gandhi school-2चंपारण में महात्मा गांधी ने निलहे प्लांटर्स के खिलाफ सत्याग्रह आंदोलन किया था, यह कहानी तो सबको ज्ञात है। मगर, उन्होंने सत्याग्रह ख़त्म होने के बाद छह माह रुक कर जो शिक्षा, स्वास्थ्य और साफ-सफाई का अभियान चलाया था, यह अल्पज्ञात तथ्य है। आज जब चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने वाले हैं, तब सत्याग्रह को याद करने के साथ-साथ उन समाज सुधार आंदोलनों को भी जानना, समझना और उनका असर चंपारण के गांवों में जाकर परखना एक रोचक अनुभव रहा। गांधी ने इन कामों को करने के लिए 21 स्वयंसेवकों की टीम बाहर से बुलायी थी, उनमें छह महिलाएं भी थीं। इन स्वयंसेवकों की टीम की मदद से गांधी ने चंपारण में तीन स्कूलों की स्थापना की, जिन्हें बाद में बुनियादी विद्यालय का नाम दिया गया। इन स्कूलों और इनके साथ स्थापित आश्रम को केंद्र बना कर गांधीजी की टीम ने पूरे इलाके में अपने तरीके से शिक्षा, स्वास्थ्य और साफ-सफाई का अभियान शुरू किया। अंग्रेजों की बंदिशों के बावजूद छह महीने तक गांधीजी के नेतृत्व में अभियान चलता रहा। बाद में अभियान को स्थानीय लोगों ने भी अपने तरीके से चलाने की कोशिश की। ये तीन स्कूल थे बड़हरवा लखनसेन, भितिहरवा और मधुबन के विद्यालय। इनमें मधुबन का विद्यालय ज्यादा दिनों तक चल न सका। मगर बाकी दो स्कूल आज भी संचालित हो रहे हैं। इन दो स्कूल के चलने की कथा, दो किस्तों में आपके साथ साझा करेंगे। स्कूल बड़हरवा लखनसेन के बारे में पुष्यमित्र की ये पहली किस्त।

पूर्वी चंपारण जिले के ढाका प्रखंड से महज छह किमी दूर है, बड़हरवा लखनसेन गांव। आज की तारीख में अगर आपको उस गांव तक बिना धूल-धक्कड़ खाये और बिना उछले-कूदे पहुंचना है, तो उस रास्ते को अपनाना होगा जो 11 किमी लंबा है। ठीक ही है, गांधी के गांव तक पहुंचने का रास्ता सरल और सहज होना भी नहीं चाहिये। गांव की सीमा पर बना राजकीय बुनियादी विद्यालय इस गांव का गौरव है। बच्चा-बच्चा जानता है कि इस स्कूल को गांधीजी ने स्थापित किया था। घुसते ही गांधी की विशाल मूर्ति नजर आती है और कुछ शिलालेख भी जिसमें इस स्कूल के महत्व के बारे में और स्कूल के लिए भवन दान करने वाले के बारे में जानकारी दी गयी है।

gandhi school-3कुछ साल पहले जब पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी शिव कुमार यहां आये थे तो गांव में फैली गंदगी को देख कर बिफर पड़े और उन्होंने गांव के लोगों को खूब खरी-खोटी सुनायी। डीएम महोदय की बात गांव के लोगों के दिल पर लगी। आनन-फानन में बैठक बुलायी गयी और एक कमिटी का गठन किया गया। कमिटी का काम गांव में साफ-सफाई करना तो था ही, यह पता लगाना भी था कि आखिर गांव के इस स्कूल का ऐसा क्या महत्व है कि डीएम साहब उस पर इतना ध्यान दे रहे हैं। यानी 80-90 साल के दौरान जो चार-छह पीढ़ियां गुजरीं वह पुरानी बातों को पूरी तरह भूल गयी।

कमिटी के अध्यक्ष बनाये गये कमाल हसन। कमाल हसन ने इस बैठक के बाद गांव में चल रहे इस स्कूल का इतिहास पता लगाना शुरू किया। उन्हें पता चला कि चंपारण सत्याग्रह में सफलता के बाद गांधीजी ने तय किया कि वे यहां रह कर कुछ दिन समाज सुधार का अभियान चलायेंगे। वे यहां अशिक्षा और गंदगी देख कर काफी परेशान थे। उन्होंने यहां के तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों को पत्र लिख कर सूचित किया कि वे इस इलाके में कुछ स्कूल खोलना चाहते हैं। अधिकारियों ने इस मुद्दे पर जब नील खेती कराने वाले अंग्रेजों से सलाह ली, जिनका प्रशासन पर अच्छा खासा प्रभाव था तो उन लोगों ने पहले तो साफ-साफ मना कर दिया। फिर समझाने-बुझाने पर कहा कि स्कूल उन इलाकों में खोले जा सकते हैं, जो नीलहे ब्रिटिशर्स की जमींदारी में नहीं आते।

