एक इस्तीफ़ा, हमेशा एक व्यक्ति का नहीं होता। वो उन तमाम लोगों की भावनाओं की अभिव्यक्ति होता है, जो अपनी सीमाओं की वजह से ख़ामोशी ओढ़े रखते हैं। पत्रकारिता के ऐसे दौर में, जहां शर्मिंदगी के तमाम मौके हम चुपचाप सह जाते हैं, उस दौर में कभी रवीश कुमार जैसे पत्रकार हमें ‘अंधेरे की ओर’ ले जाकर हमारी आत्मा को झकझोरते हैं तो वहीं विश्वदीपक जैसे बिरले साथी अपनी आवाज़ बुलंद कर दमन के तमाम हथकंडों को धता बता देते हैं। मुक्तिबोध के लफ़्जों में अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे, तोड़ने ही होंगे  मठ और गढ़  सब

प्रिय ज़ी न्यूज़,

zee news 22 feb-1एक साल 4 महीने और 4 दिन बाद अब वक्त आ गया है कि मैं अब आपसे अलग हो जाऊं, हालांकि ऐसा पहले करना चाहिए था लेकिन अब भी नहीं किया तो खुद को कभी माफ़ नहीं कर सकूंगा।

आगे जो मैं कहने जा रहा हूं वो किसी भावावेश, ग़ुस्से या खीझ का नतीज़ा नहीं है, बल्कि एक सुचिंतित बयान है। मैं पत्रकार होने के साथ-साथ उसी देश का एक नागरिक भी हूं, जिसके नाम अंध ‘राष्ट्रवाद’ का ज़हर फैलाया जा रहा है और इस देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेला जा रहा है। मेरा नागरिक दायित्व और पेशेवर जिम्मेदारी कहती है कि मैं इस ज़हर को फैलने से रोकूं। मैं जानता हूं कि मेरी कोशिश नाव के सहारे समुद्र पार करने जैसी है लेकिन फिर भी मैं शुरुआत करना चहता हूं। इसी सोच के तहत JNUSU अध्यक्ष कन्हैया कुमार के बहाने शुरू किए गए अंध राष्ट्रवादी अभियान और उसे बढ़ाने में हमारी भूमिका के विरोध में मैं अपने पद से इस्तीफा देता हूं। मैं चाहता हूं इसे बिना किसी वैयक्तिक द्वेष के स्वीकार किया जाए.

असल में बात व्यक्तिगत है भी नहीं। बात पेशेवर जिम्मेदारी की है। सामाजिक दायित्वबोध की है और आखिर में देशप्रेम की भी है। मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इन तीनों पैमानों पर एक संस्थान के तौर पर और उससे जुड़े होने के नाते एक पत्रकार के तौर पर मैं पिछले एक साल में कई बार फेल हुआ।

मई 2014 के बाद से जब से श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से कमोबेश देश के हर न्यूज़ रूम का सांप्रदायीकरण (Communalization) हुआ है लेकिन हमारे यहां स्थितियां और भी भयावह हैं। माफ़ी चाहता हूं, इस भारी भरकम शब्द के इस्तेमाल के लिए लेकिन इसके अलावा कोई और दूसरा शब्द नहीं है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि ख़बरों को मोदी एंगल से जोड़कर लिखवाया जाता है ? ये सोचकर खबरें लिखवाई जाती हैं कि इससे मोदी सरकार के एजेंडे को कितना गति मिलेगी ?

zee news 22 feb-2हमें गहराई से संदेह होने लगा है कि हम पत्रकार हैं। ऐसा लगता है जैसे हम सरकार के प्रवक्ता हैं या ‘सुपारी किलर’ हैं? मोदी हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं, मेरे भी ; लेकिन एक पत्रकार के तौर पर इतनी मोदी भक्ति अब हजम नहीं हो रही है ? मेरा ज़मीर मेरे ख़िलाफ़ बग़ावत करने लगा है। ऐसा लगता है जैसे मैं बीमार पड़ गया हूं। हर ख़बर के पीछे एजेंडा, हर न्यूज़ शो के पीछे मोदी सरकार को महान बताने की कोशिश, हर बहस के पीछे मोदी विरोधियों को ‘शूट’ करने का प्रयास ? अटैक, युद्ध से  कमतर कोई शब्द हमें मंजूर नहीं। क्या है ये सब ? कभी ठहरकर सोचता हूं तो लगता है कि पागल हो गया हूं।

