कोई ‘निर्भया’ न हो, किसी मां के आंखों में आंसू न हों

कीर्ति दीक्षित

24 घंटे नहीं बीते जुवेनाइल एक्ट को पास हुए कि एक और फिर खबर आई दिल्ली के कड़कड़डुमा कोर्ट में जज के सामने फायरिंग में एक सिपाही की मौत। जज भी बाल-बाल बचे। गोलियां बरसाने वाले चार लोगों में से तीन नाबालिग’। इस खबर ने ना जाने कितने ही सवालों को घेरे में ला के खड़ा कर दिया। क्या नाबालिग ‘एडल्ट अपराधी’ की श्रेणी में रखे जाएं या नहीं?

nirbhaya

सारी प्रकृति भी पिघलकर लिखने वाले कि कलम में समा जाये, फिर भी 16 दिसम्बर 2012 की उस भयावहता को लिखने में असमर्थ ही होगी। मोमबत्तियां जलीं, सियासी गलियारे नारों से गूंजे। प्रार्थनाएं हुईं लेकिन हरेक दरिंदगी के आगे हर दुआ बेबस नज़र आई। आखिर तेरह दिन बाद निर्भया अनंत में विलीन हो गयी। सब कुछ तो सामान्य हो गया लेकिन उस माँ बाप के जिंदगी के तार ही उलझ गये, जिसने अपनी बच्ची  का जीवन बदलने के लिए अपनी जड़ों को भी बेच दिया था। जीवन ऐसी भयावह सूरत लेकर आएगा, इसकी तो स्वप्न में भी कल्पना नहीं की होगी उस परिवार ने।

juveniles accused in delhi court firing
कोर्ट में पुलिसकर्मी की हत्या के जुवेनाइल आरोपी

इन तीन साल में न जाने कितनी उनींदी रातें काटी उन्होंने और आंसुओं ने तो कभी छुट्टी ही नहीं ली। एक माँ ने गाँव से निकलकर अपनी बेटी को न्याय दिलाने की ठानी, लेकिन इंसाफ़ की लड़ाई हार गयी वो बेटी। 20 दिसम्बर 2015 को क्रूरतम अपराधियों में एक बाल सुधार गृह से आजाद हो गया। अनंत से झांकती निर्भया मानो माँ से कह रही हो-

माँ मत रोना! किसके सामने रोती हो? मैं किसी के लिए सत्ता की सीढ़ी बन गयी तो किसी के लिए टीवी पर दिखने का जरिया? मेरे नाम पर आवरण डालकर बार-बार मेरे घावों को छलनी करते रहे ? सारी  कानून कि किताबें छोटी पड़ गयी मुझे न्याय दिलाने में। बार-बार लगातार लोग सहानुभूति कि कीलें गाड़ते रहे। मेरे जैसी बहुत निर्भया हैं यहाँ, ईश्वर उन्हें इंसाफ़ दे।

विडम्बना देखो माँ, जिन नामों से मुझे पुकारा गया, उसके भी मायने बदल गए। जरा सोचो! अब कोई माँ बाप अपनी बच्ची को आशीष देते हुए ये नहीं कह पाएगी ‘निर्भया’। कोई भाई अपनी बहिन को ‘दामिनी’ कहते हिचकेगा। है ना माँ? मैं गलत तो नहीं? 

माँ मेरे लिए मत रोना। हाँ लड़ना जरूर, ताकि कोई और निर्भया न बने। ताकि कोई और अपराधी बिना सख़्त सज़ा के छूट न जाये।

सुबह की नयी किरण ने ना जाने कहाँ से हिम्मत लायी उस माँ में, आखिर उसने ठान ही लिया कि अब कोई अपराधी उम्र कि आड़ में बचना नहीं चाहिए। 22 दिसम्बर 2015 को लाल गलीचों वाली राज्यसभा में निर्भया के माता पिता बैचेन आँखों से हमारे हुक्मरानों को सुन रहे थे। महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी ने कहा यह विधेयक बच्चों के विरुद्ध नहीं है, बल्कि उनकी सुरक्षा, संस्कार और संरक्षण के लिए है। इसका मकसद किशोरों को जघन्य अपराध करने से रोकना है। कानून का दुरूपयोग रोकने के लिए इस बिल में अनेक प्रावधान किये गये हैं।” वहीं तृणमूल सांसद डेरिक ओ ब्रायन ने कहा अगर 16 दिसम्बर कि घटना मेरी बेटी के साथ होती तो मैं क्या करता? क्या मैं अच्छे वकील को हायर करता और अपराधिक न्याय व्यवस्था की  मदद लेता? या फिर एक बन्दूक खरीदता और अपराधी को बस गोली मार देता।

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान निर्भया के माता पिता के भीतर न जाने कितने भाव उमड़-घुमड़ रहे होंगे। इसका अब क्या लाभ? हमारी बेटी तो न्याय के मंदिर में हारी हुई खड़ी है। तभी मन के किसी दूसरे कोने से आवाज आई होगी अगर इस कानून से एक भी बच्ची निर्भया बनने से बच जाती है तो हमारी तपस्या सफल हुई। आखिरकार इसी उधेड़बुन के बाद आवाज आई किशोर न्याय विधेयक 2015 पास किया जाता है। निर्भय की माँ ने कहा- काश! ये बिल 6 महीने पहले पास हो गया होता। कोई बात नहीं आंशिक ही सही न्याय तो हुआ।


kirti dixit profile

कीर्ति दीक्षित। उत्तरप्रदेश के हमीरपुर जिले के राठ की निवासी। इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट रहीं। पांच साल तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों में नौकरी की। वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकारिता। जीवन को कामयाब बनाने से ज़्यादा उसकी सार्थकता की संभावनाएं तलाशने में यकीन रखती हैं कीर्ति। 


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6 thoughts on “कोई ‘निर्भया’ न हो, किसी मां के आंखों में आंसू न हों

  1. हालांकि जुवेनाइल को सजा देने की प्रक्रिया के मामले में न्यायविदों में मतभिन्नता है , फिर भी निर्भया को न्याय देना हम सभी की जिम्मेदारी है |
    भविष्य के जुवेनाइल अपराधियों के लिए क़ानून का निर्माण भी प्रजातंत्र में न्याय प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है ।
    बाकि जो वयस्क अपराधी है उनकी फांसी की सजा का क्रियान्वयन जल्द हो , ये आवाज भी उठनी चाहिए ।

  2. किशोर अपराध के अनेक पक्ष हैं मनोवैज्ञानिक के साथ साथ यह सामाजिक समस्या भी है जो समाज के संस्थानों की विफलता को उजागर करतीहै। किशोर वय आंधी तूफ़ान की उम्र होती है जिसमें असीम ऊर्जा होती है ।इस ऊर्जा को सर्जनात्मकता प्रदान करने की जिम्मेदारी सामाजिक शैक्षणिक संस्थानों की होती है । इनकी विफलता के कुफल की बेनामी कहानियां के अनाम श्रोता हम कब तक बने रहेंगे।

  3. Its hopeless.. but still we should work for betterment of society.

    Parents are unable to educate about values… n this happens in country like..INDIA.. which was full of values culture humanity and respect to humanity also.

    We should be more familiar to our vedas n gita n ramayan… may b values will be rerooted or rebooted. ..

    Nice expressions Di…

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