काए गुड़िया नईं चिन्हो का?

कीर्ति दीक्षित

काफी सोच विचार के बाद शहर के शोरगुल से दूर अपनी कलम को आवाज देने के लिए मैंने अपने गाँव को चुना। बैग में चन्द कपड़े डाले और निकल पड़ी। पहले हवाई यात्रा, फिर ट्रेन और अन्ततः गाँव के करीब आ पहुंची। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। 20 किलोमीटर का सफ़र 1000 किलोमीटर की यात्रा से भारी लग रहा था। मेरे साथ मेरे शब्द भी उतावले थे। झटपट अपने गाँव की तरफ जाने वाली बस में सवार हो गई। बस, मानो जिन्दगी से मुक्ति चाह रही हो कुछ इस तरह से कराह रही थी। लोगों से ठसाठस भरी बस में मैंने भी अपने पैर जमा लिए थे, लेकिन मैं तो किसी और ही धुन में थी। वातानुकूलित सफर की थकान मानो इस दम तोड़ती बस में चढ़ते ही काफूर हो चुकी थी। वक्त का पहिया उल्टा घूम रहा था। मैं बस के कोने में टिकी किसी और ही दुनिया में सैर कर रही थी।

कहानी

तभी एक आवाज ने मेरी तन्द्रा को भंग किया। ‘अरे गुड़िया बेटा तुम इते कहाँ?’ सुनकर बड़ा अचरज लगा। शहर में रोज मिलने वाले लोग भी नहीं पहचानते। यहाँ दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी मेरे नाम से मुझे पुकारा! मैं मुस्कराई हाथ जोड़ कर मैंने अभिनन्दन किया और कहा – ‘बस वर्षों से चाचा आप सब से नईं मिले ते सो आ गये’। फिर वो बोले, ‘बेटा ई बस पे तुम काए के लाने आईं, इत्ती तकलीफ में, देखौ तौ बैठें तक खें ठौर नईयां इते, लेओ तुम इते बैठ जाओ’ । मैने कहा, ‘नहीं…नहीं चाचा हम बिल्कुल ठीक हैं, आप बैठिये’ लेकिन फिर भी उन्होंने मुझे जबरन ये कहकर बैठा दिया कि उन्हें तो बस आगे ही उतरना है।

pindi12सीट पर बैठी तो लोगों की आंखों को पढ़ने का मौका मिला। सारी आंखें मुझे देख रही थीं, जिनमें एक डर का सा भाव था, मैं उनके लिए कोई बहुत बड़ी इन्सान थी। बस खचाखच भरी थी, उसके कलपुर्जे भी दर्द से कराह रहे थे, सीटें सूखा रोग से ग्रसित थीं, पर फिर भी वो आज मेरे लिए दुनिया की सबसे बेहतरीन बस थी। वातानुकूलित मेट्रो में सूटेड बूटेड और तरह-तरह की सुगन्धों में डूबे अंग्रेजी में बोलते लोगों से ज्यादा मुझे इस बस के मैले कपड़े, कृषकाय पसीने में लथपथ लोग, अपने से लग रहे थे। आखिर उस अनजान भीड़ से भागकर मैं अपने गाँव शब्द बुनने जा रही थी। उस अस्थिपंजर वाली सीट पर बैठकर भी मुझे ईश्वरीय आनन्द हो रहा था।

लोगों के चेहरे पढ़ते हुए इस अप्रतिम लालसा में खोए हुए कब मेरा गाँव आ गया, पता ही नहीं चला। कंडक्टर ने आवाज लगाई तो झटपट अपना बैग ले, मैं नीचे उतर रही थी तभी मेरे गिरते बैग को एक बुजुर्ग ने सहारा दिया। बैग उठाने में भी मुझे तकलीफ हो रही थी, लेकिन वहीं दूसरी तरफ बुजुर्ग महिलायें सिर पर 40 किलो की बोरी लिए दौड़ी जा रही थीं। किसी का गेहूं बिक गया था तो चन्द पैसों की खुशी लिए जा रही थीं, तो कोई कल की चिन्ता सर पर लादे थीं। अब मैं फिर से उन पगडण्डियों पर थी, जो मेरे अस्तित्व की निर्मात्राी थीं। मैंने घर की ओर कदम बढ़ाए तो लगा मानो उस कल में लौट रही थी, जिसके बारे में लोग कहते हैं कि- कल लौटकर नहीं आता।

