कीर्ति दीक्षित

कुछ समय पहले चुनावों के दौरान बीजेपी किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओपी धनखड साहब ने कहा था कि अभी हरियाणा के लडके पैसे देकर बिहार की लडकियों से शादी करते हैं लेकिन अगर हरियाणा में बीजेपी की सरकार बनी तो इसके लिए उन्हें पैसे खर्च नहीं करने होंगे, हम बहू लाकर देंगे। लेकिन अब शायद धनकड़ साहब को हरियाणा के युवाओं को ऐसे आश्वासन देने कि आवश्यकता नहीं होगी, ऐसे चुनावी हथकंडों के इस्तेमाल की जरूरत नहीं होगी। क्योंकि लिंगानुपात के लिए बदनाम हरियाणा में कुछ शुभ संकेत दिखाई दे रहे हैं। दिसम्बर 2015 में लड़कियों का अनुपात प्रति एक हजार लड़कों के मुकाबले 900 के पार पहुंच गया है। ये दस सालों में पहली बार हुआ । मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इस कार्यक्रम की सफलता के लिए राज्य की नीतियों के साथ साथ प्रधानमंत्री की ‘बेटी बचाओ बेटी पढाओ’ अभियान को दिया। संकेत शुभ हैं हरियाणा के लिए ही नहीं पूरे देश के लिए। क्योंकि हरियाणा कि गिनती ऐसे प्रदेशों में होती है जहाँ महिलाओं कि स्थिति दयनीयता की पराकाष्ठा पर है। दयनीयता की ये दास्तानें समाचार पत्रों में बहुत होती हैं और निदान पर चर्चाएँ भी काफी होती हैं लेकिन वास्तविकता के धरातल पर ये चर्चाएँ कभी मूर्त रूप नहीं लेती।

एक ओर यात्रा नार्यस्तु पूज्यन्ते…, नारी तुम श्रद्धा हो…, अबला जीवन तुम्हारी यही कहानी…, जैसी ना जाने कितनी कवितायेँ, श्लोक, दोहे, छंद तो नारी के सम्मान में गढ़े गये, सम्मान कि ऊंची-ऊंची कल्पनाएँ कीं जाती हैं, लेकिन दूसरी तरफ अपमान के ज्वाला से झुलसाते नाद भी आये दिन सुनाई देते रहते हैं। कभी कन्याभ्रूण हत्या, दहेज़ हत्या, बलात्कार, कभी घरेलू हिंसा, समाज के हर चौराहे पर द्वितीयक होने की पीड़ा  लड़की को ही झेलने होती है और सामाजिक विडंबना देखिये कि इन समस्याओं को पीठ दिखाकर समाज का बुद्धिजीवी वर्ग एक आसान सा रास्ता अपनाता है। जन्म से पहले ही उस जीव कि हत्या कर दी जाये और आज हम इतिहास के उस मोड़ पर आकर खड़े हो गये हैं जहाँ मनुष्य को मनुष्य से सुरक्षित करना मुश्किल हो रहा है।

हो सकता है कि लोग हमारी बुद्धि पर ही संशय करें, पर इतना निश्चित है कि जब देश के बुद्धिजीवी किसी समस्या को लेकर चीख पुकार करते हैं, कभी सरकार की नाकामी के रूप में, कभी सामजिक मानसिकता के रूप में, लेकिन सच्चाई ये है कि ये सब बोलकर हम अपने दुर्दांत चेहरों पर नकाब डाल लेते हैं। लेकिन युक्ति तो यही कहती है कि नकाब पहन लेने से पाप की परिणति पुण्य में नहीं बदल जाती। पर फिर भी यहाँ हर एक नकाबनशीं हैं क्योंकि नकाब के बिना समाज में बहार आने की मनाही है । लेकिन सत्य कड़वा है। बलात्कार, दहेज़ जैसी घटनाओं ने ही समाज को कन्या भ्रूण हत्या का रास्ता दिखाया है।

हमारे  देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का चलन ज्यादा से ज्यादा दो या तीन दशकों पुराना है, जब देश के गर्भ में भ्रूण की पहचान कर सकने वाली ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ का चिकित्सकीय उपयोग प्रारंभ हुआ।, लेकिन मानव प्रकृति कहीं ना कहीं उस ओर अवश्य आकृष्ट  होती है जिस ओर उसे रोका जाये । समाज ने इस विश्वास को मौन स्वीकृति दे दी कि अगर लड़कियां कम होंगी तो अपने आप यह प्रथा कम हो जायेगी, पर यह हुआ नहीं। इसका कारण यह है कि देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। मध्यम वर्ग के लोग अब निम्न मध्यम वर्ग में और निम्न मध्यम वर्ग के गरीब वर्ग में आ गये। लड़कों के लिए रोजगार के अवसर घटे तो लड़कियों के लिए सुयोग्य वर मिलना और टेढ़ी खीर होता गया। स्थिति ने और भयावह रूप ले लिया स्त्रियों के प्रति अपराध बढ़ने लगे, और इन सारी समस्याओं का एक सीधा हल जन्म से पहले ही मार दो, परिणामतः लिंगानुपात।

नारीवादी बुद्धिमान नारियों पर हमले होने पर गला फाड़ कर रो सकते हैं पर समाज का कटीला सच वे नहीं देखना चाहते। बेहतर ये है कि सत्य पर रोने के स्थान पर उसे माने और उसके निराकरण पर गंभीर कदम उठायें। राजनैतिक इच्छा शक्ति के साथ साथ सामाजिक इच्छा शक्ति को मूर्त रूप दें। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने कहा है “अगले छः महीनो में राज्य 950 का लिंगानुपात का लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे।“ पर प्रश्न रह रह कर यही है कि हरियाणा से आई शुभ सूचना को क्या हम इस इच्छा शक्ति का आरम्भ मान सकते हैं?


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कीर्ति दीक्षित। उत्तरप्रदेश के हमीरपुर जिले के राठ की निवासी। इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट रहीं। पांच साल तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों में नौकरी की। वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकारिता। जीवन को कामयाब बनाने से ज़्यादा उसकी सार्थकता की संभावनाएं तलाशने में यकीन रखती हैं कीर्ति। 

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