सुधांशु कुमार

वर्षों की सुनवाई,  उसके दौरान शिक्षकों के प्रति जजों की पूरी सहानुभूति,  शिक्षकों के खून-पसीने की कमाई के करोड़ों रुपये वकीलों पर खर्च ! इन सबके बाद लगभग सात महीने से अधिक दिनों तक फैसला सुरक्षित रखने के बाद और उन शिक्षकों से पाँच चरणों के चुनाव कार्य करवाने के बाद जो फैसला आया है, वह बिहार के नियोजित शिक्षकों के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं।  उसका निचोड़ यही कि शिक्षक समुदाय पूरी ईमानदारी के साथ दर्जनों तरह के कार्य तो करे, लेकिन पेट में ‘गमछा’ बांधकर…मुँह पर ताला लगाकर ।  सरकार और पूरी व्यवस्था से पीड़ित शिक्षक के नाते सीधा-सा सवाल है कि आखिर शिक्षकों को वेतनमान क्यों नहीं ? क्या वह आदमी नहीं, उनके बच्चे और अन्य दायित्व नहीं ? क्या वह अब बंधुआ मजदूर मात्र रह गए हैं ? बिना पेंशन और वेतनमान के दिहाड़ी मजदूर की तरह वह साठ साल तक रेत में एड़ियां रगड़े ? इस असंवेदनशील कार्यपालिका के जाल में उलझ चुकी न्यायपालिका से एक शिक्षक का सीधा-सा सवाल है कि जब शपथ ग्रहण कर लेने मात्र से हमारे माननीयों को आजीवन मोटी पेंशन और वेतनमान के साथ तमाम तरह की फाइवस्टार सुविधाएं दी जा सकती हैं तो राष्ट्रनिर्माण के लिए दधीचि की तरह अपनी हड्डी तक दान कर देनेवाले दधीचि धर्मा शिक्षकों को पेंशन और वेतनमान क्यों नहीं ? सदन में शिक्षकों की मूलभूत आवश्यकताओं के प्रश्नों पर मुँह लटकाने वाले माननीयों की बाँछें उस वक्त क्यों खिल जाती हैं जब उनके वेतनादि की बेतहाशा बढोत्तरी की बात सदन के पटल पर रखी जाती है । उस वक्त क्या पक्ष, क्या विपक्ष ? बाहर नूराकुश्ती करनेवाले अंदर एकता का नायाब नमूना पेश करते हुए समवेत स्वर में उसका समर्थन करते हैं । बाहर राष्टनिर्माता भूखा, अधनंगा शिक्षक बेबस नजरों से उन दृश्यों का साक्षी मात्र रह जाता है । बेबस और लाचार बाट जोहते, मुँह ताकते । उसी सदन के किसी कोने से जानकी वल्लभ शास्त्री की चंद पंक्तियाँ गुंजायमान हो जाती है।
“ऊपर-ऊपर पी जाते सब, जो पीने वाले हैं ।
कहते ऐसे ही जीते हैं, जो जीनेवाले हैं ..!”

सन् 1964-66 में दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में गठित कोठारी कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि- ”किसी भी देश की कक्षाओं में उसका निर्माण होता है । “भूखे-नंगे- बेबस शिक्षकों से आप किस तरह के राष्ट्र का निर्माण करवाना चाहते हैं ? जिसकी वृद्धा माँ समुचित ईलाज के अभाव में अंतिम साँसें गिन रही हो, पिता मरणासन्न हों, बच्चे शैक्षणिक और शारीरिक  कुपोषण के शिकार हो रहे हों उन शिक्षकों से आप आदर्श और कर्तव्य निष्ठा की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं । चुनाव एवं मतगणना कार्य से लेकर जनगणना जैसे दर्जनों गैरशैक्षणिक कार्यों के वक्त तो वही शिक्षक बहुविध मेधासंपन्न दिखने लगते हैं, लेकिन जब उन्हें उनके उचित पारिश्रमिक का सवाल खड़ा होता है तो बड़ी ही निर्लज्जता के साथ उन्हें अयोग्य और नकारा साबित करने का कुचक्र रचा जाता है । शासन और सिस्टम का यह दोयम दर्जा बिहार समेत संपूर्ण देश की शिक्षा व्यवस्था को रसातल में ले जानेवाला है । जब कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार ने अपना पक्ष रखते समय कहा कि  शिक्षक योग्य नहीं हैं ! तो साहब आपकी मंशा क्या है ? इसका तो अर्थ यह है कि आपने जानबूझकर अयोग्य शिक्षकों के हाथ में देश का भविष्य बर्बाद होने के लिए छोड़ दिया ? यदि आपने जानबूझकर अयोग्य शिक्षकों की भर्ती की है तो आपने इस देश के भविष्य के साथ गंभीर खिलवाड़ किया है …आप पीढियां बरबाद करना चाहते हैं । आप शिक्षा नहीं , बस साक्षरता तक ही बहुजनों को समेटकर रखना चाहते हैं । आपको भय है कि जिस दिन यह साक्षर बहुसंख्यक जनता शिक्षित हो गयी, उस रोज जातिवाद, धर्म और क्षेत्रवाद की संकुचित परीधि से वह बाहर निकल जाएगी और आपकी लहलहाती वोट की खेती को पाला मार जाएगा ।


डॉ सुधांशु कुमार- लेखक सिमुलतला आवासीय विद्यालय में अध्यापक हैं। भदई, मुजफ्फरपुर, बिहार के निवासी। मोबाइल नंबर- 7979862250 पर आप इनसे संपर्क कर सकते हैं। आपका व्यंग्यात्मक उपन्यास ‘नारद कमीशन’ प्रकाशन की अंतिम प्रक्रिया में है।