आखिर हमें इतना दीन हीन, अनैतिक और गिरा हुआ क्यों बना दिया गया ? देश के सर्वोच्च मीडिया संस्थान से पढ़ाई करने और  आजतक से लेकर बीबीसी और डॉयचे वेले, जर्मनी  जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद मेरी पत्रकारीय जमापूंजी यही है कि लोग मुझे ‘छी न्यूज़’ पत्रकार कहने लगे हैं। हमारे ईमान (Integrity) की धज्जियां उड़ चुकी हैं। इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ?

कितनी बातें कहूं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के ख़िलाफ़ लगातार मुहिम चलाई गई और आज भी चलाई जा रही है। आखिर क्यों ? बिजली-पानी, शिक्षा और ऑड-इवेन जैसी जनता को राहत देने वाली बुनियादी नीतियों पर भी सवाल उठाए गए। केजरीवाल से असहमति का और उनकी आलोचना का पूरा हक है लेकिन केजरीवाल की ‘सुपारी किलिंग’ का हक़ एक पत्रकार के तौर पर किसी को नहीं है। केजरीवाल के ख़िलाफ़ की गई निगेटिव स्टोरी की अगर लिस्ट बनाने लगूंगा तो कई पन्ने भर जाएंगे। मैं जानना चाहता हूं कि पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांत ‘तटस्थता’ का और दर्शकों के प्रति ईमानदारी का कुछ तो मूल्य है, कि नहीं ?

 दलित स्कॉलर रोहित वेमुला की आत्महत्या के मुद्दे पर ऐसा ही हुआ। पहले हमने उसे दलित स्कॉलर लिखा फिर दलित छात्र लिखने लगे। चलो ठीक है, लेकिन कम से कम खबर तो ढंग से लिखते।रोहित वेमुला को आत्महत्या तक धकेलने के पीछे ABVP नेता और बीजेपी के बंडारू दत्तात्रेय की भूमिका गंभीरतम सवालों के घेरे में है , लेकिन एक मीडिया हाउस के तौर पर हमारा काम मुद्दे को कमजोर (dilute) करने और उन्हें बचाने वाले की भूमिका का निर्वहन करना था।

मुझे याद है जब असहिष्णुता के मुद्दे पर उदय प्रकाश समेत देश के सभी भाषाओं के नामचीन लेखकों ने अकादमी पुरस्कार लौटाने शुरू किए तो हमने उन्हीं पर सवाल करने शुरू कर दिए। अगर सिर्फ उदय प्रकाश की ही बात करें तो लाखों लोग उन्हें पढ़ते हैं। हम जिस भाषा को बोलते हैं, जिसमें रोजगार करते हैं उसकी शान हैं वो। उनकी रचनाओं में हमारा जीवन, हमारे स्वप्न, संघर्ष झलकते हैं लेकिन हम ये सिद्ध करने में लगे रहे कि ये सब प्रायोजित था। तकलीफ हुई थी तब भी लेकिन बर्दाश्त कर गया था।

लेकिन कब तक करूं और क्यों ??   

 मुझे ठीक से नींद नहीं आ रही है। बेचैन हूं मैं। शायद ये अपराध बोध का नतीजा है। किसी शख्स की जिंदगी में जो सबसे बड़ा कलंक लग सकता है वो है – देशद्रोह। लेकिन सवाल ये है कि एक पत्रकार के तौर पर हमें क्या हक़ है- किसी को देशद्रोही की डिग्री बांटने का ? ये काम तो न्यायालय का है न कन्हैया समेत जेएनयू के कई छात्रों को हमने लोगों की नजर में ‘देशद्रोही’ बना दिया। अगर कल को इनमें से किसी की हत्या हो जाती है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा हमने सिर्फ किसी की हत्या और कुछ परिवारों को बरबाद करने की स्थिति पैदा नहीं की है बल्कि दंगा फैलाने और गृहयुद्ध की नौबत तैयार कर दी है। कौन सा देशप्रेम है ये आखिर कौन सी पत्रकारिता है ये ?