अरे! मैं तो वहाँ हूँ मिट्टी से लथपथ, रश्मि ने मेरे बाल झटक दिए हैं। मैं जोर से चीख के उसके पीछे भाग रही हूँ, और मेरे पीछे मेरे सारे साथी, और उस भागमभाग में झगड़ा बहुत पीछे छूट गया और खिलखिलाने की आवाज चारों ओर गूंजने लगी। तभी पानी की कुछ बूंदें मेरे चेहरे पर पड़ीं तो मुझे मेरे आज का ख्याल आया, तब देखा बच्चे छपाक से तालाब में कूदे थे और अपने दोस्तों के साथ तालाब में अठखेलियाँ कर रहे थे। मैंने मेरे घर की तरफ कदम बढ़ा दिए। रास्ते चलते हर व्यक्ति ने मेरे पैर छुए और कहा- ‘बड़े दिन में आईं बिन्नु, हमें औरन खें तो भूलई गईं’। आस पास के सारे बच्चे मेरे पीछे चल रहे थे, किसी ने मेरा बैग मुझसे ले लिया तो कोई दौड़कर मेरे घर में जाकर मेरे आने की खबर कर आया। आज पूरे गाँव में बस मैं ही मैं थी।

IMG-20151015-WA005घर पहुँची तो सबसे मिली। मेरे लिए अलग से खटिया बिछाई गई । नए गद्दे, चादर, तकिया सब कुछ बक्से से निकाला चाची ने, लेकिन ये सब कुछ बड़ा ही अचरज भरा था। मैं समझ नहीं पा रही थी, आखिर क्या मैं इतनी बदल गई हूं? ऐसी ही खटिया पर बिना किसी बिस्तर के पड़ जाया करती थी, उछल कूद करती थी। रात हो चली, खाना खाया और आँगन में ही खटिया पर लेट गई। हालांकि रात काफी नहीं हुई थी लेकिन वहां सब सो चुके थे। आज मैं भावनाओं से बुनी खटिया पर आसमान की तरफ टकटकी लगाए देख रही थी, आखिर अपने शब्दों को आकार जो देना था, लेकिन ये क्या दूध से धुले चाँद-सितारे जैसे मेरे शब्दों की पटकथा पर कटाक्ष कर रहे थे और चारों ओर उड़ते जुगनू तो मेरी हंसी उड़ाते से लग रहे थे, बार-बार जैसे मेरे कानों में आके कुछ कह जाते। शब्दों के लिबास में भावों के रंग भरने को तैयार थी मैं। लेकिन असीम शान्ति की थपकियों ने कब मुझे सुला दिया पता ही नहीं चला।

एक लम्बे अरसे के बाद मैंने सूर्य भगवान के रथ का आते हुए देखा तो चिडि़यों की अंगड़ाई भरी गुनगुनाहट को सुना भी। कोई बैलगाड़ी ले खेत पर जा रहा था, तो कोई जानवरों की सेवा में लगा था। सब अपने अपने काम में जुट गये थे। दिनचर्या आगे बढ़ाई और सोचा आज फिर उन गलियों में खुद को खेलता देख आऊं। तैयार होके निकल गई चारों तरफ शान्ति ही शान्ति थी । सब हंसकर मेरा स्वागत कर रहे थे लेकिन न जाने क्यों सभी आंखें मेरी तरफ उम्मीदों का समन्दर लेकर देख रहीं थीं। मुझे भी अपने शब्दों का आकार देना था, सो उनके बीच बैठ गई। देखते ही देखते पूरे गाँव के लोग मेरे चारों ओर जमा हो गये। कितने ही चेहरों ने मुझसे पूछा- काए गुड़िया नईं चिन्हो का? मेरी अांखें जिन्दगी के उन पन्नों को पलटने में लग गईं जब मैं उन्हीं में से एक हुआ करती थी। जब गुजरे पन्नों की उन तस्वीरों को मैंने आज के सच से मिलान किया तो मेरी आंखों में दिल से जैसे सन्नाटे को चीरता हुआ तूफान बाहर आने के लिए ज्वार भाटे की तरह उत्प्लावित होने लगा।

