डॉ चंद्रशेखर पांडे, नवनिर्वाचित ग्राम प्रधान

सत्येंद्र कुमार यादव

हरियाणा में गांव प्रधान के चुनावों में शिक्षा की शर्त लागू कर दी गई है। व्यावहारिक रूप में शिक्षा हर क्षेत्र के लिए बहुत ज़रूरी है। शिक्षित होने का मतलब ये नहीं कि पढ़ना, लिखना आना या सिर्फ दसवीं और बारहवीं पास होना। मेरे हिसाब से शिक्षित वो हैं जिनके पास डिग्री के साथ ही व्यावहारिक बातों का ज्ञान और समझ भी। जहां केंद्र और राज्यों के कंई मंत्रियों की शिक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं वहीं यूपी के ग्राम पंचायत चुनाव में चुने गए ग्राम प्रधानों की शिक्षा चर्चा का विषय।पहले प्रधानी के चुनाव में उच्च शिक्षा प्राप्त लोग शामिल होने से बचते थे। अब तो पीएचडी धारक भी मिनी संसद की बागडोर संभालने से कतरा नहीं रहे हैं। चार महिलाओं समेत 19 प्रधान ऐसे हैं, जिन्होंने डॉक्टरेट (PhD) कर रखी है। इन पीएचडी धारकर प्रधानों में एक हैं 28 साल के डॉ चंद्रशेखर पांडे।

chandrashekhar1डॉ पांडे गोंडा जिले के करनैलगंज तहसील के कटरा बाजार विकासखंड में आने वाली ग्राम पंचायत चुर्रामुर्रा के प्रधान बने हैं। बचपन में ही पिता का साया सिर से उठ गया था। बावजूद जी तोड़ मेहनत कर उच्च शिक्षा हासिल की। डॉ राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद से संबद्ध एलबीएस डिग्री कॉलेज से डॉक्टरेट की। उन्होंने आर एस पाण्डेय के निर्देशन में रक्षा अध्ययन (सैन्य विज्ञान) विषय से 2011 में शोध कार्य पूरा किया। चंद्रशेखर ने बताया कि नवीन अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा की उभरती प्रवृतियां एवं भारतीय सुरक्षा पर पीएचडी की।

ज़रा सोचिए, सैन्य विज्ञान में पीएचडी करने वाला व्यक्ति ग्रामीण राजनीति में क्यों सक्रिय हो गया? चंद्रशेखर पांडे कहते हैं- “चूंकि मैंने गांव में ही रह कर पूरी पढ़ाई की और यहां के लोगों के साथ हमेशा एक भावनात्मक रिश्ता रहा। ग्रामीणों के कहने पर ही पहली बार चुनाव लड़ा और जीता। मेरी प्राथमिकता गांव के लोगों के जीवन में बदलाव लाना है। उनकी तंगहाली को दूर करने के उपाय करना है। मैं बहराइच के किसान डिग्री कॉलेज में पढ़ाने के साथ-साथ गांव के लोगों को जागरूक करने का काम भी करता हूं और करता रहूंगा।”

churramurra gaonनवनिर्वाचित ग्राम प्रधान डॉ चंद्रशेखर पांडे ने अपने गांव का हाल बताया- “गांव के 99% घरों में शौचालय नहीं है। अधिकांश आबादी फूस की झोपड़ी में गुजर बसर कर रही है। गांव के आस-पास तीन किलोमीटर तक कोई सड़क नहीं। बारिश के दिनों में चारों तरफ दरिया दिखता है। कीचड़ भरी पगड़ंडियों और चकरोड के सहारे लोग आते-जाते हैं। शिक्षा का स्तर बहुत नीचे है। इन्हीं कमियों को पूरा करना है और इसके लिए प्रधानमंत्री तक आवाज पहुंचाऊंगा।”

पगडंडियों के सहारे शहर और कस्बों तक पहुंचता गोंडा का चुर्रामुर्रा गांव अब एक वेल क्वालिफाइड शख्स के हाथ में है। ग्रामीणों ने एक ऐसे शख्स के हाथ में गांव की कमान दी है जो बचपन से ही गांव के दुख के साथ दुखी हुआ और गांव के खुशियों को बांटकर जीया। आस-पड़ोस के चाचा, भैया, ताऊ की डांट और दुलार के बीच बड़े हुए चंद्रशेखर पांडे अपने अतीत को याद करते हुए कहते हैं- “जब मैं 6 महीने का था, तभी मेरे पिता बजरंग लाल का एक दुर्घटना में निधन हो गया। पिता पुलिस कॉन्स्टेबल थे। बालिग होने पर मुझे नौकरी मिलने वाली थी। लेकिन जब मैं बड़ा हुआ और नौकरी के लिए आवेदन दिया तो कोई सुनवाई नहीं हुई। मुझे नौकरी नहीं मिली। पिता के निधन के बाद बड़ी बहन, माता जी और बाबा ने मेरी परवरिश की, पढ़ाया लिखाया। मेरी बुआ और चचेरे बाबा रामछैल पांडे ने मेरी पढ़ाई का खर्चा उठाया। अपनों की मदद से मैंने अपनी शिक्षा पूरी की। आज मेरे परिवार में मैं, मेरी पत्नी, चार बच्चे, मेरी मां और बाबा जी हैं।IMG-20151218-WA0014

अभाव और परेशानियों में बड़े हुए डॉ चंद्रशेखर अपने गांव को डिजिटल बनाना चाहते हैं। पढ़े-लिखे लोगों को गांव से जोड़ेंगे और ग्रामीणों को कंप्यूटर की शिक्षा देने की कोशिश करेंगे। शासन की मदद से चुर्रामुर्रा गांव को देश का मॉडल गांव बनाने का सपना लिए पीएचडी धारक डॉ चंद्रशेखर अपने काम में जुट गए हैं।

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सत्येंद्र कुमार यादव, फिलहाल इंडिया टीवी में कार्यरत हैं । माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता के पूर्व छात्र। सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता से आप लोगों को हैरान करते हैं। उनसे मोबाइल- 9560206805 पर संपर्क किया जा सकता है।


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