क्या हम बीजेपी या आरएसएस के मुखपत्र हैं कि वो जो बोलेंगे वहीं कहेंगे ? जिस वीडियो में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा था ही नहीं, (रिपोर्ट से पहले पुलिस की नरमी, मीडिया संस्थानों के अलग-अलग दावे कुछ यही तस्दीक करते हैं) उसे हमने बार-बार हमने उन्माद फैलाने के लिए चलाया। अंधेरे में आ रही कुछ आवाज़ों को हमने कैसे मान लिया की ये कन्हैया या उसके साथियों की ही है? ‘भारतीय कोर्ट ज़िंदाबाद’ को पूर्वाग्रहों के चलते ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ सुन लिया और सरकार की लाइन पर काम करते हुए कुछ लोगों का करियर, उनकी उम्मीदें और परिवार को तबाही की कगार तक पहुंचा दिया। अच्छा होता कि हम एजेंसीज को जांच करने देते और उनके नतीजों का इंतज़ार करते।

लोग उमर खालिद की बहन को रेप करने और उस पर एसिड अटैक की धमकी दे रहे हैं। उसे गद्दार की बहन कह रहे हैं। सोचिए ज़रा, अगर ऐसा हुआ तो क्या इसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी ? कन्हैया ने एक बार नहीं हज़ार बार कहा कि वो देश विरोधी नारों का समर्थन नहीं करता लेकिन उसकी एक नहीं सुनी गई, क्योंकि हमने जो उम्माद फैलाया था वो NDA सरकार की लाइन पर था। क्या हमने कन्हैया के घर को ध्यान से देखा है ? कन्हैया का घर, ‘घर’ नहीं इस देश के किसानों और आम आदमी की विवशता का दर्दनाक प्रतीक है। उन उम्मीदों का कब्रिस्तान है जो इस देश में हर पल दफ्न हो रही हैं, लेकिन हम अंधे हो चुके हैं ! 

zee news 22 feb-3मुझे तकलीफ हो रही है इस बारे में बात करते हुए लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि मेरे इलाके में भी बहुत से घर ऐसे हैं। भारत का ग्रामीण जीवन इतना ही बदरंग है। उन टूटी हुई दीवारों और पहले से ही कमजोर हो चुकी जिंदगियों में , हमने राष्ट्रवादी ज़हर का इंजेक्शन लगाया है, बिना ये सोचे हुए कि इसका अंजाम क्या हो सकता है! अगर कन्हैया के लकवाग्रस्त पिता की मौत सदमें से हो जाए तो क्या हम जिम्मेदार नहीं होंगे ? ‘The Indian Express’ ने अगर स्टोरी नहीं की होती तो इस देश को पता नहीं चलता कि वंचितों के हक में कन्हैया को बोलने की प्रेरणा कहां से मिलती है !

रामा नागा और दूसरों का हाल भी ऐसा ही है। बहुत मामूली पृष्ठभूमि और गरीबी  से संघर्ष करते हुए ये लड़के जेएनयू में मिल रही सब्सिडी की वजह से पढ़ लिख पाते हैं। आगे बढ़ने का हौसला देख पाते हैं लेकिन टीआरपी की बाज़ारू अभीप्सा और हमारे बिके हुए विवेक ने इनके करियर को लगभग तबाह ही कर दिया है।

हो सकता है कि हम इनकी राजनीति से असहमत हों या इनके विचार उग्र हों लेकिन ये देशद्रोही कैसे हो गए ? कोर्ट का काम हम कैसे कर सकते हैं ? क्या ये महज इत्तफाक है कि दिल्ली पुलिस ने अपनी  FIR में ज़ी न्यूज का संदर्भ दिया है ? ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली पुलिस से हमारी सांठगांठ है ? बताइए कि हम क्या जवाब दे लोगों को ?