mahatma gandhiगांधीजी ने अपने साथियों की बैठक में इस प्रस्ताव को रखा। गांधीजी ने कहा कि वे स्कूल तभी खोलेंगे जब उसकी स्थापना गांव वालों के संसाधन से हो। उनके लोग कुछ दिनों तक स्कूल का संचालन करेंगे, फिर गांव के लोगों को इस अभियान को अपने हाथ में लेना पड़ेगा। कमाल हसन बताते हैं, उस मीटिंग में गांव के एक व्यक्ति रामगुलाम लाल बख्शी भी मौजूद थे। उन्होंने कहा कि उनके गांव में उनका एक खपरैल मकान है, गांधीजी चाहें तो वहां अपना स्कूल खोल सकते हैं। उनकी बात गांधीजी को जंच गयी और 12 नवंबर 1917 को गांधी जी को हाथी पर चढ़ा कर इस गांव लाया गया। 13 को उनका स्कूल शुरू हुआ और पांच छात्रों के साथ कक्षा शुरू की गयी।

स्कूल परिसर में एक शिलापट्ट पर लिखा है कि बम्बई के इंजीनियर बबन गोखले, उनकी पत्नी अर्वेनिका बाई गोखले, गांधी के कनिष्ठ पुत्र देवदास गांधी तथा साबरमती आश्रम के छोटे लाल और सुरेंद्रजी ने लंबे समय तक इस स्कूल में शिक्षक के तौर पर अपनी सेवाएं दीं। वैसे बापू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि छह माह बाद खेड़ा सत्याग्रह शुरू होने के वक्त उन्हें अपनी टीम के साथ वापस लौटना पड़ा। इन स्कूलों को चलाने के लिए उन्हें बेहतर स्थानीय स्वयंसेवक नहीं मिले। मगर गांधीजी द्वारा खोले गये एक अन्य स्कूल भितिहरवा में एक मराठी स्वयंसेवक के 1972 तक वहां आते-जाते रहने की सूचना है।

बड़हड़वा का यह स्कूल कब-कब किन-किन लोगों ने चलाया यह तो मालूम नहीं। मगर यह जरूर कहा जाता है कि पहले डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ने चलाया फिर बिहार सरकार ने इसको अपने हाथ में ले लिया। आज भी स्कूल के परिसर में शिवगुलाम लाल बख्शी का वह खपरैल मकान है, जिसमें यह स्कूल शुरू हुआ था। इसे अब तक निशानी के तौर बचा रखा गया है।

gandhi school-1कमाल हसन कहते हैं, इस स्कूल का इतिहास पता करना इतना सहज काम नहीं था। उस दौर के ज्यादातर लोग अब जिंदा नहीं थे। जो बचे थे, उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर उनसे कहानियां सुनीं। कुछ लोगों ने इधर-उधर की जानकारियां देकर बहकाने की भी कोशिश की। कुछ लोगों ने खुद को ही नायक बता दिया। मगर जिस तरह हंस पानी मिले दूध में से सिर्फ दूध निकाल लेता है, हमने भी वही रास्ता अपनाया। जब गांव के लोगों को इस स्कूल का पूरा इतिहास पता चल गया तो फिर हमलोगों ने टोकड़ी और कुदाल उठाया और पूरे गांव को साफ करने में जुट गये। समिति का नाम रखा गया, गांधी स्मारक सह ग्राम विकास समिति। यह सब संभवतः 2002-03 की बात है। फिर 30 जनवरी को समिति ने गांधी की याद में कार्यक्रम का आयोजन कराना शुरू किया। इसमें देश के बड़े-बड़े लोगों को आमंत्रित किया जाने लगा। एक बार तो तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम भी आने को राजी हो गये थे। मगर वे किसी वजह से आ नहीं पाये, हालांकि उन्होंने इस गांव के लिए 52 सोलर लैंप भिजवा दिये। इन लैंपों की भी अजब कथा है। जब ये डीएम महोदय के पास पहुंचे तो उन्होंने कमाल हसन को बुलवा कर कहा, आप इतने लैंपों का क्या करेंगे. चाहें तो 26 लैंप मुसहरों की बस्ती के लिए दे दें, 26 अपने गांव के लिए ले जायें। तब तक गांधी का साहित्य और उनकी कहानियां पढ़ कर कमाल हसन इतने बदल चुके थे कि उन्हें डीएम का प्रस्ताव स्वीकार करने में एक मिनट नहीं लगा।

इन दिनों कमाल हसन अपने गांव के इस स्कूल के शताब्दि वर्ष के मौके पर आयोजित होने वाले समारोह की तैयारियों में जुटे हैं। वे लगातार सादे कागज पर हाथ से पत्र लिख कर लोगों को आमंत्रित कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि इस खास आयोजन में राज्यपाल महोदय खुद इस गांव आयें।

(साभार-प्रभात ख़बर)

PUSHYA PROFILE-1


पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं।


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