन लोगों को भी लगता है कि जगन्नाथ मिश्रा पंडितजी होने की वजह से छूटे और लालू यादव ओबीसी होने की वजह से फंसाये गये उन्हें थोड़ी मेहनत करके दोनों मुकदमों का अध्ययन करना चाहिए, फैसले पर तार्किक तरीके से सवाल उठाना चाहिए ताकि देश में विमर्श का एक गंभीर माहौल बने। मौजूदा समय पूरा लोक-विमर्श इतना छिछला है कि सच और झूठ के बीच कोई लकीर खींच पाना लगभग नामुमकिन है।


राकेश कायस्थ।  झारखंड की राजधानी रांची के मूल निवासी। दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय। खेल पत्रकारिता पर गहरी पैठ। टीवी टुडे,  बीएजी, न्यूज़ 24 समेत देश के कई मीडिया संस्थानों में काम करते हुए आपने अपनी अलग पहचान बनाई। इन दिनों स्टार स्पोर्ट्स से जुड़े हैं। ‘कोस-कोस शब्दकोश’ नाम से आपकी किताब भी चर्चा में रही।

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