आखिर जेएनयू से या जेएनयू के छात्रों से क्या दुश्मनी है हमारी मेरा मानना है कि आधुनिक जीवन मूल्यों, लोकतंत्र, विविधता और विरोधी विचारों के सह-अस्तित्व का अगर कोई सबसे खूबसूरत बगीचा है देश में, तो वो जेएनयू है लेकिन इसे ग़ैरक़ानूनी और देशद्रोह का अड्डा बताया जा रहा है।

zee news 22 feb-4मैं ये जानना चाहता हूं कि जेएनयू ग़ैर-क़ानूनी है या बीजेपी का वो विधायक जो कोर्ट में घुसकर लेफ्ट कार्यकर्ता को पीट रहा था ? विधायक और उसके समर्थक सड़क पर गिरे हुए CPI के कार्यकर्ता अमीक जमेई को बूटों तले रौंद रहे थे लेकिन पास में खड़ी पुलिस तमाशा देख रही थी। स्क्रीन पर पिटाई की तस्वीरें चल रही थीं और हम लिख रहे थे – ओपी शर्मा पर पिटाई का आरोप। मैंने पूछा कि आरोप क्यों कहा गया ऊपर से कहा गया है ? हमारा ऊपर इतना ‘नीचे’ कैसे हो सकता है मोदी तक तो फिर भी समझ में आता है लेकिन अब ओपी शर्मा जैसे बीजेपी के नेताओं और ABVP के कार्यकर्ताओं को भी स्टोरी लिखते समय अब हम बचाने लगे हैं।

घिन आने लगी है मुझे अपने अस्तित्व से। अपनी पत्रकरिता से और अपनी विवशता से। क्या मैंने इसलिए दूसरे सब कामों को छोड़कर पत्रकार बनने का फ़ैसला किया था। शायद नहीं।

अब मेरे सामने दो ही रास्ते हैं या तो मैं पत्रकारिता छोड़ूं या फिर इन परिस्थितियों से खुद को अलग करूं। मैं दूसरा रास्ता चुन रहा हूं। मैंने कोई फ़ैसला नहीं सुनाया है बस कुछ सवाल किए हैं जो मेरे पेशे से और मेरी पहचान से जुड़े हैं। छोटी ही सही लेकिन मेरी भी जवाबदेही है। दूसरों के लिए कम, खुद के लिए ज़्यादा। मुझे पक्के तौर पर अहसास है कि अब दूसरी जगहों में भी नौकरी नहीं मिलेगी। मैं ये भी समझता हूं कि अगर मैं लगा रहूंगा तो दो साल के अंदर लाख के दायरे में पहुंच जाऊंगा। मेरी सैलरी अच्छी है लेकिन ये सुविधा बहुत सी दूसरी कुर्बानियां ले रही है, जो मैं नहीं देना चाहता। साधारण मध्यवर्गीय परिवार से आने की वजह से ये जानता हूं कि बिना तनख़्वाह के दिक्कतें भी बहुत होंगी, लेकिन फिर भी मैं अपनी आत्मा की आवाज़ को दबाना नहीं चाहता।

मैं एक बार फिर से कह रहा हूं कि मुझे किसी से कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है। ये सांस्थानिक और संपादकीय नीति से जुड़े हुए मामलों की बात है। उम्मीद है इसे इसी तरह समझा जाएगा।

यह कहना भी ज़रूरी समझता हूं कि अगर एक मीडिया हाउस को अपने दक्षिणपंथी रुझान और रुचि को जाहिर करने का, बखान करने का हक़ है तो एक व्यक्ति के तौर पर हम जैसे लोगों को भी अपनी पॉलिटिकल लाइन के बारे में बात करने का पूरा अधिकार है। पत्रकार के तौर पर तटस्थता का पालन करना मेरी पेशेवर ज़िम्मेदारी है लेकिन एक व्यक्ति के तौर पर और एक जागरूक नागरिक के तौर पर मेरा रास्ता उस लेफ़्ट का है जो पार्टी दफ़्तर से ज़्यादा हमारी ज़िंदगी में पाया जाता है। यही मेरी पहचान है।


VISHWA DEEPAK-1विश्वदीपक। आईआईएमसी के पूर्व छात्र। डाउचे वेले, बीबीसी जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से जुड़े रहने का अनुभव। इलेक्ट्रानिक मीडिया में आजतक, न्यूज 24, न्यूज़ नेशन में बतौर प्रोड्यूसर कार्य किया। जनसत्ता, अहा ज़िंदगी समेत तमाम अख़बारों और पत्रिकाओं में जनपक्षधर मुद्दों पर आलेख प्रकाशित। कन्हैया की गिरफ़्तारी और जेएनयू को देशद्रोही ठहराए जाने के ख़िलाफ़ वैचारिक प्रतिरोध जताते हुए ज़ी न्यूज़ से इस्तीफ़ा।


 

 

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