मैं निःस्तब्ध थी! पैंतीस की उम्र में पैंसठ का दर्द उनके चेहरों पर झलक रहा था। शरीर की हड्डियों पर खाल ने जैसे लाज का दुशाला ओढ़ रखा हो। पीली आंखें, सूखे चेहरे, ये सब मेरी उम्र के मेरे साथी थे! भीतर उठे इस तूफान से लड़ ही रही थी कि सौधी की अम्मा ने आकर मेरे पैर पकड़ लिए और बोली- ‘मैडम जी..पिछले चौमासे ने छतें लील लईं, खेती लील लई, ई चौमासे ने लरका और आदमी लील लओ। अब तुमईं कछु करो, सरकार साब हमें कछु दिबा दो। नईं तो जा बिटिया और छोटो न बच है, आंखों में उसके जैसे दर्द भी कराह रहा था। मैं स्तब्ध थी! तभी बस में मिले चाचा की पत्नी डबडबाई आंखों और रूंधे गले के साथ मेरे सामने आ खड़ी हुई साथ में एक 20 साल की लड़की और छोटा सा बच्चा। ‘मैडम जी ई बिध्वां खां कछु काम दिबा दो तो हमाओ मरबो सहज हो जै है। मैं तो शब्दों के लिबास बुनने आई थी, लेकिन अब तो शब्द भी नहीं थे। मैंने बस इतना कहा- बिधवा? तब उन्होंने बताया डॉक्टर के न होने से उनका 24 साल का लड़का बुखार से मर गया।

7चारों तरफ से बस गुहारें ही गुहारें थीं। किसी की बेटी को जलाकर मार दिया था, तो किसी के घर बरबाद खेती ने आदमियों की जान ले ली थी। किसी के पास रोटी नहीं थी तो किसी के पास पानी। चीथड़ों में लिपटे इन लोगों के दर्द को भी असहनीय वेदना थी। अब मेरे पास न शब्द थे, न वो शान्ति और खुशी जो कुछ देर पहले तक मेरी सखियाँ बनी हुई थीं। ये शान्ति नहीं, हर रोज मरती उम्मीदों का सन्नाटा था। अब इस सन्नाटे में मैं खुद को तलाश रही थी। शब्दों को आकार देने आई, मैं खुद ही आकारहीन हो चली थी।

आखिर उनके दर्द का अपराधी कौन था? सरकार, समाज या फिर मैं? खुद को खंगाला तो उत्तर आया… मैं! जिस धरती ने, जिन लोगों ने मुझे जिन्दगी के सबक सीखा के सफलता के लिए दौड़ा दिया, उन्हें ही पीछे छोड़ दिया। उनकी गुडि़या आज उनके लिए मैडम जी बन गई थी, आज ये पीड़ा असहनीय थी। अब शायद मुझे उन जुगनुओं का अट्टहास समझ आ रहा था। अब कहानियाँ भी मुझ पर हंस रही थीं। शब्दों के लिबास के धागे चटक गए थे। अब जो भी था सामने, वो था उस सन्नाटे के पीछे छुपे दर्द का शोर और मेरी कहानियों के कोरे पन्ने!

kirti dixit


कीर्ति दीक्षित। उत्तरप्रदेश के हमीरपुर जिले के राठ की निवासी। इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट रहीं। पांच साल तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों से जुड़ी रही हैं। वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकारिता के साथ-साथ स्वलेखन कार्य एवं स्वयं की संस्था चला रही हैं। जीवन को कामयाब बनाने से ज़्यादा उसकी सार्थकता की संभावनाएं तलाशने में यकीन रखती हैं कीर्ति। 


इति माधवी की कहानी पगला नथुनिया… पढ़ने के लिए क्लिक करें

10 thoughts on “काए गुड़िया नईं चिन्हो का?

  1. ग्रामीण समस्याओं और उनकी आकांक्षाओं का सजीव चित्रण । । ।

  2. Nice
    I wish u for yr new work.
    U go in hights with lights.

    Makan uncha ho yah jaruri nahi
    Sir rahe hamesh uncha
    unhi ko sakshiyat kahte hai
    Mata-pita ka aashirwad rahta hai hamesha
    Lakin dua unhi ko lagti hai jinke dil neki ke bane hote hai.

    Jaise aap

  3. अंतर्मन से लिखी गई बेहतरीन लेखनी को मेरा हृदय से नमन ।
    कीर्ति जी आपकी इस कहानी ने उन सबके लिए एक सीख है जो शहरो की चकाचक में रह गाँव की भीनी भीनी खुसबू से महरूम रह जाते है ।

  4. अभूतपूर्व प्रतिभा है कीर्ति जी आप में।सादर नमन वंदन व् ऐसी लेखनी का अभिनन्दन।सौभाग्य बुंदेलखंड का आप जैसी प्रतिभाएं हमें बुन्देली होने का गौरव कराती है।आपकी भाषाशैली में बुन्देली का पुट अपनेपन का अहसास कराता है।शुभ कामनाएं आप साहित्य जगत में एक अभूतपूर्व आयाम पाएं।

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