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बांदा: लड़ने का जज़्बा हो तो ऐसा

सत्येंद्र कुमार यादव

आप समाजेसवी हैं, सच्चे दिल से समाज की सेवा में लगे हैं, सामाजिक सरोकारों को लेकर किसी से लड़ने-भिड़ने के लिए तैयार रहते हैं, तो आपको मैं सावधान करना चाहता हूं। आप कभी भी किसी झूठे-सच्चे केस में फंस सकते हैं, फंसाए जा सकते हैं। बांदा के RTI कार्यकर्ता और समाजसेवी आशीष सागर दीक्षित के साथ जो हो रहा है, उससे तो कुछ ऐसा ही डर लगने लगा है। और इस स्थिति में वो तमाम लोग जो कभी आपकी तारीफ़ करते नहीं थकते थे, वो भी किनारा कर लें, तो कोई अचरज नहीं।

एक रेप पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए आशीष सागर के संघर्ष को पिछले कुछ हफ़्तों से फेसबुक पर देखता रहा हूं। अखबारों में भी उस रेप पीड़ित को न्याय दिलाने की ख़बरें छपीं। लेकिन जिस तरह के मामले में आशीष एक पीड़ित को न्याय दिलाने की कोशिश में लगे हैं, वैसा ही आरोप अब उन पर लगा दिया गया है। आरोप लगाने वाली महिला उसी मंडली की बताई जा रही है, जिस पर जून 2015 में अपने महिला कर्मचारी से रेप का आरोप है। कहते हैं, आशीष सागर पर आरोप लगाने वाली दलित महिला की उम्र 51 साल है, तीन बच्चों की मां है। पहले केस में रेप के आरोपी, जिनके अरेस्ट वारंट पर स्टे को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है, उनकी सहयोगी बताई जा रही है। कौन सच्चा है और कौन झूठा, इसका फ़ैसला अदालतें करती हैं। सच है। लेकिन अदालतों के फ़ैसलों को आने में कितना वक़्त लगता है, ये किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में किसी के मनोबल को तोड़ना हो तो कई तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। कहीं आशीष पर लगाए गए आरोप ऐसे ही हथकंडे तो नहीं?

आरोप लगने के बाद बांदा में न्याय संवद करते आशीष सागर दीक्षित
आरोप लगने के बाद बांदा में न्याय संवाद करते आशीष सागर दीक्षित

पूरे मामले को आप ऐसे समझिए– जून 2015 एक बिन बाप की लड़की ने रेप का खुलासा किया। वो आरोपी की संस्था में काम करती थी। पीड़ित लड़की पर आरोपी ने अपने दोस्तों के साथ भी रिश्ता बनाने का दबाव डाला, घर का काम करवाया और प्रताड़ित भी किया। मामला सामने आने के बाद पीड़ित लड़की थाने पहुंची लेकिन वहां उसकी सुनवाई नहीं हुई। फिर इस मामले को लेकर RTI कार्यकर्ता आशीष सागर दीक्षित ने इंसाफ़ तक जंग का ऐलान कर दिया। जन दबाव में पुलिस ने केस तो दर्ज कर लिया लेकिन उनकी अब तक गिरफ्तारी नहीं हुई। मामले में मजिस्ट्रेट के सामने पीड़ित लड़की का बयान भी दर्ज हो चुका है।

बहरहाल, इस जंग में बड़ा ट्विस्ट तब आया जब आशीष सागर पर ऐसे ही संगीन आरोप लगा दिए गए। इस मुद्दे पर उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया तो उन्होंने बताया- मुझे क्रास केस में उलझा दिया गया है ताकि मैं पीड़ित का साथ ना दूं। इस अधेड़ महिला का मैं आठवां ‘शिकार’ हूं। क्या गरीब की मदद करना अपराध हो गया? ऐसे तो कोई किसी की मदद नहीं करेगा। मैं दुखी हूं, आज मीडिया चुप क्यों है?”

अखबरों के पन्नों में

जब आशीष सागर दीक्षित पर रेप के आरोप नहीं लगे थे उस वक्त मेरी बात, उस मामले के आरोपी से भी हुई, जहां से ये सारा विवाद शुरू हुआ। उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि आशीष सागर वसूली करते हैं। मैंने पैसे देने से मना किया तो वो मुझे रेप के मामले में फंसा रहे हैं।” लेकिन जो लोग आशीष सागर दीक्षित को लंबे अरसे से जानते हैं, उनको ऐसे आरोपों पर यकीन नहीं हो पा रहा है। जिस तरह से कई संगठन आशीष सागर दीक्षित जैसे फक्कड़ के साथ खड़े हैं, उससे ऐसे आरोप हवा हवाई ही ज़्यादा नज़र आते हैं।

इस घटना से आहत आशीष सागर दीक्षित ने अपने फेसबुक पर लिखा- ‘ बुझते हुए दीयों को इतना हौसला देना समाज , धरा से खत्म हो अन्याय का रावण राज, अगर हम अपराधी हैं तो सज़ा मिले माकूल, जो असली दुराचारी हैं करे पीड़िता को सम्मान से कबूल ! ….राहों में बिखरे शूलों को पार करेंगे हम, आंधी – तूफानों से नही डरेंगे हम ! ”  

13आरोप लगने के बाद आशीष सागर दीक्षित ने 14 मार्च को लखनऊ में एडीजी दलजीत सिंह से मिलकर उनके सामने अपनी बात रखी, राजपाल भवन में भी ज्ञापन सौंपा, मुख्यमंत्री को स्पीड पोस्ट की। साथ ही वाया मेल चीफ जस्टिस आफ इंडिया, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, महिला आयोग, बाँदा डीएम, मानवाधिकार आयोग के सामने भी अपना पक्ष रखा और इंसाफ़ की गुहार लगाई।

श्रीमानजी एक तरफ आरोपी का अभी तक गिरफ्तार न होना और दूसरी तरफ मददगारों पर झूठे मुकदमे लिखवाकर मानसिक, आर्थिक और सामाजिक शोषण करना कहाँ का न्याय है? गरीब पीड़िता और इंसानियत की रक्षा करें। कहीं हम सब असहाय लोगों को एक साथ आत्महत्या न करनी पड़े।”

सच और झूठ, क्या है? कई बार ये सब जान रहे होते हैं लेकिन प्रक्रिया के नाम पर दमन का चक्र भी चलता रहता है। कई बार सिस्टम आंख-कान मूंद लेता है, इसके पीछे की वजह वही अधिकारी बता सकते हैं, जो ऐसा करते हैं। लेकिन जब-जब झूठ जीतता है और सच मरता है, समाज के एक बड़े हिस्से को लकवा जरूर मार जाता है। कभी-कभी कोई अपना सब कुछ दांव पर लगा कर सच की रक्षा करने पर आमादा होता है। ऐसे लोगों को पहचानने, उन्हें बचाने और उन्हें मजबूत करने की जरूरत है। बांदा के पुलिस-प्रशासन से उम्मीद बस इतनी कि किताबी कायदों में कहीं जिंदा जज़्बातों की कब्र न बन जाए।


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सत्येंद्र कुमार यादव,  एक दशक से पत्रकारिता में । माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता के पूर्व छात्र । सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता से आप लोगों को हैरान करते हैं । आपसे मोबाइल- 9560206805 पर संपर्क किया जा सकता है ।


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