पुष्यमित्र

शिकवा शिकायत क्या बतियाएं, वोटिंग कर दे रहे हैं। फोटो साभार- बीबीसी
शिकवा शिकायत क्या बतियाएं, वोटिंग कर दे रहे हैं। फोटो साभार- बीबीसी

“हमारे यहां के चुनावी माहौल के बारे में क्या जानना है? यह बात तो लगभग जग-जाहिर है कि हम फलां पार्टी को नहीं देंगे और चूंकि उस पार्टी को टक्कर एक ही गठबंधन दे रहा है, सो हम सबका वोट उसी गठबंधन को जायेगा। पूरा का पूरा। एक-एक वोट।”

“जी, यह तो मैं जानता हूं। और यह सिर्फ आपके कौम के बारे में ही सही नहीं है, बल्कि बिहार की कई जातियों के बारे में भी इस चुनाव में जगजाहिर हो गया है कि वे किस पाले में हैं। मैं वह जानने नहीं आया। मैं जानना चाहता हूं कि आखिर आप जिसको भी वोट देंगे, या देते आये हैं, उससे आपकी कुछ अपेक्षा तो रही होगी, आगे भी होगी। आपके इलाके के कुछ मुद्दे तो होंगे? क्या वोटर के तौर पर आपकी वो अपेक्षाएं पूरी हो रही हैं? क्या आप अपनी समस्याओं के बारे में इस बार के अपने पसंदीदा कैंडिडेट से बात करेंगे? उन पर दबाव डालेंगे कि वे आपकी इन अपेक्षाओं को पूरा करें? जो एक वोटर और एक प्रतिनिधि और प्रत्याशी के बीच संबंध की पहली शर्त है।”

चुनावी ज़मीन पर मुद्दों की पड़ताल-8

यह बात सुन कर उनके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी। एक अजीब सी मुस्कान, जिसमें एक विवशता सी थी। यह बातचीत पटना से सटे फुलवारी शरीफ के इशापुर मुहल्ले में हो रही थी। सामने दशहरे के गीत बज रहे थे और मुहर्रम के जलसे की तैयारियां हो रही थीं। वहां जो लोग बैठे थे, उनमें एक पार्टी कार्यकर्ता था, जो वार्ड काउंसलर का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा था। एक सज्जन थे, जो मुहर्रम के जलसे के अगुआ था और घूम-घूम कर चंदा इकट्ठा कर रहे थे।

बस उम्मीदों के बारे में सवाल मत करना? फोटो साभार-satyagrah.com
बस उम्मीदों के बारे में सवाल मत करना? फोटो साभार-satyagrah.com

पार्टी कार्यकर्ता जो 30 पार का होगा, इस सवाल पर कह बैठा, इस मामले में तो हम लोग भिखारी हैं। सामने वाले को पता है कि हम उसी को वोट देंगे, अगर वह जीत भी गया तो उस पर कोई दबाव नहीं है कि हमारा काम करे ही। अगर उसका विरोधी जीत गया तो यह तो तय ही हो जायेगा कि वह हमारा काम नहीं करेगा। हम उस पर दबाव भी नहीं बना पाते। जैसे यह देखिये, इस मुहल्ले में गंदी बस्ती योजना के तहत 190 मकान सालों पहले बने हैं। मगर इन मकानों में आज तक बिजली कनेक्शन नहीं मिला, लोग टोका फंसा कर बल्ब जला रहे हैं। पानी का कोई इंतजाम नहीं हुआ। हम अपने प्रतिनिधि को कहने जाते हैं, तो वे कहते हैं, हां अबकी… अबकी जरूर। इस बार वे अभी तक वोट मांगने नहीं आये हैं, देर सवेर खानापूर्ति करने ही सही, आयेंगे जरूर। तब उनको एक बार फिर सारा मुहल्ला घुमा कर दिखायेंगे कि क्या-क्या समस्या है, वे हां… हां…. कहेंगे भी। मगर काम तभी होगा जब उनका मूड होगा, हमारा कोई दबाव नहीं चलेगा।

श्याम रजक।
श्याम रजक, फुलवारी शरीफ से उम्मीदवार।

एक और सज्जन जो वहां बैठे हैं, कहते हैं, वैसे हमारे विधायक श्याम रजक अच्छे हैं। हम सबों से उनके अच्छे रिश्ते हैं। जब भी किसी पारिवारिक फंक्शन में बुलाओ, आ ही जाते हैं। हमारे सांसद रामकृपाल यादव भी अच्छे हैं। उनसे भी अब तक वैसा ही रिश्ता रहा है। पिछले साल तक मुहर्रम के जलसे के वक्त वे जरूर आते थे, और हमारे साथ दो लाठी खेलते ही खेलते थे। अब दूसरी पार्टी में चले गये हैं, हमें भी पता नहीं कि वे आयेंगे या नहीं। उनके मन में भी झिझक होगी। फिर भी हम जानते हैं, वे अच्छे व्यक्ति हैं। मगर काम करने के मामले में कोई दबाव काम नहीं करता।

“देखिये, यह सब राजनीति का मामला है।” जलसा कराने वाले सज्जन कहते हैं। “हम भी जानते हैं कि हम एक ऐसी पार्टी को चुनने जा रहे हैं जो 17-18 साल तक उसी पार्टी के साथ रही जिससे हमारा विरोध है, मगर क्या करें? हम यह भी जानते हैं कि सभी पार्टियों का एक जैसा हाल है। अंदर से कोई सेकुलर नहीं है। कहीं परदा है, तो कहीं परदा उठ गया है। हम दोनों में से एक को चुन लेते हैं, जो परदादारी निभाता है।”

“मगर काम हमारा सबसे अधिक लटकता है, यह सच्ची बात है।” पार्टी कार्यकर्ता कहते हैं। “अब देखिये, फुलवारी शरीफ के मेन रोड को। पूरे बिहार में शायद ही इतनी खराब सड़क कहीं देखने को मिले। नेशनल हाइवे का यह हाल है। तीन साल पहले बनी थी। दो बार मरम्मत भी हो चुका है। मगर इतने बड़े-बड़े गड्ढे हैं कि क्या करें? बताइये, राजधानी के पास इतनी रद्दी सड़क है, जबकि पूरे बिहार में सड़कें चमचमा रही हैं। हालांकि इसकी एक वजह यहां सीवेज लाइन का न होना है। पूरे शहर में पानी निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है। हमारे मुहल्ले में ही लोगों के घरों का गंदा पानी लोगों के खेत तक पहुंच रहा है। लोगों की खेती बरबाद होती है, वे शिकायत करते हैं। हम क्या करें?”

 तो… ? तो क्या, वोट तो उन्हीं को जायेगा, यह बात वह भी जानते हैं और हम भी। आयेंगे तो एक बार घुमा फिरा देंगे। लोगों के उलाहने सुना देंगे। वे भी मुस्कुराते हुए सुन लेंगे। मगर वो भी जानते हैं, हम भी जानते हैं, होना क्या है। पहले उन्हें उन लोगों को संभालना है, जो उनके पाले में नहीं हैं और थोड़ी कोशिश करने पर आ सकते हैं। वहां ज्यादा वादे होंगे, ज्यादा काम होगा। हम लोग चाह कर भी बारगेनिंग नहीं कर सकते। अब गलती किसकी है पता नहीं, मगर जमहूरियत का यह मौका हमने तकरीबन गंवा दिया है।

(पुष्यमित्र की ये रिपोर्ट साभार- प्रभात खबर से)

PUSHYA PROFILE-1


पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं।


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