पुष्यमित्र

pushya 12 marchजब हम रागिनी कुमारी (बदला नाम) से मिलने कटिहार जिले के अमदाबाद प्रखंड में स्थित उसके गांव लालबथानी पहुंचते हैं तो पता चलता है कि वह अपने एक साल के बच्चे को लेकर अपने वकील से मिलने गयी है। उसके माता-पिता कहते हैं कि जब उसने लड़ाई छेड़ दी है तो हर हाल में लड़ना ही होगा। रागिनी कुमारी अभी तक नाबालिग है, दो साल पहले जब वह आठवीं कक्षा में पढ़ती थी तो उसके जीवन में ‘प्रेम’ एक हादसा बन कर आया। उसके माता-पिता कहते हैं, स्कूल के ही एक लड़के से उसे प्रेम हो गया और शारीरिक संबंध भी बन गये। मगर जब गर्भ ठहर गया तो वो आनाकानी करने लगा। लड़का उसे गर्भपात कराने के टिप्स बताने लगा और दवाएं लाकर देने लगा। मगर रागिनी ने गर्भपात करने से साफ-साफ इनकार कर दिया।

 रागिनी के मां-बाप ने उसका साथ दिया और मामला गांव की सामाजिक पंचायत तक पहुंच गया। पंचायत ने फैसला सुनाया कि दोनों की शादी हो जानी चाहिये। मगर लड़का और उसके रिश्तेदार इसके लिए तैयार नहीं हुए और उसके बदले धोखे से रागिनी को अपने साथ ले जाकर उसका गर्भपात कराने की कोशिश की। इसके बाद रागिनी ने तय कर लिया कि वह हर हाल में बच्चे को जन्म देगी और अपने बच्चे की मदद से ही अपने धोखेबाज प्रेमी को सजा दिलायेगी। उसकी पढ़ाई छूट गयी है, बच्चे के पालन पोषण का अतिरिक्त भार आ गया है। मगर वह सब कुछ झेलते हुए अपनी लड़ाई लड़ रही है। चाहे कटिहार जिला मुख्यालय स्थिति अदालत जाना हो या वकील से मिलना हो। वह हर काम बिना थके कर रही है।

यह सिर्फ एक रागिनी की कहानी नहीं है। पूरे कोसी इलाके में ऐसे दर्जनों मामले हैं, जहां यौन शोषण की शिकार युवतियों ने सोशल टैबू को तोड़ कर अपने बच्चे को जन्म दिया और बच्चों को जज साहब के सामने खड़ा कर दिया है कि उसे और उसके बच्चे को न्याय दिलाइये। ऐसे ही मामलों से निबटने के लिए 2013 में 33 बच्चों के डीएनए टेस्ट का आदेश भी जारी किया गया था। रोचक बदलाव यह है कि पहले ऐसे मामलों में लड़की को ही परेशान करने और उसे गर्भपात की सलाह देने वाला परिवार और समाज अब उसके साथ खड़ा नजर आ रहा है।

इन हिम्मती लड़कियों में कोलासी के महादलित टोले की लक्ष्मी (बदला नाम) भी है, जिसने दबंग अगड़ी जाति के अपने प्रेमी को अदालती कटघड़े में खड़ा कर दिया है। उनकी छह साल की बेटी अब स्कूल में पढ़ने लगी है और लक्ष्मी ने स्कूल में पिता के नाम की जगह ‘प्रेमी’ का नाम लिखवाया है। क्षेत्र के लोग बताते हैं कि महज कुछ साल पहले तक अगड़ी जाति के कुछ पुरुष पिछड़ी और दलित जाति की लड़कियों और महिलाओं के साथ यौन संबंध बनाना अपना अधिकार समझते थे और इन युवतियों को अपनी संपत्ति की तरह ट्रीट करते थे। मगर लक्ष्मी ने जब अपने बच्चे को जन्म दिया और मामले को लेकर अदालत चली गयीं तो इलाके के अगड़ी जाति के ऐसे युवकों को झटका सा लगा है। अब वे इन टोलों की लड़कियों पर निगाह डालने से डरने लगे हैं।

लक्ष्मी बताती है कि हालांकि दबंग प्रेमी अक्सर रात के वक्त उसके घर के सामने से बाइक से गुजरता है और जोर-जोर से चिल्ला कर मां और बेटी दोनों को काट डालने की धमकी देता है। मगर दिन में उसकी हिम्मत नहीं होती इधर झांकने की। उधर, लड़के के परिवार के लोगों ने उसकी झटपट शादी करा दी है, इसके बावजूद वे निश्चिंत नहीं हैं, क्योंकि अदालती फैसला कभी भी उसे लक्ष्मी की बच्ची को अपनी बेटी मानने पर मजबूर कर सकता है। और उसे भरण-पोषण करना पड़ सकता है और तमाम अधिकार देने पड़ सकते हैं।

महिलाओं के अधिकार के लिए आवाज उठाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता शाहिना परवीन कहती हैं कि यह कोई सामान्य परिघटना नहीं है। इसे बड़े बदलाव के तौर पर देखना चाहिये। जिस दौर में महानगरों की लड़कियां शादी से पहले गर्भवती हो जाने की बात को हर वक्त छुपाने की कोशिश करती हैं और प्रेम के असफल होने के बाद ठहरे हुए गर्भ से छुटकारा पाने में ही भलाई समझती हैं, वहां अगर देश के सबसे पिछड़े इलाके की लड़कियां सोशल टैबू को तोड़ कर आगे आ रही हैं तो यह बड़ी बात है। संभवतः जिस तरह उस इलाके में ट्रैफिकिंग और वेश्यावृत्ति के मामले लगातार आ रहे हैं, वहां की महिलाओं ने समझ लिया है कि अगर इज्जत की फिकर करते रहे तो जीवन नर्क हो जायेगा। वे अब पुरुषों की ग़लती पर परदा डालने के लिए तैयार नहीं हैं, वे इस परदे को हटा कर समाज को उसका असली चेहरा दिखाने की कोशिश कर रही हैं। और साथ ही अपने हक की लड़ाई भी लड़ रही हैं।

यह बदलाव कोसी के इलाके में इतना आम हो गया है कि एक बार अमदाबाद की एक लड़की अपने मृत बच्चे को लेकर ही अदालत पहुंच गयीं और डीएनए टेस्ट कराने की मांग करने लगीं। दरअसल उसके प्रेमी ने उसे धोखे से गर्भपात की दवा खिला दी थी। फलका प्रखंड के मोरसंडा गांव की एक किशोरी ने महज 13 साल की उम्र में अपने बच्चे को जन्म देने का फैसला कर लिया। अभी वह लड़की और उसका बच्चा दोनों पूर्णिया स्थित चाइल्ड लाइन में रह रहे हैं। इस विरोध के सकारात्मक नतीजे भी सामने आ रहे हैं। बच्चे को जन्म देने और अदालत में मुकदमा करने के बाद एक युवक ने अपनी प्रेमिका से समझौता कर लिया और फिलहाल दोनों की शादी हो गयी है।

हालांकि ज्यादातर मामलों में अदालती लड़ाई लड़ने वाली इन लड़कियों का लक्ष्य अपने प्रेमी को शादी के लिए मजबूर करना या अपने बच्चे को वारिस का हक दिलाना ही है। कई मामलों में तो वे गुजारा भत्ता पाने के लिए भी तैयार हो जा रही हैं। मगर फिर भी यह एक बड़ा बदलाव है। 

(साभार-प्रभात ख़बर)

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पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं।


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